लव यू ज़िंदगी

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Dr. Kamal Musaddi

रोज की तरह आज भी कालोनी के पार्क में चौपाल लगी थी। सुबह पाँच बजे और शाम 6 बजे कालोनी के सभी सीनियर सिटीजन पार्क में एकत्रित होते । कुछ योगा करते ,कुछ टहलते और  कुछ बेंच पर बैठ कर अपने सुख दुख बटाते ।सुख के विषय होते सरकारी सुविधाओं का बढ़ना,मंहगाई भत्ता या अन्य रेल या चिकित्सा संबंधी सुविधाये। कभी कभी मकान के नवीनीकरण अच्छे नौकर मिल जाना आदि भी होता । दुख की चर्चा में अधिकतर शारीरिक कष्ट ,नाते रिश्तेदारों की स्वार्थपर्ता अथवा मकान मालिक के होने के बंधन की घुटन होती।

सबसे बड़े दुख की चर्चा होती अपनी निज जी संतानों से मिली उपेक्षा एवं तिरस्कार। ऐसे दुख के भागीदार अक्सर अवशाद में रहते और चर्चा करते समय हर किसी का ये प्रयास होता कि वो अपने दर्द को दूसरे के दर्द से बड़ा बनाकर बताए।ताकि उसके हिस्से में अधिक सहानुभूति आये और वह स्वयं को अधिक जस्टिफाई कर सके।

पुरुषों की स्थिति जैसी ही महिलाओं की भी स्थिति थी। उनकी चर्चा का विषय भी कुछ ऐसा ही होता कि कैसे उन्होंने कष्ट शह कर बच्चों को पाला,कैसे बेटे को पढ़ाया लिखाया, आना जाना सोना खाना सब कैसे त्याग पूर्ण जीवन जिया।

उनकी चर्चा में ये भी शामिल होता कि जब वो व्याह कर आई थीं तो नजे ही वाशिंग मशीन थी न मिक्सी घर मे सदस्य भी ज्यादा थे और कठोर अनुशासन समर्पण के बावजूद उन्होंने बच्चे भी पाले और हर रिश्ते को निभाया।मगर आज कल की बहुएँ सास -ससुर को बोझ समझती हैं।अपने मन का करती हैं,और उनके घर जाकर हमारी स्थिति नौकरों सी हो जाती है सिर्फ बच्चों की देखरेख वाली।अधिकांशतः लोग अपनी अपनी मनः स्थिति के कई कई संस्करण प्रस्तुत कर चुके थे।मगर उनकी कथा असमाप्त होती और दर्द और अवशाद लाइलाज।

गुप्ता दंपति इसी कालोनी में रह रहे अपने बेटे बहू के पास आये थे।गुप्ता जी बैंक से रिटायर हुए थे।बेटा बहू दोनों नौकरी करते थे और शाम को वो बेटे की डेढ़ वर्ष की बेटी के साथ पार्क जाते थे । बच्ची चलना सीख गई थी ,वो घास पर फुटपाथ पर दौड़ती तो गुप्ता जी भी उसके पीछे भागते। उन्हें पोती के साथ भाग दौड़ करते देख करूँ सीनियर सिटीजन समाज का ध्यान उनपर जाता। फिर उनमें से एक ने आगे बढ़कर उनसे परिचय किया तो गुप्ता जी ने बताया साहब सरकारी नौकरी से रिटायर हो गया हूं।मगर परिवार की नौकरी का आनंद अब ले रहा हूँ। जब मेरे बच्चों का जन्म हुआ था तो उनको बाल लीलाओं का आनंद नहीं ले पाया। क्योंकि माता पिता नौकरी और परिवार के दायित्यों ने वो आनंद लेने नही दिया।अब इसकी बाल लीलाओं में अपने बेटे का बचपन देखता हूं। दिन कैसे बीत जाता है पता ही नही चलता। बेटे बहु सुबह चले जाते हैं और  मैं और मेरी पत्नी इसकी देख रेख में ऐसे व्यस्त होते हैं कि न बीमारी याद रहती है और न बुढापा । सच कहूँ तो अब ज़िंदगी का आंनद आ रहा है। मैं भी खुश पत्नी भी और  बेटा  बहू भी संतुष्ठ । कह कर गुप्ता जी ने बच्ची को गोद में उठाया और  बच्ची से कहा ।सारे बड़े लोगों को टाटा करो और दादी लोगों को भी। बिटिया तोतली जुबान में बोली बाबा ताता। उसकी नंन्ही हथेली जैसे उन सबको खुशी का संदेश दे आयी थी।

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