अदालत में गुलदार

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Dr. Rakesh Kumar Singh
फरवरी महीने का पहला पखवाड़ा था और अभी भी धूप में गुनगुनाहट कायम थी। बस यूं कहिए कि गुलाबी जाड़ों का मौसम था। यह मौसम सभी वनस्पतियों, वन्य जीवों को लुभाता है और प्रकृति के साथ ही साथ वन्य जीव भी अपने पूरे शबाब पर होते हैं। सूरज भी धीरे-धीरे अस्त होने के करीब था। यही कोई तीन-सवा-तीन का वक्त था। तभी सोशल मीडिया में अचानक ही एक तेंदुए द्वारा कई लोगों को घायल करने के वीडियो वायरल होने लगे। और सूचना मिली कि गाजियाबाद जनपद मुख्यालय परिसर में स्थित जिला न्यायालय के परिसर में एक तेंदुआ, जिसे गुलदार भी कहते हैं, घूम रहा है। सहसा यह अविश्वसनीय सा लगा। यहां तक कि पत्रकार भी इस बात से सहमत नहीं थे कि यह सूचना सही है। भला इतनी घनी आबादी वाले शहर में और वो भी खचाखच भरी रहने वाली जिला अदालत की इमारत में तेंदुआ कैसे आ सकता था। लेकिन बार-बार घनघनाती फोन की घंटी इस खबर को पुख्ता कर रही थी।

उधर नजदीक के शहर मेरठ में एक अन्य तेंदुए ऑपरेशन में लगी स्थानीय रेस्क्यू टीम भी इस अचानक आए मेहमान की खबर से बेखबर नहीं थी। एक गुलदार कहीं से भटक कर अदालत परिसर में आ गया था। चूंकि तेंदुआ घबराया हुआ था और भयवश इधर-उधर भाग कर छुपने का स्थान तलाश रहा था और इसीलिए भागते हुए अपने पंजों से आत्मरक्षा में कई लोगों को चोट पहुंचा चुका था।

हमारी स्थानीय टीम अविलंब उस स्थान पर पहुंच चुकी थी। और रेस्क्यू ऑपरेशन के संबंध में स्टाफ को जो कुछ मिला जैसे कि पिंजड़ा, रस्सी, जाल, बांस, केरोसिन, माचिस, रद्दी कपड़े और यहां तक कि तेंदुए को दूर रखने के लिए तेज आवाज करने वाले खाली कनस्तर भी वह ले आए थे। दूसरी तरफ अनुभवी रेस्क्यू टीम अपने साथ डार्ट गन और अन्य सामान लेकर उच्चाधिकारियों के साथ मेरठ से भी चल चुकी थी। अब कुल मिलाकर स्थिति यह थी कि अदालत में कहीं गुलदार छुपा था और यदा-कदा प्रकट हो जाता था। सभी लोग तेंदुए से बचना भी चाहते थे और अदालत के इस नए फरियादी को देखना भी चाहते थे। इस कारण बड़ा ही अफरा-तफरी का माहौल था। अब सबसे बड़ी चुनौती इस विचित्र फरियादी को इतने बड़े परिसर में ढूंढना और रेस्क्यू टीम के आने तक रोकना थी।

यह एक कई मंजिला इमारत थी जिसमें बड़े-बड़े कमरे और लंबे बरामदे थे और हर बरामदों से सीढ़ियां नीचे-ऊपर जाती थीं। फिलहाल थोड़ी देर बाद ही तेंदुआ एक सीढ़ी से ग्राउंड फ्लोर की ओर भागता दिखा। और एकत्रित तमाशबीनों से डरकर संभवतः सीढ़ी के नीचे ही छुप गया। हमारी टीम ने तुरंत सीढ़ी के लोहे के चैनल गेट को बंद कर दिया। अब हमें फुर्ती से काम करते हुए ऊपर के सीढ़ी के रास्ते को बंद करना था। पर समस्या ये थी कि ऊपर ऐसा कोई गेट ही नहीं था। इसलिए इतने चौड़े रास्ते को बंद करने के लिए फटाफट वहां जाल बांधा जाने लगा। साथ ही साथ हमारी टीम ने आपस में बातें करना भी जारी रखा ताकि तेंदुआ हमारी उपस्थिति का एहसास होने से सीढ़ी के नीचे ही छुपा रहे। हमारी युक्ति काम कर गई और हम जाल बांधने में सफल रहे। पर यह एक मनोवैज्ञानिक बैरियर ही था। यदि तेंदुआ जोर लगाता तो निकलने का रास्ता बना सकता था। इसीलिए तेंदुए पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिये हमारी टीम के सदस्य मशाल और आवाज़ करने का कनस्तर आदि लेकर इस जाल के दूसरी तरफ खड़े हो गए, ताकि यदि तेंदुआ आता भी है तो वे शोर मचाकर या मशाल जलाकर उसे पुनः सीढ़ी के नीचे लोहे के गेट के पास भेज दे, और उसको निकलने नहीं दे।

यहां यह बताना आवश्यक है कि अब तक यह अनुमान ही लगाया गया था कि वह तेंदुआ सीढ़ी के नीचे छुपा है क्योंकि नीचे भागते हुए उस तेंदुए को किसी अन्य स्थान पर किसी भी व्यक्ति ने नहीं देखा था।

इसी बीच मेरठ से रेस्क्यू टीम भी वहां पहुंच चुकी थी और उन्होंने संपूर्ण हालात का जायजा लेना प्रारंभ किया। परंतु तेंदुए ने अब तक अपनी उस स्थान पर उपस्थिति का कोई प्रमाण नहीं दिया था। वहां तमाशबीनों की भी इतनी अधिक भीड़ थी कि तिल रखने की भी जगह नहीं थी। और एक अनार सौ बीमार की कहावत पूर्ण रूप से चरितार्थ हो रही थी।
तभी सीढ़ी के ठीक बगल मे सीमेंट से बने छोटे से स्थान के पीछे छुपे हुए तेंदुए की पूंछ के धब्बे दिखाई पड़ गए। बस इसके साथ ही हमारा “तेंदुआ डार्ट ऑपरेशन” शुरू हो गया था। सबसे बड़ी दिक्कत थी कि तेंदुआ ऐसी जगह छुपा हुआ था जहाँ से उसे डार्ट करना बिल्कुल नामुमकिन था। इसके अलावा वह किसी भी स्थिति में वहां से हिलने को भी तैयार नहीं था।

पूर्व के अनुभव के अनुसार हमने तेंदुए की पूंछ पर छोटा सा कंकड़ फेंका और एक भयानक दहाड़ के साथ वह विडाल वंशी हमारे सामने प्रकट हो गया। एक बात अवश्य हुई कि इस दहाड़ से तमाशबीनों में भगदड़ मच गई। लेकिन इतनी अधिक भीड़ थी कि डार्ट गन को सीधा रख कर निशाना लगाना मुश्किल हो रहा था। परीणाम स्वरूप जिस प्रकार वह गुलदार प्रकट हुआ था उसी प्रकार पलक झपकते ही फिर गायब हो गया। कुछ देर बाद अनियंत्रित भीड़ के शोर से एक बार फिर गुलदार बाहर निकला और सीढ़ियों पर होता हुआ ऊपर पहुंच गया। लेकिन वहां मौजूद मुस्तैद टीम ने शोर मचा कर उसे वहां लगे जाल से निकलने नहीं दिया और तेंदुआ फिर नीचे सीढ़ी के पीछे छुप गया। अब कुछ ऐसा करना जरूरी था कि तेंदुआ भीड़ से ना डरे और कुछ समय के लिए डार्टिंग टीम के सामने रहे ताकी उसपर डार्ट गन से लक्ष्य लेने का समय मिल सके।

शिकारी वन्य जीवों की एक प्रवृत्ति होती है कि यदि वह गुस्से में हों तो वह हर उस चीज को मुंह से पकड़ते हैं जिससे उन्हें छेड़ा जाता है। टीम का अनुमान था कि यदि ऐसी किसी वस्तु जैसे लंबी पाइप आदि से तेंदुए को यदि धीरे से छेड़ा जाए तो उस पाइप को तेंदुआ मुंह से जरूर पकड़ेगा और छोड़ेगा नहीं। और उस पाइप को यदि टीम अपनी तरफ खींचेगी तो तेंदुआ मुंह से पकड़े-पकड़े अवश्य टीम के सामने तक अपने-आप खिंचता चला आएगा। इस के लिए किसी एक ऐसी पाइप की आवश्यकता थी जो कि तेंदुए तक पहुंच सके। और इतनी मजबूत भी हो कि यदि तेंदुआ उसको मुंह से पकड़े तो वह टूटे नहीं और न ही तेंदुए को मुंह में चोट लगे।

तभी टीम की नजर पास में पड़ी एक पीवीसी की पानी की पाइप पर पड़ी जोकि पर्याप्त लंबी थी। इस पीवीसी पाइप को जब सीढ़ी के पीछे डाला गया तो वह वहां छुपे तेंदुए तक पहुंच गई। और तेंदुए ने गुस्से में उसे मुंह से पकड़ लिया और और टीम के सदस्यों ने उस पाइप को खींचना प्रारंभ कर दिया। और हमारे अनुमान के अनुरूप तेंदुआ गुस्से में पाइप को पकड़े हुए लोहे के चैनल गेट तक खिंचता चला आया। डार्टिग टीम ने उस पर डार्ट गन से बेहोशी की दवा से भरा डार्ट फायर किया। लेकिन टीम की अपेक्षा के विपरीत वह दवा से भरी हुई डार्ट तेंदुए तक नहीं पहुंच सकी। इसके लिए एक दूसरी डार्ट तैयार की गई। लेकिन अत्यधिक भीड़ होने के कारण तेंदुए पर ऐम लेना मुश्किल हो रहा था। यह बड़ी विचित्र स्थिति होती है जब एक वन्य जीव, जिसे बेहोश किया जाना है, आपके सामने हो और आप उस पर लक्ष्य न ले सकें। फिलहाल दूसरी डार्ट काम कर गई और सीधे तेंदुए के पुट्ठे में समा गई। तेंदुआ एक तेज दहाड़ के साथ पीवीसी पाइप को छोड़कर पुनः सीढ़ी के पीछे छुप गया।

अब सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि तेंदुए को किस प्रकार और कहां से देखा जाए कि उसके ऊपर बेहोशी की दवा का असर हो गया है या नहीं। क्योंकि वह अब इस प्रकार छुप गया था कि उस कोने तक हमारी पीवीसी पाइप भी नहीं पहुंच रही थी। तेंदुआ इतना अधिक स्ट्रेस में और भयभीत भी था कि वह वहां से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था। समय बीतता जा रहा था और हमारी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी। क्योंकि यदि अगले 15 से 20 मिनट में तेंदुए को बाहर नहीं निकल गया तो वह दुबारा होश में आ सकता था। और इतनी जल्दी पुनः बेहोशी की दवा देना भी उचित नहीं था। यह अत्यधिक असमंजस की स्थिति थी। तभी यह निर्णय लिया गया कि चार-पांच लोग बॉडी प्रोडक्शन सूट, हेलमेट और जाल लेकर चैनल गेट खोलकर अंदर बढ़ेंगे। लेकिन जनता की सुरक्षा को देखते हुए टीम के अंदर जाने के बाद चैनल को बंद कर दिया जाएगा ताकि यदि तेंदुआ होश में हो तो बाहर ना निकल सके। हालांकि यह बहुत ही जोखिम भरा कार्य था लेकिन तेंदुए और जनता की सुरक्षा की दृष्टिगत इसके अतिरिक्त कोई भी अन्य उपाय टीम के पास नहीं था।

डार्ट टीम को यह अवश्य विश्वास था कि अब तेंदुआ उतना आक्रामक नहीं होगा, क्योंकि डार्ट तेंदुए के पुट्ठे में लगी थी इसलिए तेंदुआ दवाओं के कुछ असर के कारण उतनी फुर्ती नहीं दिखा सकेगा। इसी विश्वास के साथ हम पांच लोग जाल लेकर अंदर दाखिल हुए और हमारे अनुमान के अनुसार तेंदुआ पूरी तरह बेहोश नहीं था। वह लगभग बैठी हुई स्थिति में था, लेकिन चल पाने में असमर्थ था। वह अपने पंजे चला रहा था और धीरे-धीरे गुर्रा भी रहा था। ऐसे में उसके ऊपर अगर जाल डाला जाता तो स्ट्रेस के कारण यदि वह जाल से निकलने के लिए प्रयास करता तो लगातार प्रयास के कारण वह अपने शरीर का तापमान बढ़ा सकता था और इसके कारण उसकी मृत्यु भी हो सकती थी।

चूंकि आधे बेहोश तेंदुए को हैंडल करना और साथ-साथ डार्ट करना एक वन्य जीव विशेषज्ञ के लिए संभव नहीं था इसलिए टीम के एक अनुभवी वाइल्डलाइफ गार्ड श्री कमलेश पांडे को इस बार डार्ट गन दी गई और हम सभी टीम के सदस्य जाल लेकर तेंदुए के सामने इस प्रकार खड़े हो गए कि अगर वह डार्ट लगने के बाद थोड़ी देर के लिए यदि खड़ा भी होता है तो टीम के सदस्य अपना बचाव कर सकें और उसे वहां से उसे बाहर भी न निकलने दे।

श्री कमलेश द्वारा फायर की गई वह डार्ट एक बार फिर बेहोशी की दवा को तेंदुए के पुट्ठों में पहुंचाने में सफल रही। लेकिन वहां उपस्थित भीड़ द्वारा किए जा रहे अत्यधिक शोर के कारण बेहोशी की दवा का असर तेंदुए पर कम ही हो रहा था। फिर भी पूर्व के अनुभव के अनुसार टीम ने तीसरी बार थोड़ी सी बेहोशी की दवा फिर तेंदुए को दी। लेकिन अत्यधिक शोर के कारण आश्चर्यजनक रूप से तेंदुआ पूरी तरह से बेहोश नहीं हुआ। अब इससे अधिक दवा दिया जाना तेंदुए के लिए घातक हो सकता था। क्योंकि यह एक बहुत बड़ा परिसर था और तेंदुए को रेस्क्यू करने का मौका अब फिर नहीं मिल सकता था। इसलिए टीम के सदस्यों ने जोखिम लेते हुए तेंदुए पर जाल डाल दिया और कुछ सदस्यों ने उसे हल्के से लकड़ी के डंडों से दबा लिया एवं जाल को ही खींचना प्रारंभ कर दिया। तेंदुआ जाल से निकलने के लिए अभी भी थोड़ा प्रयास कर रहा था। पर टीम के सदस्यों ने सुरक्षित दूरी से अत्यधिक बहादुरी दिखाते हुए जाल सहित तेंदुए को पिंजरे में कैद कर दिया।

लेकिन इतनी भीड़ में तेंदुए के पिंजरे को ट्रक तक पहुंचाना एक बहुत ही मशक्कत भरा काम था। जिसके लिए टीम को बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ी। गुलदार को देखने के लिए भीड़ इस कदर अनियंत्रित हो गई थी कि टीम के सभी सदस्य तीतर बितर हो जा रहे थे। आखिरकार जब कोई रास्ता नहीं सुझाया तो स्वयं हम सभी को विभाग के कर्मचारियों के साथ भीड़ को काबू करने का कार्य करना पड़ा। और किसी तरह भीड़ से बचाते हुए तेंदुए को ट्रक तक पहुंचाया गया एवं तेंदुए को लेकर टीम तत्काल प्रभागीय निदेशक के कार्यालय में पहुंच गई। यहां भी कार्यालय परिसर का मुख्य द्वार तत्काल बंद कर तमाशबीन लोगों को रोका जा सका। जिससे कि तेंदुए को शांति मिल सके और वह कुछ देर के लिए स्थायित्व प्राप्त कर सके। लगभग आधे घंटे बाद जब तेंदुए का निरीक्षण किया गया तो वह अत्यधिक गुस्से में था और पूरी तरह होश में आ चुका था। उसके शरीर पर कुछ चोटों के निशान भी थे और उसने भीड़ में अपने-आप को स्वयं पिंजरे से टकरा-टकरा कर घायल भी कर लिया था। उसको आवश्यक उपचार दिया गया एवं उसके घावों पर मलहम लगाया गया।
कुछ ही देर में नेशनल हाईवे पर घुप्प अंधेरे को चीरती हुई हमारी जीप अदालत के उस विचित्र फरियादी को लेकर उसके नए घर शिवालिक के जंगलो की ओर बढ़ रही थी। लेकिन वह गुलदार किस फरियाद को लेकर अदालत में आया था यह प्रश्न हमारी टीम के हर सदस्य के मानो-मस्तिष्क को अब भी झकझोर रहा था।

=>Dr Rakesh Kumar Singh and Manish Singh