चुनावी रंग

0
928
Lokesh Shukla

आइये चुनावी रंगों से होली का जायजा लेते हैं। रंगों का असर किसी न किसी रूप में होता ही है और कभी तो ऐसा पक्का रंग चढता है जो मिटने का नाम ही नहीं लेता भले ही खाल छिल जाये। जैसे ‘राफेल’ का रंग।

मेरे पडोस में रहने वाले होशियार चंद से जब मैंने ‘राफेल रंग’ की फितरत पर सवाल दागा, तो बडी जोर से हंसे और जब थमें तो बोले, भैया ‘राफेल’ रंग की कथित ‘खोज’ जिसने की उसने इसमें उड़कर बडे बडे सपने संजोए थे लेकिन जब जुगाड नहीं बैठा तो खीज पैदा हुई। अब वो किसी दूसरे को यह ‘रंग’ उडाने नहीं देना चाहता है इसीलिए बराबर कुतर्को की पिचकारी चल रही है।फिर होशियारचंद बोले देखो भैया सबसे अच्छा और सस्ता रंग ‘आरोप’ होता है जब चाहे किसी पर मल दो और लम्बे समय तक इसका मजा लो। लेकिन यह भी जान लो कि इसके साइड इफेक्ट कभी कभी इतने भयकंर होते हैं कि व्यक्ति विशेष (जो आरोप मढ़ता है) आम आदमी को मुंह दिखाने काबिल नहीं रहता। ऐसे ही किसी ‘मफलरधारी’ के लिए समाजसेवी अन्ना जी को कहना पडा था कि राजनीति में कोई इतना नीचे गिर सकता है सोचा न था।अब उसकी हालत देख लीजिये कि लोगों से मिन्नतें करता फिर रहा है कि आओ मिलकर चुनावी होली खेलते हैँ लेकिन कोई पास नहीं फटक रहा।

कहावत है जैसी सोच वैसा मन।अब सोच यह हो कि किसी पर कीचड उछालना है तो उछालकर रहेगा भले ही वह कीचड में खुद ही सराबोर क्यूं न हो जाये।सियासत में नैतिक मूल्यों से अब कोई लेना-देना नहीं रह गया है।तेरी कमीज मेरी कमीज से साफ कैसे है, इसकी चिंता है और उसे गंदा करना है बस। इतना ही नहीं कुछ अजूबे भी देखने को मिलते हैं।आपने सर्कस में हाथी को साइकिल चलाते देखा होगा लेकिन अब इसे चुनावी बिसात पर चलते देखेंगे। कितनी दूर तक हाथी साइकिल चलायेगा यह साइकिल की मजबूती पर निर्भर करेगा।

मैंने होशियारचंद से पूछा कि जनता क्या इतनी बेवकूफ होती हैं कि नेताओं की चालबाजियां कुछ समझती ही नहीं है, वह बोले  समझती है लेकिन सफेदपोशों ने उसकी समझदारी को कुंद करने के लिए उसे जाति और धर्म के खेमे में बांट रखा है इसलिए उनकी शक्ति बंट जाती है और एकजुटता व क्रांति की संभावनाएं धूमिल पड़ जाती हैं ।दूसरी ओर एक खेमा यह सोचकर कि हमाम में सब नंगे है, शांत रहता है।

मैंने कहा तो फिर स्थितियां कभी सुधरेंगी नहीं ? होशियार बोले ऐसा तो तभी संभव होगा जब देश का हित सर्वोपरि होगा, कथनी व करनी में फर्क नहीं होगा और पैसे की हवस खत्म होगी। मैंने कहा कि यहां लोग अभिव्यक्ति की आजादी की आड में देश के टुकडे करने की बात करते हैं और आतंकियों से सहानभूति दिखाते हैं और आप देशभक्ति की बात करते हैं ? होशियार बोले दरअसल ये वे लोग हैं जो समय- समय पर उल्टी गंगा बहाकर अपने को बुद्धिजीवी साबित करते रहते हैं।ऐसे लोग अपने स्वार्थ के हिसाब से मुद्दों का चयन करते हैं।इनका देश व समाज से सरोकार नहीं होता। अब इसके दुष्परिणाम तो भोगने ही पडेंगे। यह बहुत बडी विडम्बना है और यह सिर्फ  हिन्दुस्तान में ही संभव है।फिर बोले इस देश की संस्कति रूपी खूबसूरती को समय समय पर विदेशी आक्रांताओं ने काफी क्षति पहुंचाई और अब दुर्भाग्य देखिये इसको परवान चढाने में हमारे तथाकथित कुछ नेता बाज नहीं आ रहे हैं।

मैने होशियारचंद से आखिरी सवाल किया यह ‘चौकीदार’ वाला मामला क्या है, वह बोले भैया यह बताओ चौकीदार से चोर- लुटेरे ही तो डरते हैं, सो डर रहे हैं। जनता खुश होती है ।देखो भैया अब ‘शब्दों’ पर सवारी की जा रही है। देखना यह है कि मूर्ख कौन और अक्लमंद कौन ? तमाम बातें सुनकर जो निष्कर्ष मेरी समझ में आया वो यह कि ‘विकास’ का रंग सबसे शानदार होता है।यह कभी मिटता नहीं है।