क्या करेगा चांद, क्या करेगी चांदनी?

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pankaj Vajpayee
Dr. Suresh Awasthi

क्या करेगा चांद, क्या करेगी चांदनी? कविता की यह पंक्ति कई बार विशेष स्थितियों में याद आती है? उस दिन एक ठेकेदार साहब के संग बैठने का मौका मिला। सड़क बनाने के ठेके की डील हो रही थी। जिस व्यक्ति ने ठेका दिलाने का वादा किया था, वह एक साहब को लेकर आया था। साहब जी ने ठेकदार जी को बताया कि आनलाइन टेंडर पास कराने से पहले 15 प्रतिशत ऊपर जमा करना होगा? टेंडर पास होते ही 15 प्रतिशत और जमा करना होगा। इसके बाद पहली किश्त का चेक जारी होगा। 10 प्रतिशत मुख्य अभियंता को देना होगा। बाद में दस प्रतिशत और देने पर गुणवत्ता का प्रमाणपत्र मिल जायेगा तो दूसरी किश्त का सिलसिला शुरू होगा। ठेकेदार ने उंगलियों पर गणित लगाई। 40 प्रतिशत गया। फिर उसने उन साहब से पूछा कि आप की सेवा क्या होगी? उन्होंने जवाब दिया केवल पांच प्रतिशत। जिन सज्जन ने उन्हें उन साहब से मिलवाया था, उनका हिस्सा पूछा गया तो पूरे दांत निकाल कर बोले, अपना क्या अपना तो पांच प्रतिशत से भी काम चल जायेगा परंतु क्षेत्र के दादाओं को पांच प्रतिशत देना पड़ेगा नहीं तो वे सामान उठवा देंगे। पुलिस भी कुछ नहीं करेगी। ठेकेदार ने फिर जोड़ लगाया अर्थात 57 प्रतिशत की घूस खर्च कर दूं तो ठेका तय। दोनों ने उत्साह से कहा, बिलकुल पक्का। ठेकेदार ने कहा और यदि मैं इतनी मोटी रकम लगा कर 25 प्रतिशत भी कमा लूं तो 85 प्रतिशत खर्च अर्थात एक रुपये में 15 पैसे जनता की सेवा में? उनमें से एक चहक कर बोला, यह तो काफी है यहां तो 10 पैसे भी नहीं पहुंचते और सब कुछ धड़ल्ले से चल रहा है। मैं सोच रहा था कि जब व्यवस्था ऐसी हो तो सड़क पर तारकोल ही चुपड़ा जा सकता है। उसे जनता उखाड़े या कोई और? ऐसे में क्या करेगा चांद, क्या करेगी चांदनी?

भूख के कई रंग होते हैं। एक भूख वह जो गुदड़ी में पलने वाले बच्चों की होती है जो माँ की सूखी छाती से मुश्किल से बुझती है। यह भूख खाली पेट होने पर लगती है। दूसरी भूख वह होती है जो भरे पेट वालों को लगती है। पहली भूख्र भीख मांगने की हद तक चली जाती परंतु वह दूसरों का हिस्सा छीन कर नही खाती परंतु दूसरी भूख दूसरों के मुंह से इस स्टाइल से निवाला छीनती है कि सामने वाले को लुट जाने का पता ही नहीं चलता। देश के विकास में लगे तमाम लोगों की यह भूख बढ़ती जा रही है। ऐसे में हर शहर को एक अन्ना हजारे चाहिए? अब अन्ना तो एक ही है। तो फिर सवाल पैदा होता है-क्या करेगा चांद, क्या करेगी चांदनी? देश के पर शहर में कोई न कोई सड़क खुदती रहती है। किसी के लिए यह खुदाई मुसीबत बनती है तो कुछ के लिए वरदान। जितनी गहरी खुदाई होगी, कमाई का कद उतना ही ऊंचा होगा। अभी उस दिन एक रोड पर मिïट्टी ऐसी धसकी कि एक कार का भू प्रवेश हो गयी। पता चला कि वहां भरी जाने वाली मिïट्टी पड़ोस के एक प्लाट को भरने के लिए बेच दी गयी थी। अब किसी की मिïट्टी कुटे तो कुटे। कोई चलता फिरता व्यक्ति मिïट्टी में तब्दील हो जाये तो हो जाये उन्हें क्या? उनकी तो मिïट्टी सोने की हो रही है। जब व्यवस्था अव्यवस्था की पर्याय बन जाये तो फिर वही सवाल- क्या करेगा चांद, क्या करेगी चांदनी? हर रोज एक दो हत्याएं? आला अफसरों की नाक के नीचे हत्या? घर के भीतर घुस कर हत्या? भरी बाजार में हत्या? हमारी समझ में जब कोई हत्या होती है तो केवल एक व्यक्ति की नहीं होती। उसके साथ उसके घर परिवार, विश्वास,नि:श्चिंतता, सामाजिक संतुलन के साथ कानून की भी हत्या होती है। अब कानून अपने ही हत्यारों के प्रति गंभीर नहीं होता तो फिर वही सवाल- क्या करेगा चांद, क्या करेगी चांदनी? सच तो यह है-
न चांद सुरक्षित है
और न चांदनी
सब के सब बीमार
तबीयत अनमनी
मुंह बाये समस्याएं
जायें तो कहा जायें
किस किस से लड़ें
किस किस को समझाएं ?
मिल कर मातम मनाएं
या फिर एकजुट हो
देश को बचाएं।

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