था, थे, थी

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डॉ सुजाता वर्मा

था, थे, थी। यह तीन अक्षर ही हमें प्रिय हैं। यह हमें भूत की ओर ले जाते हैं। हमारे पूर्वजों से हमारा सानिध्य कराते हैं। उनकी यशोकीर्ति के बारे में बताते हैं। हमारी असफलताओं पर हमें ग्लानि से बचाते हैं। हर हाल में हमें संतोष का पाठ पढ़ाते हैं। हमें सिर उठाकर जीना सिखाते हैं।  हम थे। हमारे पुरखे थे। हम कुछ नहीं तो क्या? इस भाव की कल्पना मात्र ही हमें तनावमुक्त कर देती है। यही नहीं, हम क्या होंगे? इसको भी सोचने की ज़रुरत से हम मुक्त हो जाते हैं। क्योंकि कभी तो हम थे। कहते हैं आगे बढ़ने वाले पैर को पीछे वाले पैर का सहारा चाहिए होता है, नहीं तो गति नहीं बन पाती। हर चलने वाला पीछे के पैर को जब जमा लेता है तब अगला पैर उठाता है। भूत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य में यात्रा करने के लिए भूत में पैर ज़माना आवश्यक है। लेकिन यदि वह आवश्यकता से अधिक जम जाए तो गति अवरुद्ध हो जाती है। बात व्यक्ति की हो या राष्ट्र की, दोनों के संबंध में यह सिद्धांत लागू होता है। जहां भूत का द्योतक था, थे, थी हैं, वही वर्तमान का प्रतिनिधि ‘है’ और भविष्य का द्योतक है ‘होगा’। हम एक व्यक्ति और राष्ट्र के रूप में था, थे, थी के आगे ‘है’ या ‘होंगे’ का राग सुन पाने में स्वयं को असमर्थ न बनाए।‘था’, ‘थे’, ‘थी’ का विशद ज्ञान हमारे ‘हैं’ और ‘होंगे’ पर हावी न हो तो बेहतर है। अन्यथा हम प्रगतिमार्ग पर गतिहीन सिद्ध होने लगेंगे।जहाँ हमारी गति है वहाँ हम ‘था, थे, थी’ के प्रभाव से मुक्त हैं।

फैशन परस्ती और सभी प्रकार की उच्छंखलताओं के सन्दर्भ में हम ‘था, थे, थी’ के विचारों को नजरअंदाज कर देते हैं। वहाँ हमारी प्रगति अच्छी है। अन्य क्षेत्रों में हम ‘था, थे, थी’ के ही ग़ुलाम हैं। उन क्षेत्रों में हमारी प्रगति नगण्य है। सफलता और प्रगति ‘था, थे, थी’ की नहीं ‘है’ और ‘होगा’ की मोहताज़ है। वर्तमान टटोले, भविष्य रचेंगे। भूत के सागर में गोते लगाने से सिर्फ इतिहास बनेगा। दुनिया इतिहास बनना नहीं चाहती। वह चाँद सितारों का सपना देख रही है। चाँद और दूसरे ग्रहों पर जाने का सपना देखने वाली दुनिया अनुभवों पर नहीं सपनों पर थिरकती है। उसके लिए इतिहास निरर्थक है। वह उसे भुलाती जा रही है। यही कारण है कि दुनिया के लोग तनाव में जी रहे हैं। द्वन्द में टूट रहे हैं। इतिहास से सबक लेकर आगे बढ़ा जाये। इतिहास में अनुभव छिपा है। अनुभव भावी ज्ञान का झरोखा है। लेकिन मात्र झरोखे से झांकते रहना प्रगति मार्ग प्रशस्त नहीं करेगा। झरोखे से दूर व्योम को देखें। आगे बढ़े। यही प्रगति के लिए आवश्यक है। श्रेयस्कर भी।

(लेखिका की पुस्तक ‘एक कबीर और’ के साभार से)

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