ऑपरेशन ‘पल्लव’- पल्लवपुरम का तेंदुआ

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Dr. R.K. Singh

तीन मार्च 2022 की सुबह एक युवा तेंदुआ, जो कि सम्भवतः अपना नया क्षेत्र या यूं कहें कि साम्राज्य स्थापित करने निकला था, भटक कर मेरठ शहर के घनी आबादी वाले क्षेत्र पल्लवपुरम में पहुंच गया। प्रारंभ में वह एक घर के बरामदे में देखा गया परन्तु कुछ देर पश्चात ही भागता हुआ ओझल हो गया। तमाम कोशिशों के बाद भी इतनी घनी आबादी में उसे ढूंढ पाना सम्भव नहीं हो पा रहा था। मगर हमारी रेस्क्यू टीम के अनुभव के अनुसार वह अवश्य कहीं आसपास ही था। तभी नज़दीक के एक खाली प्लॉट, जिसमें की तमाम अनचाही वनस्पतियां उग आई थीं, पर टीम की नज़र पढ़ी। टीम ने उसी प्लाट पर ध्यान केंद्रित किया व उसमें एक झाड़ी के नीचे तेंदुए के खाल के कुछ धब्बे नज़र आये। इसीके साथ रेस्क्यू टीम का “ऑपरेशन पल्लव” प्रारंभ हो गया था, पल्लवपुरम से रेस्क्यू करने के कारण इस तेंदुए को प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा “पल्लव” नाम दिया गया था।

तय हुआ कि उक्त प्लॉट को चारों ओर से ऊंचे जालों से घेर कर तेंदुए को रोक दिया जाए। उक्त कार्य हेतु स्थानीय पार्षद, जिला प्रशासन तथा प्रभागीय वन अधिकारी के नेतृत्व में वन विभाग ने ततपरता से सभी इंतज़ाम पूर्ण कर प्लॉट को चारों ओर से वन विभाग के जालों तथा निर्माणाधीन आरआरटीएस (रैपिड रेल ट्रांसपोर्ट सिस्टम) के जालों से घेर कर तेंदुए को ट्रांक्विलाइज़ (वन्यजीवों को गन से बेहोश करने की प्रक्रिया) करने का कार्य प्रारंभ किया। यह कार्य अत्यंत ही कठिन व जोखिम भरा था क्योंकि घनी झाड़ियों में तेंदुए को देख पाना सम्भव नहीं था। अतः प्लाट के दोनों ओर से दो टीमों ने जेसीबी मशीन की बकेट पर चढ़ कर तेंदुए को ट्रांक्विलाइज़ करने का निर्णय लिया। जेसीबी मशीन की बकेट को नीचे करने से तेंदुए ने भागने की कोशिश ज़रूर करी लेकिन घनी झाड़ियों के कारण भागते हुए तेन्दुए पर निशाना लगाना सम्भव नहीं ही पा रहा था। उधर बढ़ती भीड़ व ढलती शाम भी संकेत दे रही थी कि इस कार्य को तत्काल अंजाम तक पहुंचाना ही होगा अन्यथा हल्का अंधेरा होने के बाद चंद जालों से तेंदुए को रोक पाना असम्भव हो जाने वाला था। अतः यह निर्णय लिया गया कि एक टीम लंबे बांस से तेंदुए को हल्के से छेड़ेगी और दूसरी टीम दूसरे छोर पर पहले से ही उचित दूरी बनाए रखेगी ताकि तेंदुए को सफलता पूर्वक ट्रांक्विलाइज़ कर सके।यह तरकीब काम आयी और तेंदुए के झाड़ी से निकलने पर रेस्क्यू टीम ने उसे सफलतापूर्वक ट्रांक्विलाइज़ कर दिया। बेहोश तेंदुए को बमुश्किल कंटीली झाड़ियों में से निकाला जा सका।

गाहेबगाहे भले ही यह वन्यजीव भटक कर मानव बस्तियों का रुख कर लेते हों। और मनुष्यों द्वारा इन्हें हिंसक जानवर जैसे शब्दों से नवाजा जाता हो पर यह कटु सत्य है कि वन्यजीवों का अपना अनोखा, अद्भुत और एक रोमांचक संसार होता है। यह अनावश्यक मनुष्यों पर आक्रमण भी नहीं करते। इस सफल रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद अविलंब रात के अंधेरे में ही अपने नए दोस्त पल्लव को उसके नए घर में छोड़ने के लिए हमारी टीम शिवालिक के जंगलों की ओर बढ़ रही थी। अगली सुबह पल्लव को खुशी से पिंजरे से आज़ाद होते हुए देखना एक कभी न भूलने वाला सुखद अनुभव था।

डॉ राकेश कुमार सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ, कवि एवम स्तम्भकार

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