चीफ साब और चीफ साब का कुत्ता

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डा राकेश कुमार सिंह, साहित्यकार एवम कवि

कई वर्षों बाद एक सप्ताह के लिए अपने पुराने शहर जाने का सौभाग्य मिला। वहीं हॉटल के पास एक कब्र थी जिसपर प्रतिदिन एक व्यक्ति फूल चढ़ाता था।

उत्सुकतावश मैं पूछ बैठा कि “यह किसकी कब्र है”। उसने बताया कि “एक चीफ साब थे, यह उनके कुत्ते की कब्र है, यहां से ट्रांसफर होने पर वही कुछ पैसे दे गए थे कि प्रतिदिन इस कब्र पर फूल चढ़ाते रहना”।
सहसा कई वर्षों पहले घटी एक साधारण सी घटना मेरे आँखों के सामने घूमने लगी।
जब मैं भी इसी शहर का बाशिन्दा था। एक दिन मेरे फोन पर घबराहट भरी आवाज़ आई थी।

“डॉ साब, आप कुत्तों वाले डॉक्टर हैं न, आप जल्दी से आ जाइये चीफ साब का कुत्ता बहुत बीमार है।” मैंने पूछा, “कौन चीफ साब”। “अरे आप चीफ साब को नहीं जानते, उन्हें कौन अधिकारी नहीं जानता। बस आप तैयार हो जाइये गाड़ी भिजवा दी जा रही है आपको लेने।” मैं भी सोच में पड़ गया आखिर “कौन चीफ साब हैं ये”?
खैर जल्दी ही एक नीली बत्ती लगी गाड़ी में एक वर्दीधारी अर्दली और एक गार्ड मेरे दरवाजे पर सलूट मार रहे थे। मेरी समझ में आ गया कि किसी बहुत ही प्रभावशाली व्यक्ति या यूँ कहें चीफ साब का कुत्ता देखना है।
अब चीफ साब कौन हैं यह रहस्य अभी भी बना हुआ था। मेरा कौतूहल बढ़ता जा रहा था। अब चीफ तो बहुत से होते हैं। चीफ इंजीनियर, चीफ मेडिकल ऑफिसर, चीफ कन्जरवेटर, चीफ वेटरनरी ऑफिसर और चीफ विजीलेंस ऑफिसर और सबसे बड़े चीफ तो सीएम साब होते हैं। चुंकि मेरे उस पुराने शहर में सीएम साब तो रहते नहीं थे। इसलिए यह तो तय था कि किसी बड़े अधिकारी से ही आज परिचय होने वाला था। फिलहाल, जो भी हो मेरे लिए तो चीफ साब का कुत्ता देखना ज़रूरी या यूँ कह दो मजबूरी था और वो भी बिना फीस के। अब चीफ साब जैसे बड़े अधिकारी से फीस तो मैं नहीं मांग सकता था। तभी गाड़ी एक बँगलेनुमा घर के सामने रुकी। वहाँ मौजूद तमाम वर्दी धारीयों ने भी जब सैलूट मारा तो मुझे लगा कि फीस भले न मिले कुछ देर के लिए वीआईपी तो बन ही गए। अब कुत्ता ठीक हो जाए तो वक़्त आने पर चीफ साब से फीस की जगह फीस से चार गुना का काम ही निकलवा लिया जाएगा। यह सोच कर ही मैंने अपने को दिलासा दिया।

फिलहाल एक स्थूल काय से कुत्ते या यूँ कहें कुकुर को घेरे पूरी वर्दी धारियों कि फौज़ वहाँ मौजूद थी। सभी एक स्वर में बोल उठे “आइये डॉ साब, देखिये बेटे को क्या हो गया है”। मैं भी एक पल को कन्फ्यूजिया गया और अपने आने का प्रयोजन बताया कि “भाई देखिये मैं एक वेटेरिनेरियन यानी पशु चिकित्सक हूँ, मुझे तो कहा गया था कि कुत्ता बीमार है।” फिर सब एक स्वर में बोल उठे “साब ये पैंथर हम सब के बेटे के ही समान है।” मैं फिर कन्फ्यूज हो गया कि “मैं तो कुत्ता देखने आया था ये सब तेंदुआ मतलब पैंथर के इलाज की बात कर रहे हैं वो भी घर में पाल रखा है।” मैने पुनः अपने आने का प्रयोजन बताया कि मैं कुत्ता देखने आया हूँ न् कि तेंदुआ। और आप सब से निवेदन है कि आप सब एक साथ में न बोलें कोई एक बताए कि वह कुत्ता कहाँ है जो बीमार है?
तब जाकर पता चला कि उस कुकुर का नाम ही पैंथर है जिसे वे सब बेटे के समान प्रेम करते हैं। पता चला कि चीफ साब भी उस कुकुर को बेटा ही मानते हैं। मुझे भी उन कर्मचारियों के पशु प्रेम व चीफ भक्ति यानी स्वामी भक्ति पर गर्व हुआ। हालांकि मेरा यह भ्रम बाद में टूट गया। मैंने पूछा “अब ये बताइए इसे हुआ क्या है”?

“बीमार है”! एक उत्तर आया।
“पर हुआ क्या है”?
इसका उत्तर किसीके पास नहीं था।

मैंने कहा अभी तक सब एक स्वर में कह रहे थे कि बेटा बीमार है और अब किसीको पता नहीं कि बेटे यानी कुकुर को हुआ क्या है। बड़ी विचित्र स्थिती थी। सबके अनुसार कुत्ता बीमार था पर हुआ क्या यह पता नहीं। बस चीफ साब ने कहा कुकुर बीमार है तो है। तभी घर के अंदर से आदेश आया कि “डॉ साब को अंदर भेज दो”।
शानदार से बैठक में चीफ साब ने सम्मान से बैठाया। घर के बने देशी घी के लड्डू व नाना प्रकार की मिठाईयों से स्वागत हुआ। मेरा दिल भी बाग़ बाग हो गया, मैंने भी बिना ना नुकुर् किये दो लड्डू उदरस्थ् कर लिए। उसी समय पैंथर यानी चीफ साब के कुत्ते का बैठक में आगमन हुआ। चीफ साब ने पैंथर के लार गिराते मुहं पर हाथ फिराया और अंग्रेजी फिल्मों वाला जोरदार चुम्बन् अपने डॉगी यानी पैंथर को किया। यहाँ तक तो फिर भी ठीक था। लेकिन तभी मेरा सारा खाया पिया मुंह से बाहर आने को उतावला हो गया, जब उन्हीं लार से सने हाथों से चीफ साब ने एक और लड्डू मेरी तरफ बढ़ा दिया और कहने लगे “एक और खाइये”। फिलहाल किसी तरह उन्हें मना कर सका। फिलहाल मुझे तो कुकुर पूरा स्वस्थ दिख रहा था। पर चीफ साब ने कहा कल व आज सुबह इसने कम खाया। मैं आश्चर्य चकित था कि ये तो बैठा लड्डू खा रहा है फिर बीमारी कैसी। तब चीफ साब ने बताया कि बस लड्डू खा लेता है पर मलाई रोटी नहीं खा रहा दो दिन से। मैंने कहा ठंडा बहुत है थोड़ा अंदर बाँधा करिए। चीफ साब ने बताया कि “ठण्ड की कोई चिंता ना करें डॉ साब, मेरा पैंथर तो मेरे साथ मेरी रजाई में ही सोता है”।

मुझे समझ आ गया कि कुकुर को कम और चीफ साब को इलाज की अधिक आवश्यकता थी। वैसे भी एक पशु चिकित्सक का अनुभव अमूमन यही होता है कि कभी कभी रोगी के साथ रोगी के मालिक का भी इलाज ज़रूरी होता है।
मगर यहाँ तो केवल मालिक का ही इलाज करना जरुरी दिख रहा था। उनकी बात ना मानने का मतलब था कि उनकी दृष्टि में कुत्ता कभी ठीक न होता। और मेरे लिए भी यह ठीक ही था क्योंकि चीफ साब से फीस तो ले नहीं सकता था ऊपर से दवा के पैसे मांगने की हिम्मत भी नहीं थी। कुछ टॉनिक लिख कर पीछा छुड़ाना ही उचित था। हालांकि चीफ साब भले आदमी निकले और फीस भी पूछी पर उनके मेरे प्रति प्रदर्शित विश्वास व उनके श्वान प्रेम के कारण मैंने भी कभी फीस नहीं ली और मेरे कई कार्य भी उन्होंने आसानी से करवाए। फिलहाल मुझे बाहर तक छोड़ने कई वर्दीधारी आए तो मैंने पूछा कि “आप सबको यह कुत्ता यानी बेटा क्यूँ बीमार लग रहा था”?

चीफ साब का अर्द्ली बोला “साब ये तो हम भी जानते थे कि इसे कुछ नहीं हुआ। पर अगर चीफ साब ने कह दिया कि बीमार है तो हमारे लिए भी बीमार ही है। और चीफ साब इसे बेटे की तरह मानते हैं तो हमारे लिए भी बेटा ही है”। मुझे याद आया अंग्रेजी में एक कहावत है “बॉस इज़् ऑलवेज राइट”। अब परिचय हो ही गया था तो चीफ साब के कुकुर का नियमित चेकअप भी मुझे ही करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी वहन करनी ही थी। लेकिन चीफ साब के लड्डू खाने की हिम्मत फिर कभी ना हुई। अब जब भी चीफ साब लड्डू पेश करते तो मैं व्रत का ही बहाना बनाने लगा। मगर चीफ साब का व उनके तथाकथित पैंथर का एक दूजे के प्रति प्रेम गज़ब का था।

फिलहाल पता चला कि मेरे शहर से जाने के बाद चीफ साब भी अब यहाँ से स्थानान्तरित हो चुके हैं, जिस दिन उनके प्यारे कुत्ते पैंथर ने अंतिम साँस ली वे बहुत रोये थे। और उन्होंने उस वफादार दोस्त की याद में यह अपने श्वान प्रेम की अमर निशानी इस शहर को दी थी। और अपने एक सेवक को पैसे दे गए थे कि प्रतिदिन वह उनके प्रिय पैंथर यानी कुकुर की निशानी पर पुष्प अवश्य अर्पित करता रहे। और ये सच है कि यह कब्र चीफ साब के श्वान प्रेम यानी कुत्ता प्रेम की अमर दास्तां को वर्षों तक संजोये रखेगी।

डॉ आर के सिंह, साहित्यकार एवं कवि