मैं पुलिस वाला कहलाता हूँ

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डॉ राकेश कुमार सिंह, वन्य जीव विशेषज्ञ

दुनिया जब सोती है,
मैं गश्त पर निकल जाता हूँ;
दोपहर की धूप में खड़ा,
तो कभी बारिश में भीगता नजर आता हूँ;
जी हाँ, मैं पुलिस वाला कहलाता हूँ।।

ना बहना संग राखी,
ना परिवार संग गुलाल उड़ा पाता हूँ;
जब दुनिया आतिशबाज़ी करती है,
मैं अन्धेरी सड़कों पर दिवाली मनाता हूँ;
जी हाँ, मैं पुलिस वाला कहलाता हूँ।।

कभी अपराधियों से मोर्चा,
कभी उन्मादी भीड़ से भिड़ जाता हूँ;
कभी कहीं निहत्था ही,
तो कभी अकेला क़ानून का रखवाला बन जाता हूँ;
जी हाँ, मैं पुलिस वाला कहलाता हूँ।।

न जाने कब सुबह होती है,
कब सांझ ढल जाती है;
ना खाने की सुध,
ना स्वास्थ्य की चिंता
रात के सन्नाटे में भी घर से निकल जाता हूँ;
जी हाँ, मैं पुलिस वाला कहलाता हूँ।।

मेरा भी घर-परिवार है,
मेरे भी बच्चों का त्यौहार है;
मेरे भी माता-पिता को मेरा इंतजार है,
ना रविवार की छुट्टी, ना दोस्तों संग मस्ती कर पाता हूं;
जी हाँ, मैं पुलिस वाला कहलाता हूँ।।

कभी कर्तव्य की खातिर,
कभी जनता की रक्षा में,
कभी देश के सम्मान में;
कभी वर्दी के मान में,
सीने पर गोलियां खाता हूं;
जी हाँ, मैं पुलिस वाला कहलाता हूँ।।

ना झुका हूं ना झुकूंगा,
वर्दी तेरा मान रखूंगा,
अपराधियों का काल बनूंगा;
कानून का मैं रक्षक हूं,
सौगंध देश की खाता हूं;
जी हाँ, मैं पुलिस वाला कहलाता हूँ।।

डॉ राकेश कुमार सिंह, वन्य जीव विशेषज्ञ