कॉलेज लाइफ के वो यादगार दिन

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डॉ राकेश कुमार सिंह,वन्यजीव विशेषज्ञ
“नाइंटी” (नब्बे डिग्री झुककर नमस्कार करना) हॉस्टल में पहला कदम रखते ही एक कड़कती आवाज़ ने मेरा स्वागत किया। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता कई शानदार उपमाओं से मुझे नवाज़ दिया गया। मुझे समझ ही नहीं आया, या पंतनगर की भाषा में कहें तो “मैं कंफ्यूजिया गया” कि ऐसे खूबसूरत शब्दों से किसे और क्यूँ बुलाया जा रहा है। तभी पीछे से आवाज़ आई “….. तुझे ही बुला रहे हैं”। ऐसा अनुभव तो ज़िन्दगी में कभी हुआ ही नहीं था। मैंने पूछा “भाई साब क्या बात है क्यूँ……दे रहे हो”। बस इसके बाद तो मेरे ऊपर उपमाओं की बौछार होने लगी। “…. सीनियर हैं तेरे, सर नमस्कार बोल”। अजीब बात थी ऐसा पहली बार देखा कि कोई अजनबी खुद को नमस्ते करवा रहा था वो भी जबर्दस्ती। तभी मुझे समझ आ गया कि यह सब वही है जिसका सामना कॉलेज में नया दाखिला लेने पर हर विद्यार्थी को करना पड़ता है और जिसके बारे में अब तक फिल्मों मे देखा या अख़बारों मे ही पढ़ा था। अब मेरे होश फाख्ता होने लगे। मरता क्या ना करता पूछ बैठा “सर ‘नाइंटी’ क्या होता है”।

मुझे आज भी गर्व होता है कि सबसे कड़क सीनियर ने तुरंत मुझे ही “नाइंटी” मार के दिखाई। यह देख कर मुझे हंसी आना स्वाभाविक था। और वही हुआ जो पन्तनगर की भाषा में मुस्की मारने यानी दबी हंसी पर होता है। अब तो मुस्कुराने पर ही एक नई कविता रटाई जाने लगी। कितने सुंदर शब्द थे, “मुस्की मारी……”। फिलहाल बड़ी मुश्किल से पीछा छूटा।
हॉस्टल की रियर विङ्ग मे पहुँचते ही नई उपमाओं ने एक बार फिर मेरे कर्ण को भेदा। अब एक नये प्रकार के अभिवादन “एट्टी” (जमीन पर लेटकर दंडवत प्रणाम) हेतु शब्द बाणों ने स्वागत किया। क्या-क्या एक ही दिन में सिखाया जा रहा था। जो भी सीनियर मिलता वही तरह-तरह का ज्ञान, उपमाएं, कवितायें, गाने सिखाये जा रहा था।

अब तक यह समझ आ गया था कि अगले एक या दो माह थर्ड बटन (सिर झुकाकर कमीज की तीसरी बटन देखते हुए) ही चलना है। सामने से भले ही हॉस्टल का कुकुर भी आ जाए बस “नाइंटी” मारो आगे बढ़ो और कुछ बोलो नहीं क्योंकि सीनियर लोग बता ही चुके थे कि “पंतनगर वह बस्ती है…..”। एक चीज बहुत मजेदार नोट करी थी कि उस दौरान कैफे वाले भी मजे लेने के लिए अक्सर हॉस्टल की गैलरी में घूमा करते थे और जाने अनजाने हम लोग उन्हें भी “नाइंटी” मार दिया करते थे। ये हाल केवल नए घोड़ों (वेटरनरी कॉलेज) का ही नहीं था, हथौड़ों (टेक्नोलॉजी कॉलेज), मछलियों (फिशरीज कॉलेज) और नए खुरपों (एग्रीकल्चर कॉलेज) को भी यही सब सुंदर आनंद दायक ज्ञान दिया जा रहा था। यहां तक कि पंतनगर का पिन कोड “263145”, जिसमें एक से लेकर छः तक के सभी नंबर थे, रटाए जा रहे थे।
जो भी हो उन शुरूआती दिनों का मज़ा ही अलग था। धीरे-धीरे यह सब सामान्य व आनंद दायक लगने लगा। हाँ, “एट्टी” मारने पर कपड़े गंदा हो जाना स्वाभाविक था तो सीनियर पांच रुपए कपड़े धुलवाने का ज़रूर देते थे। फिर तो जितने सीनियर दिखे भले ही वो “नाइंटी” कि अपेक्षा करें हम “एट्टी” से अभिवादन करते थे। जिससे शाम तक 50 से 60 रूपये आसानी से इकट्ठे हो जाते थे।


उस दिन वर्ष 2018 में 23 वर्षों के लम्बे अंतराल के बाद जब एक बार पुनः वाइल्ड लाइफ पर एक गेस्ट लेक्चर देने हेतु मुझे मेरे अल्मा मेटर बुलाया गया तो मैं तुरंत सहर्ष तैयार हो गया था। और पंत नगर स्टेशन पर उतरते ही यादों की खूबसूरत दुनिया में खो गया। लगा कि अभी हॉस्टल पहुंच कर कॉलेज क्लास जाना है। पहले पंतनगर छोटी लाइन का छोटा सा लेकिन बहुत आकर्षक व प्रकृति से भरपूर स्टेशन हुआ करता था। जिसे देखकर मुझे मालगुडी डेज के मालगुडी स्टेशन की कल्पना होती थी। लेकिन अब यह एक बड़ी लाइन का बड़ा स्टेशन हो चुका है और इसके दोनों तरफ घनी बस्ती बस गई हैं। नगला की कई दुकानें अभी भी वैसी ही थीं। उस दौरान अधिकतर छात्र छात्राएं आगरा फोर्ट एक्सप्रेस या नैनीताल एक्सप्रेस, जिसे ‘एनटी’ नाम से जाना जाता था, से ही आते-जाते थे। हल्दी स्टेशन 1995 में शुरू हुआ था।

मैंने पहले ही मुझे स्टेशन से लेने के लिए कोई भी गाड़ी न भेजने का अनुरोध कर दिया था। पुरानी यादों को ताज़ा करने के लिए मैंने एक रिक्शा किया और उस रिक्शे से धीरे-धीरे अंदर जाने लगा। कुछ मीठी यादें, कुछ सुनहरे पल और वो पुराने दोस्त अचानक मस्तिष्क पटल पर उभर आए जब मैंने अपने अल्मा मेटर के उस विशाल परिसर में प्रवेश किया। मेरे अंदर कदम रखते ही फिशरीज कॉलेज के सामने लेटर बॉक्स अभी भी उसी जगह खड़ा था मानो पुरानी यादें लिए हुए मेरा इंतजार कर रहा हो। इन सड़कों पर दोस्तों के साथ बिताए पलों की कीमत सही मायने में उस दिन महसूस हुई थी। मीनाक्षी भवन के सामने खेतों को देखकर याद आया कि फर्स्ट ईयर में फौडर प्रोडक्शन के लिए हम लोगों ने स्वयं यहां बरसीम की खेती की थी। पंतनगर की हरियाली अभी भी उसी तरह हमारी यादों को संजोए खड़ी थी। रिक्शा वाला रिक्शे को सीधे लाइब्रेरी की तरफ ले जाने लगा तो मैंने उसे कब्रिस्तान तरफ वाले रास्ते से आगे बढ़ने के लिए कहा। क्योंकि जब हम लोग घर से लौटते थे तो अक्सर इसी रास्ते से रिक्शा जाया करता था। इस कब्रिस्तान पर भी रात के सन्नाटे में कई बार कोल्ड ड्रिंक्स की शर्त लगने पर हम लोग आए थे।

उस दिन हवा के सुहावने झोंके के साथ मैं पंत नगर में बिताए यादगार पलों में इतना खो गया था कि पता ही नहीं चला कि कब पैदल गेस्ट हाउस पहुंच गया। इससे पहले मैंने छोटी मार्केट के पास रिक्शे वाले से कहा था कि “मैं यहां से पैदल चलकर गेस्ट हाउस जाना चाहता हूं क्योंकि मैं आज अपने कॉलेज लाइफ के उन सुनहरे पलों को पूरी तरह से जीना चाहता हूं जो किसकी भी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल होते हैं”। इतने वर्ष बीतने के बाद भी ऐसा लग रहा है जैसे कल ही की तो बात थी।

छोटी मार्केट के आगे पहुंचने पर लाल रंग के वह हॉस्टल अभी भी जैसे हमारी यादों को समेटे हमारा इंतजार कर रहे थे। पर कुछ छात्रावासों का रंग बदल भी दिया गया था। मन कर रहा था कि सिर्फ मैं ही नहीं, उस समय के सारे छात्र छात्राएं जो इस यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे, एक बार सब आ जाएं। और एक दिन कम से कम वैसा ही जी लें, जो हमने नब्बे के दशक के पूर्वार्ध में जिया था।


बात 1990 की है जब मेरा सलेक्शन पंतनगर वेटेरिनरी कॉलेज में हुआ था। पर पंतनगर में उस समय चल रही साइने डाई (अनिश्चित कालीन बंद) के कारण हमारी क्लासेज 4 फरवरी 1991 से ही प्रारम्भ हो सकीं। सेशन लेट शुरू होने से सेशन को बहुत ही अधिक कंडेंस यानी मात्र तीन माह का कर दिया गया था। सुबह 9 बजे से शाम 5.30 तक पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय में ही गुजरने लगा। शुरुआत में शाम को नेहरू भवन भूत बंगला लगने लगता था क्योंकि सभी नए विद्यार्थी सीनियर्स द्वारा जबर्दस्ती बांटे जा रहे तथाकथित प्रेम भरे ज्ञान से बचने के लिए लाइब्रेरी, गेस्ट हाउस, नगला या CRC (crop research centre) या LRC (livestock research centre) की शरण ले लेते थे।

इंटरनेशनल गेस्ट हाउस में शाम को छिपकर बैठने पर यदि कोई सीनियर दिख गया तो नजरें झुका कर अखबार पढ़ना या फिर नजरें चुराकर टॉयलेट में चले जाना एक नियमित प्रक्रिया सी बनती जा रही थी। और हां वहां मैंने नोट किया कि वहां मैं अकेला ही ऐसा नहीं था। वहां पर बहुत सारे चेहरे प्रतिदिन दिखाई पड़ने लगे मैं समझ गया कि यह सब भी मेरे जैसे ही भाई बंधु हैं।

रात को खाने के समय ही कुछ नवागन्तुक छात्र हॉस्टल की कैफेटेरिया में प्रकट होते थे। वो भी सभी की कोशिश रहती थी कि किसी तरह 9:30 बजे के बाद पहुंचा जाए जब कैफेटेरिया बंद होने का समय होता है, और चुपचाप खाना खाकर अपने कमरे में भागा जाए। आलम यह था कि अगर दरवाजे पर हवा का झोंका भी आ जाए तो बस ऐसा लगता था कि अब पूरी रात थर्ड बटन कटने वाली है। सेकंड ईयर के छात्र फर्स्ट फ्लोर पर रहते थे और “क्लीन शेव बैच” के नए छात्र ग्राउंड फ्लोर पर। ऐसे में सीढी से किसीके भी उतरने की पद चाप दिल में सिहरन पैदा कर देती थी। लगता था कि अब कोई न कोई आकर ज्ञान बांटेगा। कभी-कभी तो पूरी रात ट्रेन का ड्राइवर बनकर हरिद्वार से देहरादून के बीच ट्रेन चलानी पड़ती थी। पूरी रात हररईवाला भररईवाला डोईवाला रायपुर होते हुए देहरादून तक ट्रेन चलाओ। और एक दिन तो पूरा बैच ही बिना रेलवे लाईन के पोल्ट्री फार्म की मुर्गियों के बीच ट्रेन चला रहा था। ये बात अलग है कि आज तक मुझे रेलवे टाइम टेबल में “नगला एक्सप्रेस” कहीं नहीं मिली ना ही इंडियन रेलवे ने उस ट्रेन को कभी चलाया है। लेकिन वह ट्रेन चली बहुत तेज थी।

हॉस्टल की नई जिंदगी कुछ गुदगुदाती, कुछ मुस्कुराती और सीनियरों से छुपती छुपाती आगे बढ़ रही थी। हां, वहीं जाकर पता चला कि “एडी, सीडी” भी कुछ होता है। इसी दौरान कुछ सीनियर्स मुझे सुभाष भवन (एग्रीकल्चर कॉलेज का हॉस्टल) ले गए और वहां जबरदस्त तथाकथित प्रेम भरा इंट्रोडक्शन लिया गया। अब नए छात्र सोच रहे होंगे कि सुभाष भवन तो गर्ल्स हॉस्टल है, तो मुझे वहां कौन पकड़ ले गया। उस समय केवल सरोजिनी और कस्तूरबा भवन ही गर्ल्स हॉस्टल होते थे तथा गांधी भवन और सुभाष भवन में BSc Ag के ब्वॉयज छात्र रहते थे।

गांधी हॉल ऑडिटोरियम में फ्रेशर फंक्शन में गूंजता विश्व विद्यालय गान “जय हो नव युग निधि की जय हो….” आज भी पूरी तरह कंठस्थ है। हां, फ्रेशर फंक्शन के बाद से वह गेस्ट हाउस में जाना और रात को सीनियर से बचने की कोशिश करना सब बंद हो गया। मगर ऐसा लगने लगा कि उसका भी एक अलग ही मजा था। नए तरीके के विषय, लैब और एक से एक विद्वान प्रोफेसर, इन सबमें जिंदगी घुलने मिलने सी लगी थी। एक चीज तो है यूनिवर्सिटी के अधिकतर शिक्षक गजब की नॉलेज रखते थे और छात्रों को सीखाने में जी तोड़ मेहनत करते थे। पहली क्लास बायोकेमिस्ट्री की थी। जिसकी याद आज भी मन को उन खूबसूरत दिनों में खींच ले जाती है। एक और मजेदार बात थी पंतनगर में एग्जाम तो कभी हुआ ही नहीं “आवरली” (एक घंटे के एग्जाम को पंतनगर में hourly कहते थे) ही हुईं। फर्स्ट सेमेस्टर में सभी छात्र लाइब्रेरी से पुस्तकें लेने की जल्दीबाजी में लग गए। लेकिन फाइनल एग्जाम तक समझ आ गया कि बस नोट्स ही पर्याप्त हैं। एक विषय में तो मात्र डेढ़ पेज के लिखे हुए को पढ़कर आवर्ली देना नया अनुभव था।

कुछ नए छात्रों में जबरदस्त होम सिकनेस थी। और कुछ तो ऐसे घुटे हुए थे कि ऐसा लग रहा था जैसे कि हॉस्टल में आकर ज्यादा स्वतंत्र और ज्यादा आबाद हो गए हैं। उस साल होली 1 मार्च को थी और 26 फरवरी को ही ज्यादातर छात्र अपने घरों को रवाना हो रहे थे। हां, उस दिन हॉस्टल में एक गाना बहुत बज रहा था, जो आज भी मेरे कानों में घूमता रहता है, “रंग लेके दीवाने आ गए…..होली के बहाने या गए….”। और उस पर नाचते झूमते हॉस्टल की पहली होली सबने खेली थी। हॉस्टल से पहली बार घर जाना सभी के लिए एक न भूलने वाला अनुभव होता है। लेकिन हमारे बैच में एक महान आत्मा थी जो त्यौहारों पर भी अकेले ही हॉस्टल में रहना पसंद करता था। एक बार तो उसके कमरे की हम सबने ज़बरदस्ती सफाई करवाई तो पूरे तख्त के नीचे कई किलो मूंगफली के छिलके फेंके हुए थे। एक बात थी, वह गजब की मेमोरी रखता था और अपने कमरे में हाथ पर बोर्नविटा रखकर चाटता था। मगर था बड़ा नेकदिल और सहज स्वभाव वाला।


हालांकि यूनिवर्सिटी के गांधी हॉल में हर शनिवार और रविवार को छात्रों द्वारा चयनित फिल्में दिखाई जाती थीं। लेकिन कभी कभी ट्रेन से WT हल्द्वानी या बरेली जाकर फिल्म देखना आज भी बेहद यादगार लगता है। हॉस्टल में उस समय बजने वाले गाने आज भी मुझे तुरंत कॉलेज की यादों में पहुंचा देते हैं।

मेरा रूममेट रूद्रपुर का था इसलिए शनिवार दोपहर से सोमवार सुबह तक व छुट्टी के दिन अकेले ही कमरे में काटना मुझे अखरता था। मैने यह बात कभी उससे नहीं कही। लेकिन शायद इसे पढ़ने के बाद वह मुझे जरूर फोन कर जबरदस्त दोस्ताना भाषा का प्रयोग करने वाला है, यह मैं जानता हूं। उसके साथ एक छत के नीचे काटे पांच साल अविस्मरणीय थे। आज भी जब मिलते हैं तो लगता है कि कल ही की तो बात है। वह एक शानदार गायक था और मुकेश साब के गाने हुबहू गाता था। रात को सोने से पहले अक्सर मैं उससे “दिल ने फिर याद किया बर्क़ सी लहराई है, फिर कोई चोट मुहब्बत की उभर आई है..” सुनता था।

हमारे बैच में सरकारी कोटे से कुछ उम्रदराज एलडीए (लाइवस्टोक डेवलपमेंट असिस्टेंट) भी पढ़ने आए थे। उसमें से एक तो लगभग रिटायरमेंट के करीब थे वह बहुत मेहनत करते थे। हां, यह जरूर अच्छी बात है कि हमारे साथ के पांचों जो एलडीए थे, उन्होंने बहुत अच्छे अंको से समय पर डिग्री पूरी कर ली।

लेकिन जिंदगी कभी कभी कुछ ऐसे समाचार सुनाती है जो आदमी को अंदर से हिला भी देते हैं और भविष्य के लिए मजबूत भी कर देते हैं। ऐसी घटना हमारे पहले सेमेस्टर के बीच में हुई जब मेरे एक सहपाठी, जिससे मेरी अच्छी मित्रता भी हो गई थी, की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। पंतनगर में हॉस्टल लाइफ के कुछ महीनों के अंदर ही इस समाचार ने पूरे बैच को स्तब्ध कर दिया।

कभी-कभी कुछ छात्र अपने भविष्य को भी किसी के प्रति एक तरफा लगाव के कारण दांव पर लगा देते हैं। ऐसा ही हमारे एक सहपाठी ने भी किया। जब उसके मार्क्स कम आने लगे और उसकी “ए-पी” (academic probation) लग गई तो हमारे बैच के लगभग सभी छात्रों ने उसे समझाया। लेकिन वह इस कदर परेशान और डिप्रेशन में जा चुका था कि वह उस एक तरफा प्रेम से उबर नहीं सका। और फाइनल एग्जाम के बाद उसके मार्क्स इतने कम हो गए कि उसको यूनिवर्सिटी छोड़नी पड़ी।

मेरे रूम के ठीक बगल में रहने वाला एक अन्य छात्र बहुत ही मेहनती था और टेबल टेनिस का जबरदस्त प्लेयर भी था। उसकी कोई बुरी आदत भी नहीं थी। वह मेहनत भी बहुत करता था लेकिन किसी कारणवश उसके मार्क्स कम आ रहे थे। जिन्हें उसने कवर भी करने की कोशिश करी। और जब फर्स्ट ईयर के फाइनल एग्जाम के अंतिम सब्जेक्ट के ग्रेड की लिस्ट लगी तो उसमें उसकी डी ग्रेड देखकर वहां खड़े सभी छात्रों को बहुत दुख हुआ। क्योंकि यूनिवर्सिटी में बने रहने के लिए उसे इस विषय में कम से कम बी ग्रेड लाने की जरूरत थी। हम जब कॉलेज से हॉस्टल लौट रहे था तभी रास्ते में वह मुझे मिला। हालांकि मैंने उससे नजरें चुराने की कोशिश करी लेकिन वह मुझसे पूछ बैठा कि “मेरी ग्रेड देखी क्या”? लेकिन मैंने कहा “नहीं मैं देख नहीं पाया तुम्हारी ग्रेड” और वह आगे बढ़ गया। मैं जानता था कि मैं उसे नहीं बता सकता था कि मेरे दोस्त अब इस कैंपस में तुम्हारा समय पूरा हो गया है।

मैं निराश होकर हॉस्टल की छत से उस रास्ते की तरफ देख रहा था जहां से वह कॉलेज से वापस लौटने वाला था। दूर से उसके बोझिल कदम बता रहे थे कि वह टूट चुका है। सचमुच उसने बहुत मेहनत करी थी और हम सबको उम्मीद थी कि वह ड्रॉप नहीं होगा। वह धीरे-धीरे हॉस्टल आया और किसी से कुछ नहीं बोला और ना ही हम सब की हिम्मत पड़ी की उसको कुछ बोलें। यह तय हुआ था कि कुछ देर बाद उसके रूम पर जाएंगे और उसको समझाएंगे। और हम सभी शाम को उसके रूम पर जब गए, तो वह अपना सारा सामान लेकर चुपचाप बहती हवा सा हॉस्टल छोड़कर जा चुका था। हमें बड़ा कष्ट हुआ कि हम उसी समय उससे क्यों नहीं मिले। यह आज भी मुझे बहुत कचोटता है। हालांकि तीन वर्ष पूर्व किसी प्रकार उसका फोन नंबर मिलने के बाद मैंने उससे बात करी तो मालूम हुआ कि वह हल्द्वानी में एक सफल और अच्छी जिंदगी जी रहा है।

थर्ड ईयर में हम पंत भवन हॉस्टल शिफ्ट हो गए। लेकिन इसी दौरान हमारे एक और साथी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। हम सब उसे हॉस्टल में “लालू” बुलाते थे और वह इस नाम को बहुत एंजॉय करता था, बड़ा जिंदादिल हंसमुख था वो। सचमुच लालू तुम्हारा वह हंसता चेहरा आज भी बहुत याद आता है। सबको रूला दिया था तुमने।

अब जब पंतनगर के हॉस्टल में विद्यार्थी रह रहे हों तो अध्यापकों का तो निक नेम रख ही दिया जाता था। लेकिन आपस में भी स्टूडेंट्स के बड़े मजेदार निक नेम होते थे। लालू का उल्लेख तो ऊपर किया जा चुका है। लेकिन हमारे हॉस्टल में बैल, सनम, चाउ-माऊ, आरसी, क्रेजी, बुड्ढा, मूडी, सैंडी, आरपी, डीके, पीके, टायसन, छमिया, यंग लेडी, फैनी और यहां तक कि कट्टा तक रहते थे। कुछ तो परमानेंट “सी-पी” (conduct probation) पर रहते थे। इन “सी-पी” वाले महानुभावों के कारण कभी-कभी कुछ सीधे-साधे छात्रों और “एसकेजे” लोगों की भी “डी सी” हो जाया करती थी।
यह पंतनगर की “एसकेजे” ब्रीड भी विचित्र होती थी, बस अपने में मस्त। बड़ा मजेदार ग्रुप होता है इनका। लेकिन अच्छी बात थी कि इन्हें “एडी सीडी” से कोई मतलब नहीं होता था। बस सजना-संवरना और “ढाई नंबर” (g…. Hostel)का चक्कर मारना। हां, इनमें से एकाध कभी कभार मौका लगने पर सूट्टा भी मार लेते थे।

एक हमारे सीनियर थे बड़े ही शानदार गायक, एंकर और अलमस्त जिंदगी जीने वाले। पर उनकी खासियत यह थी कि वह शायद ही पूरी डिग्री के दौरान कभी अपने रूम पर रहे हों। वह अपने सुपर सीनियर्स के रुम में ही पड़े रहते थे। और इनसे बिलकुल अलग एक सज्जन तो ऐसे भी थे अगर आप उनके कमरे में पहुंच गए तो ज़बरदस्ती दुःख भरी गजलें ही सुनाया करते थे।


पंतनगर में शाम को मार्केट जाने का बहुत क्रेज रहता था। भले ही कोई काम हो या ना हो लेकिन शाम को “मार्केटोलॉजी” जरूर करनी है। बड़ी मार्केट शाम को यूनिवर्सिटी के छात्रों से भर उठती थी। कोई दुकान पर जूस पी रहा होता था तो कोई रसगुल्ले खा रहा होता था। कहीं चाय की दुकान पर कुल्हड़ लिए छात्र छात्राएं तो कहीं कोल्ड ड्रिंक्स पीते नौजवान। मगर एक दुकान ऐसी थी जहां आर्चिस कार्ड्स खरीदने की होड़ सी लगी रहती थी। उस दुकान की इन कार्ड्स से गजब की कमाई होती थी। अब छात्र इन कार्ड्स का क्या करते थे यह बताने की जरूरत नहीं है। एक बार इसी बड़े मार्केट में मेरे एक मिर्जापुर के मित्र ने रसगुल्ले खाने की शर्त लगा ली और मैं भी जोश में सभी से अधिक रसगुल्ले खा गया।
तब मोबाइल फोन होते नहीं थे। और सब छात्रों के घरों में फोन भी नहीं होते थे तो वह किसी ना किसी के माध्यम से फोन करके अपना समाचार घर पहुंचाते थे। और एकमात्र पीसीओ पर शाम को फोन करने वालों की अच्छी खासी भीड़ इकट्ठी हो जाती थी। वह चिट्ठियों का दौर था। चिट्ठी लिखना और चिट्ठी का इंतजार करना बहुत ही सुखद लगता था। विशेषकर दोपहर में खाना खाने के लिए जब छात्र हॉस्टल लौटते थे तो रूम का दरवाजा खोलते ही देखते थे कि दरवाजे के नीचे से कोई चिट्ठी तो नहीं आई है। और यदि कोई चिट्ठी आई होती थी उसको बार-बार पढ़ना दिल में रोमांच पैदा करता था। मैंने देखा इन तेईस वर्षों बाद भी पंतनगर पोस्ट ऑफिस का वो लोहे का पोस्ट बॉक्स आज भी वहीं खड़ा है। मैं लगातार उसको निहारता रहा कि यह पोस्ट बॉक्स हमारे परिवारों से उन पांच वर्षों में लगातार संवाद कायम रखने का जरिया बना रहा।
पंतनगर में एक कहावत है कि जब वहां से एक छात्र हॉस्टल में रहने के बाद डिग्री लेकर निकलता है तो वह एक ट्रक आलू खा चुका होता है। हालांकि है यह एक अतिशयोक्ति है लेकिन इसमें वास्तविकता भी है। पंतनगर में सुबह की शुरुआत आलू के पराठे से होती थी। उस स्वादिष्ट कुरकुरे आलू के पराठे पर लगा हुआ बटर और उसकी प्यारी सी महक की यादें आज भी मुंह में पानी भर देती है। बुधवार को कैफिटेरिया में स्पेशल सब्जी और अंडा खाने वालों के लिए अंडा करी और मीट के कहने ही क्या थे। और संडे का मजा तो फ्रूट क्रीम में था। एग्जाम के दिनों में रात 12:00 बजे चाय का इंतजाम बहुत ही कम होस्टलों में देखने को मिलता है। एक और मजेदार बात ये थी कि कैफेटेरिया में बैठे हुए संचालक से बचाकर एक भी अतिरिक्त रोटी खाना संभव नहीं था। कितना भी आप कोशिश कर लीजिए अगर आप उनके सामने थाली नहीं ले गए, तो भी वह दूर से ही देखकर पहचान जाते थे इसकी थाली में कितनी रोटी और कौन कौन सी सब्जी और अचार हैं। गजब का हिसाब रखने की कला थी उनमें। हॉस्टल में सिर्फ दूध की चाय जिसे सब “टिल्क” बोलते थे, बड़ी ही प्रसिद्ध थी। अगर बात करें रोडसाइड ईटेबल्स की, तो चाकू अंकल की कॉफी और चाय लाजवाब होती थी। इंजीनियरिंग के अधिकतर छात्र छोटी मार्केट में देखे जाते थे। और वहां भी आंटी जी की दुकान का खाना और पराठा लाजवाब होता था।

पंतनगर का किसान मेला कहने को तो किसान मेला होता था लेकिन छात्र मेला ज्यादा दिखाई पड़ता था। किसानों से ज्यादा छात्र वहां पर दिखाई देते थे। हालांकि छात्र बहुत मेहनत भी करते थे किसान मेले में। लेकिन साल में लगने वाले दो किसान मेलों का सभी को बड़ा इंतजार रहता था। और उन तीन दिनों में सब छात्र सुबह से लेकर शाम तक किसान मेले में ही दिखाई पड़ते थे। कभी-कभी क्लास बंक करके इधर-उधर घूमना या घर चले जाना भी एक गुदगुदाने वाला अनुभव था। अक्सर किसी आने वाले त्यौहार की छुट्टियों से दो दिन पहले ही डिसाइड हो जाता था कि अब कोई भी क्लास नहीं जाएगा। जिससे कि अटेंडेंस शार्ट ना हो और इस कार्य में सभी छात्र गजब की एकता दिखाते थे। यहां तक कि डे-स्कॉलर भी साथ देने में पीछे हटते नहीं थे। कुछ छात्र यूनिवर्सिटी की छोटी छोटी पुलिया पर बैठकर गप्पबाजी करते थे। पंतनगर की भाषा में इसे “पुलियोलॉजी” कहा जाता था। जिससे परेशान होकर प्रशासन ने सारी पुलिया तिरछी करवा दी थीं जिससे कि छात्र उस पर ना बैठ सके।

गांधी हॉल/ऑडिटोरियम की पहली मंजिल पर स्थित डीआर रेस्टोरेंट में जाकर कॉफी पीना, और वह भी क्लास बंक करके, बड़ा ही आनंद देता था। लेकिन एक दिन तो तब गजब ही हो गया जब हम लोग वहां बैठे कॉफी पी रहे थे। और जिन प्रोफेसर साहब की हम क्लास बंक करके आए थे, क्लास लेने के बाद वह भी वहीं पहुंच गए। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उस समय हमारी क्या स्थिति हुई होगी।

कुछ टेक्नोलॉजी और एग्रीकल्चर के भी छात्र थे जो अपना हॉस्टल छोड़कर अक्सर हमारे हॉस्टल में रुका करते थे और उनमें से एक तो गजब का वेटनरी साइंस का प्रेमी था। और वह रात को भी अक्सर हमारे हॉस्टल में रुक जाया करता था। और उसको स्यूडो वेटेरिनरीयन भी कहा जाता था। यदि रात को वार्डन हॉस्टल चेक करने आते थे तो उसे कई बार बाथरूम में या तखत के नीचे भी छुपाना पड़ा था। इसका उल्टा भी था मैं भी अक्सर पटेल भवन या विश्वेश्वरय्या भवन में रुक जाता था। ऐसी ही खट्टी मीठी यादों के साथ एक अलमस्त सी जिंदगी आगे बढ़ रही थी।
आइए पंतनगर की खूबसूरत लाइब्रेरी का रुख करते हैं। सचमुच लाइब्रेरी की बिल्डिंग अपने आप में वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। इतनी शानदार और इतनी सुंदर और इतनी बड़ी लाइब्रेरी मैंने पहले कहीं किसी भी विश्वविद्यालय में नहीं देखी थी। यह पंतनगर के छात्र के लिए गौरव का विषय थी। जहां पर हर प्रकार की पुस्तकें जर्नल्स और न्यूज़पेपर एक जगह पर मिल जाते थे। वहीं पर मैने भी लाइब्रेरी का कैटलॉग देखना सीखा। लेकिन कुछ छात्र वहां पढ़ने कम और वहां के ठंडे वातावरण में बैठने के लिए ज्यादा जाते थे। स्वभाविक है छात्र जीवन इन्हीं खट्टे मीठे अनुभव का एक शानदार मिश्रण होता है जो आगे चलकर आपके व्यक्तित्व को निखारता है। और पंतनगर के छात्र होने के कारण यह निखार होना तो स्वाभाविक ही है।

चलिए, एक बार फिर हॉस्टल कि उन्हीं सड़कों पर चलते हैं। अर्धचंद्राकार सड़क के किनारे लगभग एक जैसे लाल रंग के बने हुए हॉस्टल बहुत ही खूबसूरती से एक ज्योमैट्रिकल विन्यास के बनाए गए थे। ज्यादातर अगल-बगल के हॉस्टल एक दूसरे की मिरर इमेज हुआ करते थे। प्रत्येक हॉस्टल से उस हॉस्टल में रहने वाले छात्रों के महाविद्यालय की दूरी बराबर होती थी। और हर महाविद्यालय से सेंट्रल लाइब्रेरी एवं विश्वविद्यालय के ऑफिस, बैंक, कुलपति कार्यालय एवं ऑडिटोरियम की दूरी भी बराबर थी। हॉस्टल्स की अर्धचंद्राकार सड़क के अंदर वाली अर्धचंद्राकार सड़क पर महाविद्यालय थे एवं सबसे बीच में विश्वविद्यालय का प्रशासनिक भवन एवं लाइब्रेरी स्थित थे।

पंतनगर विश्वविद्यालय 1960 में प्रारंभ हुआ था एवं इसका निर्माण इलिनॉइस यूनिवर्सिटी यूएसए के सहयोग से किया गया था। चारों तरफ फैली हरियाली और बहुत ही खूबसूरती से बनाई गई सड़कें, उनका वृक्षारोपण और बिल्डिंग अपने आप में स्थापत्य कला का एक अनूठा उदाहरण है। इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों के टैगोर भवन, पटेल भवन, सिल्वर जुबिली और विश्वेश्वरय्या भवन के आसपास बड़ा ही मनोरम प्राकृतिक दृश्य दिखता था। बीटेक के छात्रों की संख्या अधिक होने से उनके हॉस्टल भी अधिक थे। बीटेक का एक जूनियर था। वह खेल कूद का बड़ा शौकीन था, मैं अक्सर उसके रूम पर या वह मेरे रूम पर आता था। बड़ा खुश मिजाज और हाज़िर ज़वाब था वो। और मुझे लगता था कि उसकी मंजिल कहीं और है। और सही में बीटेक के बाद ही वह आईपीएस हो गया। कुछ वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ में उससे मुलाकात हुई। बहुत गर्मजोशी से मिला वह।


पंतनगर की इन्हीं सड़कों, भवनों, हॉस्टलों और “ट” कॉलोनी और “झ” कॉलोनी की गलियों में जिंदगी के कब पांच साल निकल गए पता ही नही चला। अब सभी छात्र अपने भविष्य के बारे में चिंतित थे। कोई जॉब करना चाहता था। कोई प्राइवेट क्लिनिक खोलने का इच्छुक था और कोई पोस्ट ग्रेजुएशन करने की तैयारी कर रहा था। अगर देखा जाए तो मैं कुछ भी सोच समझ सकने की स्थिति में नहीं था। बस ऐसा लगता था कि अब हॉस्टल की यह दीवारें, यह आम के पेड़ और इंटरनेशनल गेस्ट हाउस के पास खड़ा विशाल पीपल का दरख़्त यानी “मोक्ष स्थल”, जिसके नीचे अकसर मैं अपने दो सीनियर्स के साथ जाकर बैठ जाया करता था, अब छूट जाएगा। और इनकी यादों के सहारे आगे बढ़ना पड़ेगा क्योंकि कॉलेज लाइफ के ये पल अब कभी नहीं लौटने वाले थे। पूरे हॉस्टल में एक गम भरा सा माहौल देखने को मिलता था। सभी छात्र एक दूसरे का घर का पता नोट करने लगे थे। क्योंकि तब फोन होते नहीं थे और चिट्ठियों से ही बातें हुआ करती थीं।
“राकेश यह पल हमें बहुत याद आएंगे” मेरे मित्र ने हॉस्टल की पुलिया पर अपना हाथ मेरे कंधे पर रखते हुए धीमे से कहा। मेरे सामने पंतनगर में बिताये खूबसूरत पल किताब के पन्नों की तरह पलटने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे कल ही की तो बात थी जब आगरा फोर्ट एक्सप्रेस से सुबह-सुबह उतरकर रिक्शा करके सेंट्रल लाइब्रेरी के सामने एडमिशन फीस जमा करने लाइन में खड़े थे। और देखते-देखते पांच साल पंख लगा कर निकल गए।

मैं बोझिल मन से अंतिम बार चाकू अंकल की दुकान की तरफ बढ़ गया। लेकिन वहां भी तीन चार छात्रों का ग्रुप बैठा हुआ यही बात कर रहा था कि आज रात के बाद ना जाने कब मुलाकात होगी। मेरा मन बहुत उदास था फिर भी मैंने चाकू अंकल की कॉफी अंतिम बार धीरे-धीरे सिप करी। लेकिन जैसे चाकू अंकल की दुकान पर हंसी ठिठोली होती थी उस रात वह सब कुछ नहीं था। छात्र वहां बैठे पुरानी यादों को ताजा करते हुए भारी मन से एक दूसरे से विदा ले रहे थे। रात के अंधेरे में मैं अपने कॉलेज को निहारने के लिए उस तरफ बढ़ा। मुझे याद है वह चांदनी रात थी और जितना खूबसूरत हमारा महाविद्यालय उस दिन लग रहा था उतना कभी नहीं लगा था। कितनी यादें जुड़ी थी इस महाविद्यालय से जिसने हमें इस मुकाम पर पहुंचाया। मगर अब वह छूटने वाला था। उसमें अब कभी क्लास नहीं करनी थी। मन कर रहा था कि क्या कल एक और क्लास नहीं हो सकती? लेकिन वक्त नहीं रुकता….।

मैं अपने अन्य साथियों से मिलने के लिए वापस हॉस्टल आया और अपने मित्र के रुम में गया वह अपना बेडिंग बांध रहा था। मुझे देखते ही उसकी आंख भर आई, वह बोला “यार अच्छा नहीं लग रहा है”। लेकिन हम एक दूसरे को बस दिलासा ही दे सकते थे। हमारे हॉस्टल से कुछ छात्र जा चुके थे। कुछ निकलने की तैयारी में थे। और कल तक लगभग सभी अपने अपने गंतव्य की तरफ निकल जाने वाले थे। हॉस्टल की विंग में लगातार होने वाला छात्रों का शोर अब एक भयानक खामोशी में बदल चुका था। कुछ कमरों की लाइट ऑफ थी और दरवाजे खुले हुए थे, जो यह बता रहे थे कि इन कमरो के छात्र अपने हॉस्टल लाइफ को पूरा करके अपने गंतव्य की तरफ बढ़ चुके हैं।

चांदनी की परछाई में मुझे दो-तीन साए छत पर घूमते हुए दिखे। मैं भी उत्सुकता वश हॉस्टल की छत पर चला गया वहां पर तीन छात्र एक दूजे के कंधे पर हाथ रखकर घूम अवश्य रहे थे। लेकिन आपस में कोई बात नहीं कर रहे थे। एक छात्र दूर खड़ा हॉस्टल के पीछे स्थित महाविद्यालय को निहार रहा था। दूर सड़कों पर जलते हुए लैंप पोस्ट के चारों ओर अंतहीन चक्कर लगाते कीड़े मकोड़े और आकाश को छूते हुए विशाल दरख़्त चांदनी रात में बड़े ही खूबसूरत लग रहे थे। लेकिन अब इस हरियाली और शांत वातावरण से दूर जिंदगी की दौड़, आपाधापी, द्वंद और महानगरों के कोलाहल में शामिल होने के लिए हमें जाना ही था। हम सभी बिना बोले सामान पैक करने अपने-अपने रूम में वापस आ गये। हम कुछ-कुछ देर पर हॉस्टल के बाहर अपने मित्रों को छोड़ने आ रहे थे।

और फिर वह समय भी आ गया जब हॉस्टल में बचे हुए थोड़े से हमारे बैचमेट्स मुझे रिक्शे तक छोड़ने आए। हमने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दी। और मैं भारी मन से रिक्शे पर बैठ गया हम लोग दूर तक एक दूसरे को हाथ हिला कर विदा कर रहे थे….। मेरा रिक्शा कब्रिस्तान के रास्ते से मंद-मंद चलती हवा के बीच धीरे-धीरे बाहर की तरफ बढ़ रहा था। रिक्शेवाले के मुंह से निकलती सिटी की धुन “रात ये बाहर की फिर कभी ना आएगी, दो-एक पल और है यह समा, सुन जा दिल की दास्तां, ये रात ये चांदनी फिर कहां……….” सचमुच माहौल को और गमगीन बना रही थी। मैंने देखा दूर क्षितिज पर फैली चांदनी थोड़ी सी धूमिल पड़ गई थी और चांद को बादलों ने अपने आगोश में ले लिया था ।