‘घुमंतू जीवन’ संरक्षण की उम्मीद…..

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1917
Pooja Prashar

कभी बांसुरी की मधुर धुन, कभी ढपली की थाप, कभी भोपे के सारंगी का सुर जिस पर थिरकते उनके पांव, कभी रस्सी की आकृतियां बनाकर उनसे गुजरना तो आग के गोले से दूसरी और कूदना, कभी दो बांसों के बीच बंधी रस्सी पर चलना तो लंबे बांसों को पैरों के रूप में प्रयोग कर यूं आगे बढ़ना….. न सिर्फ आश्चर्य दिलाता था अपितु कभी-कभी भयभीत भी कर देता था कि यदि  गिर गए, तो क्या होगा…!

लोहे को पीटकर चिमटा और तवा बनाना तो कभी घर-घर जाकर श्रृंगार और अन्य उपयोगी वस्तुओं का आदान – प्रदान कर जीविकोपार्जन करना, यहां – वहां घूमते, मनोरंजन कराते, अद्भुत कलाओं का दर्शन कराते, अलग-अलग परंपरा व जीवनशैली से परिचित कराते ये घुमंतू बंजारे, नट आजकल दिखाई नहीं देते। मन स्वयं से कभी-कभी प्रश्न करने लगता है कि आखिर ये लोग हैं कौन? इनकी धरोहर क्या है?

‘जागा’ भी जो कई पीढ़ियों का लेखा-जोखा अपने पास रख, नई पीढ़ियों को जोड़ते हुए ना सिर्फ उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में बताता, अपितु उनकी स्मृतियों से जोड़कर अपनी परंपरा का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता। जिससे हमारा संबंध हमारी समृद्ध संस्कृति से स्थापित हो पाता। ‘कृषि संकट’ के साथ कृषि पर आधारित आज इन सभी की जीवन शैली भी संकट में पड़ गई है।

ऐसा अनमोल ‘पेशा’ जो हर परंपरा – संस्कृति के साथ जोड़ते हुए कला के सौंदर्य को बिखेर हमारे देश को अद्भुत और समृद्ध बनाता है, आज दिशा – विहीन होने के साथ विलुप्त होने के कगार पर है।

ये घुमंतू बंजारे उम्मीद लिए इस प्रतीक्षा में हैं कि कोई उनका हाथ पकड़ एक सही राह दिखाए। जिससे उनका घुमंतू जीवन और उनका ज्ञान, परंपरा – संस्कृति में रंग भरते हुए जीवन को ना सिर्फ रसपान कराए अपितु देश अपनी प्राचीन कलाओं का संरक्षण रख विश्व में शीर्षस्थ स्थान पर होने का गौरव प्राप्त करे। आज ‘घुमंतू जीवन’ अपने संरक्षण की उम्मीद लगाए बैठा है।