रंगो का दर्द

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Dr. Kamal Musaddi
पिछली होली के रंग आदमी से रूठ गये एक दूसरे के पकडे हाथ अचानक छूट गये इतना कि हर रंग बदरंग हो रहा था ऐक दूसरे के गले मिल कर रो रहा धा हरा बोला यू तो मै जिधर भी नजर घुमाता हू खेत खलिहान जंगल बाग सब मुस्कराते है दूब घास से भरे मैदान पंछियों की चहचहाहट के साथ मिलकर मंगल गीत गाते हैं। पर इस निगोडी राजनीति ने मेरे साथ बडा ही अपघात किया मुझे एक धर्म विशेष से बांध दिया अब नही कहता कोई बहन भाई हरा रंग है हरी हमारी धरती की अंगड़ाई सच कहू तो तिरंगे मे शामिल होकर भी गुमनाम हो गया हू एक पार्टी की पहचान हो गया हू।

नीला बोला यू तो मै आखों मे उतर कर कितनो ही की नीद चुराता हू सफेद कपडों को बाहों में भर कर और चमकाता हू ज्यादा तर पन्नो पर मै ही लिखा जाता हू। नीले गगन के तले कितने ही सपने पलते है नीली छतरी के नीचे लोग बेखौफ निकलते है पर आज कल मै भी एक राजनैतिक हथकंडा हो गया हू और एक पार्टी का झंडा हो गया हू लोग मुझे भी मुह चिढ़ाने से बाज नही आते है और मुझे कभी बहिन जी तो कभी मान्यवर बुलाते है।

तभी लाल रंग ने ली अगडाई बोला चुप हो जा नील भाई मुझे देख मै सदियो से इंसान की धमनियों में बह रहा हू उसकी आंखो मे कभी क्रोध तो कभी लज्जा बन कर रह रहा हू इस पर भी इंसान मुझे मुह चिढ़ाने से बाज नहीं आ ता है मुझे कभी कुली तो कभी कामरेड कह कर बुलाता है आजकल तो मै इतना दर्द सह रहा हू कि देश की सीमाओं पर कम आतंक की नालियों मे अधिक बह रहा हू।

तभी प्रकट हुआ काला उसने अपना वक्तव्य कुछ इस प्रकार उछाला कि मै औरत के गाल पर तिल बन कर उसकी सम्मोहन शक्ति बढाता हू बच्चों के माथे पर डिढौना बन उन्हे बुरी नजर से बचाता हू इंसान जादा तर किताबों में मुझे ही पढता है क्योकि मेरी काली कमली पर दूजा रंग नही चढता है और ये राजनेता तो मुझे दूर से ही नमस्ते कहता है क्योकि इ के चेहरे या कपड़ों पर पसर जाऊ तो कही मुह दिखाने लायक नही रहता है सच कहू इसी लिये मै आम आदमी की राह से मुड गया और सीधा राम कृष्ण जैसे महानायको से जुड गया।

अन्त मे सफेद ने अपना मुह खोला और खादी के अंदाज मे हाथ जोड़कर बोला। मै मै पहले आदमी का सच्चा मित्र था क्योंकि मेरा गाधी नेहरू सुभाष जैसा चरित्र था किन्तु अब मेरे पास एक कटा हुआ पंजा है पंजा क्या एक राजनैतिक शिकंजा है जिसे मै रात दिन सहता हू फिर भी आम आदमी के साथ रहता हू क्योकि मै जानता हू कि मेरी सच्ची मित्र तो जनता है और कोई भी देश कलफदार कपडों से नही मजदूर के पसीने से बनता है इस लिये आओ न घबराओ और धर्म और जाति की राजनीति से निकल कर जनता से जुड जाओ जिस दिन तू आम आदमी से जुड जायेगा फागुन मे तेरा मन इन्द्र धनुष बन जायेगा।

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