याद आता है बचपन का चुनावी माहौल

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Dr. Kamal Musaddi

प्रचार कर रही गाडियों के पीछे भागती बच्चों की टोलियाँ। एक एक बिल्ला पोस्टर के लिये बडी मशक्कत और चलती गाडी से फेंके गये पोस्टरों परचो का अगले दिन स्कूल मे प्रदर्शन। किस पार्टी का बिल्ला है इससे किसी बच्चे को कोई मतलब नही था हा जिसके पास जितनी अधिक सामग्री होती थी वही विजयी होता था।

समय बदला देश वही संविधान वही चुनाव वही। मगर तौर तरीके नायाब होते चले गये। व्यस्कता और मतदान का अधिकार 21वर्ष से घटा कर 18की उम्र कर दिया गया । बैलेट पेपर की जगह ई वी एम आ गयी। सब कुछ बदल गया आधुनिकता और ऊंचाइयों की ओर। फिर बदला क्या। नीति नही नियत और भाषा बदली। बचपन मेमाता पिता समझाते थे कि मिल जुल कर रहो पर मुझे याद है जिससे नहीं बनी वे कभी 36 के आंकड़े से निकल कर 63 नहीं हो पाए। थोड़ा बड़ी हुई तो शिक्षिकाओं ने समझाया पूरी कक्षा एक रहे फिर भी जब भी किसी बात को लेकर मुट्ठी बांधने की जरूरत पड़ी किसी न किसी उंगली का स्वाभिमान आड़े आ गया तो वो नहीं झुकी तो नहीं झुकी। नौकरी पर नजदीक से देखा कि सामूहिक चाय पर इकट्ठे तो सब हुए पर सभी की चाय की मिठास एक जैसी नहीं हुई। पर अब जब कि देश मे चुनाव हैं तो एकता के कई चमत्कार जीवन सूत्र बनाने की दीक्षा देरहे हैं। इस चुनाव ने गठबंधन की जो सीख दी है बेमिसाल है। ‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया’ कहावत ‘बाप बड़ा न चच्चा , कुर्सी का रिश्ता सबसे सच्चा ‘ हो गयी। काश ये उदाहरण बचपन मे भी देखने को मिले होते तो एक कम्पट के पीछे बिजुरी बहिनी से दोस्ती का रिश्ता न टूटा होता।
वैसे ये तो सच है ही कि जनता हर घटना को जल्दी भूलती है पर जो जनता की भीड़ से बाहर निकल कर नेता- नेती बन जाते हैं, वे छोटी छोटी बातें भी जी मे बसा कर रखते हैं। औरचुनाव में कुर्सी मिलती दिखे तो (बद) दुआ भी मुस्करा कर दुश्मन परिवार के काम के दूसरे तो छोड़िए (भ) तीजे को गले लगा कर खुद के लिए जिंदाबाद बोलने लगती है। काश की लोगों का निजी जीवन भी इतना ही सहिष्णु हो जाये तो हर कोईहाथी को केला खिला कर साइकिल से चारो धाम की परिक्रमा करने लगे। सोचिये तब शहर , प्रदेश और देश का वातावरण कितना शालीन, सहिष्नु माहौल हो जाएगा। लोग गलत कहते हैं कि ये चुनावी हथकंडे हैं, मेरी दृष्टि में तो ये सांस्कृतिक उदाहरण हैं जिसे समाज में अगरबत्ती के धुवें के साथ फैलाना चाहिए।

हमारी भाषा के मुहावरे और लोकोक्तियाँ सदा से एक जैसे चले आ रहे हैं। भाषाविद भी उन्हें नहीं बदल पाए पर चुनावी समीकरणों ने बहुत कुछ बदल दिया है। अब तो भाषा ही बदल रही है, मुहावरा है ‘एक पर एक’, इस चुनाव में ‘एक पर इक्कीस ‘ ही गया। कहावत है ‘सो जाओ, चौकीदार जाग रगा है’,इसे चुनाव में चौकीदार चोर है ‘ बनाने की कोशिश हो रही है। भाषा से ‘नामुमकिन ” शब्द गायब होता दिख रहा है। बुआ, बबुआ, बहिन जी, पप्पू, टीपू जैसे शब्दों के मायने ही बदल गए। असंख्य की सीमा से भी अधिक सर्व व्यापी ये शब्द “इकाई’ में सिमट रहे हैं। और उधर कोर्ट कचहरी और थानों तक सिमटा शब्द ‘ ‘सबूत ‘ सर्वव्यापी हो रहा है। ‘ गठबंधन’ तो बार बधू की शादी के मंडप से निकल कर आती लघु, लघु, क्षेत्रीय, रास्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों की झोपड़ियों से लेकर महलों के चक्कर लगा लगा कर हांफ रहा है।
ये चुनाव हमारी भाषा का इसी तरह नया व्याकरण गढ़ता रहा तो भाषा की शस्त्रीय व्याकरण ही बदलनी होगी।
काश लोकतंत्र के वाहक ये सोच सकते कि आज भी उनके प्रचार की गाडियों के पीछे बच्चों की टोली नीति नियत और संस्कार के बिल्ले बटोरती दौड़ रही है।