भटकती बाघिन और वह खौफनाक रात

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Dr. Rakesh Kumar Singh
रात को घुप्प अंधेरे में घने जंगल में दौड़ती हमारी जीप सामने से आती टॉर्च की रोशनियों को देख यकायक रुक गई। दो गार्ड हमारे पास आये “सर अब हालांकि कोई खतरा नहीं है फिर भी आप लोग बगल वाले रास्ते से दूसरे रेस्ट हाउस पहुंचिए”। यह सुनकर हमारी सांसों में सांस आयी।

कुछ दिन पूर्व जेठ मास की उस अलसाई सी दोपहर में मुझे सूचना प्राप्त हुई कि एक बाघिन पिछले दो दिनों से जंगल से बाहर गन्ने के खेतों में धूप में बैठी रहती है। बार बार अपने बरसों के अनुभव के अनुसार मंथन करने पर भी मैं किसी निष्कर्ष पर न पहुंच सका। आखिर ऐसा क्या हो सकता था जो उसे धूप में बैठने को मजबूर कर रहा था। अगले दिन पुनः वही स्थिति होने पर मैं लगभग 325 किलोमीटर की यात्रा कर वहाँ पहुँचा। वहाँ चारों ओर गन्ने के खेत और कुछ खाली खेत जंगल की सीमा को छू रहे थे। बाघिन केवल इसी सीमा के आसपास के खेतों में जहां कहीं भी पानी भरा था वहीं बैठ रही थी। कुछ नीलगायों के झुंड भी बीच बीच में खेतों की ओर आते जाते दिख रहे थे।

हालांकि हमारी उपस्थिति का बाघिन पर कोई खास असर नहीं था तथा न ही वह किसी पर गुस्से का इज़हार कर रही थी।  लेकिन उसकी खेतों में उपस्थिति अवश्य किसानों के कृषि कार्यों को प्रभावित कर रही थी। मैं आश्चर्य चकित था कि वह क्या ढूंढ रही है? तभी मेरी दृष्टि एक हल्की सी लंगड़ी नीलगाय पर पड़ी। मेरे अनुभव के अनुसार सम्भवतः बाघिन इसी आसान शिकार के लिए जंगल से बाहर थी।

अनुमान के अनुरूप उसी रात बाघिन ने उस नीलगाय को अपना शिकार बना लिया। ध्यान से देखने पर मैंने पाया कि नीलगाय के गले व जबड़े पर बाघिन के दांतों के जो निशान थे, वह मेरे अनुभव के अनुसार सामान्य बाघों के शिकार पैटर्न से कुछ अलग थे। उसके पुराने शिकारों के फोटो का अध्ययन करने पर भी मेरे द्वारा बिल्कुल यही पैटर्न पाया गया। यह बाघिन शिकार का गला और एक जबड़ा दोनों मिला कर उसे दांतों से दबोचती थी, जिससे स्पष्ट था कि वह अभी शिकार करने में पूर्ण सक्षम नहीं हुई थी। और अभी अभी अपनी माँ से अलग हुई थी।

एक बाघिन को अपने शिकार से बहुत लगाव होता है। उसकी इसी आदत का फायदा उठाते हुए हमने ट्रैक्टर से खींच कर उस शिकार को जंगल के अंदर करवा दिया। मृत नीलगाय के करीब ही एक गड्ढा करवा कर उसमें पानी भी भरवा दिया गया ताकि बाघिन बाहर खेतों के पानी में न बैठकर जंगल के अंदर ही रहे। योजना के अनुसार वह चार दिन तक जंगल के अंदर अपने शिकार के आसपास ही बनी रही। मगर फिर तीसरे दिन जंगल से बाहर हो गई। यहाँ तक की हॉट वायर फेंसिंग, जिसमें हल्का बिजली का करेंट भी रहता है, भी उसको न रोक पाई। फिर भी हमारी टीम उसे विभिन्न उपायों से घेरकर बार बार जंगल के अंदर ही रखने का प्रयास करती रही।

कई दिन के प्रयास से बाघिन अपने बचपन के स्थान पर, जहाँ वह पली बढ़ी थी, वापस पहुंचा दी गई। यह जंगल की सरहद से लगभग डेढ़ किलोमीटर अंदर एक बहुत ही सुरम्य स्थान था। जहां एक बड़ी सी ताल थी जिसमें थोड़े से स्थान पर पानी भरा था तथा साथ ही ऊंची ऊंची हाथी घास व चारों ओर शांत घना जंगल था। चीतलों व मोरों की यहाँ भरमार थी। यदाकदा भालू भी बाघिन को इस ताल के आसपास चुनौती देने आ जाते थे। कुल मिला कर यह एक टाइगर के लिए मनपसंद जगह थी।

कुछ दिन तक बाघिन ताल के इर्दगिर्द ही बैठी रहती थी। यह देख कर सब निश्चिंत हो गए। लेकिन फिर भी हमारी टीम उसपर लगातार हाथियों या फोर व्हील ड्राइव वेहिकल के माध्यम से नज़र रख रही थी। मेरे लिए चिंता का विषय यह था कि उसने कई दिनों से कुछ खाया नहीं था, क्योंकि आसपास कोई भी उसका मारा हुआ शिकार हमें नहीं मिला था। इसलिए भूखी बाघिन कभी भी शिकार के तलाश में जंगल से बाहर भी जा सकती थी। अतः हम लगातार उसके मूवमेंट नोट कर रहे थे।

उस शाम वह हमें चीतलों के झुंड पर घात लगाए मिल गई। लेकिन अधिक सतर्क चीतलों को पकड़ने में वह नाकामयाब रही। पलक झपकते ही चीतलों का झुंड एक धूल का गुबार उड़ाता हुआ ओझल हो गया। निराश बाघिन हमें देखती हुई वापस झील की तरफ लौट पड़ी। वह बुरी तरह हांफ रही थी। उसका पिचका पेट उसकी भूख बयां कर रहा था। मुझे विश्वास था कि वह आज एक और प्रयास करेगी। हम वहीं अपनी जीप में उसपर नज़र रखे रहे। इस दौरान मैंने पाया कि कई दिनों की लुकाछिपी के कारण वह मेरे प्रति कुछ लापरवाह भी हो चुकी थी। अब मेरी उपस्थिति को वह नज़रअंदाज़ करने लगी थी।

अनुमान के अनुरूप एक घण्टे बाद वह पुनः ताल से बाहर निकली। पेड़ों पर उछलकूद कर रहे बंदरों को वह काफी देर तक देखती रही। मगर वह भी बखूबी जानती थी कि शाम के बाद बन्दर अधिकतर पेड़ों से नीचे नहीं आते। अतः वह आगे बढ़ गई साथ ही हमारी जीप भी एक सुरक्षित फासले पर बढ़ चली। इस बार जंगल की पगडंडी पर मोरनियों को रिझाने को नाचते मोरों को देख कर वह ठिठक पड़ी। हालांकि मोर बाघ का पसंदीदा शिकार नहीं है पर भूखी बाघिन के लिए वह भी किसी हिरण से कम न था। लगभग पांच मिनट तक वह पास की झाड़ियों में बिना हिलेडुले छुपी रही। औऱ बड़ी फुर्ती से मोरों पर झपट पड़ी। लेकिन इस बार मोर भी उससे फुर्तीले निकले।

अब बाघिन के असफल होने से हमारी चिंता औऱ बढ़ गई। क्योंकि अंधेरा होने को आ रहा था औऱ बाघिन आज रात आसान शिकार जैसे मवेशियों आदि के लिए जंगल के बाहर जा सकती थी।

हालांकि सभी स्थानीय अधिकारी व कर्मचारी कई दिनों से गांवों में सतर्कता व सावधानी बरतने के पर्चे बांट कर लोगों को जागरूक कर रहे थे। फिर भी अविलंब हमारे द्वारा सम्भावित स्थानों पर सभी ग्रामवासियों को पुनः सतर्क किया गया। कुछ नवयुवकों को सड़क के किनारों पर बैठे देखकर हमारे द्वारा उन्हें वहाँ नहीं बैठने की सलाह भी दी गई। दिन भर के थके हम सब यह प्लान बना कर रेस्ट हाउस लौट आये कि रात का खाना खा कर फिर गश्त पर निकलना होगा।

जंगल के बीच बना हमारा रेस्ट हाउस बहुत ही सुकून देने वाला था। सामने लकड़ी का ऊंचा प्लेटफॉर्म था जिसपर प्रतिदिन जंगल को निहारते हुए कॉफ़ी पीना हमारी दिन भर की थकी टीम का एक ज़रूरी हिस्सा था। पास में ही जंगल की सीमा से मिलती एक बस्ती या यूं कहें एक गांव ही था।

हमारी टीम नहा धोकर उसी लकड़ी के प्लेटफॉर्म पर बैठकर खाना खा रही थी कि कुछ लगातार आ रही शोर मचाने की आवाजों ने हमारा ध्यान आकर्षित किया। टीम के सदस्यों को लगा कि शायद गांव वाले कोई जश्न मना रहे होंगे। पर वह शोर लगातार तेज होता जा रहा था। तभी एक स्थानीय ऑफिसर ने मुझे फोन किया। उधर से सिर्फ इतना कहा गया कि “आप सब जिस हाल में हैं उसी हाल में अविलंब जीप में बैठकर वहां से निकल जाइये, जीप भेज दी गई है”। कारण पूछने से पहले ही फोन कट गया। हम सब हतप्रभ रह गए, कि आखिर ऐसा क्या है? लेकिन यह स्पष्ट था कि हम किसी बहुत बड़े सम्भावित खतरे में थे। यह सुनकर रेस्ट हाउस के चौकीदार ने भी फटाफट रेस्ट हाउस बन्द करना प्रारंभ कर दिया। हम किसी तरह अपना आधा अधूरा सामान लेकर बाहर निकले। इस बीच हमारी तरफ बढ़ता भीड़ का शोर हमारे बेचैनी बढ़ा रहा था।

मुझे याद है कि लगभग तीन से चार मिनट तक वह जीप का इंतज़ार जैसे बरसों के बराबर था। तभी अचानक जंगल के रास्ते से बिना लाइट जलाए एक जीप आकर रुकी। हम सब भाग कर उसमें पहुंचे और दूसरी दिशा में रफ्तार से भाग निकले। जीप के चालक ने बस इतना बताया कि “उसे निर्देश है कि हम सबको जंगल के रास्ते से दूर दूसरे रेस्ट हाउस पहुंचा दे”। जंगल से आती झींगुरों की आवाज़ें, कुछ दूरी तक जीप की बुझी फ्रंट लाइटें, घटाटोप अंधेरा और साथ में किसी अज्ञात कारण से भागना हम सबमें सिहरन पैदा कर रहा था। फ़िलहाल अब दोनों गार्डों ने बताया कि तथाकथित बाघिन ने दुर्भाग्यवश एक व्यक्ति को मार डाला है, और आक्रोशित भीड़ कुछ शरारती तत्वों के बहकावे में मशालें लेकर हमारे ही रेस्ट हाउस की तरफ आ रही थी।

फिलहाल एक बार फिर हमारी जीप जंगल में आगे बढ़ रही थी। लगभग आधे घण्टे बाद हम दूसरे रेस्ट हाउस पहुंचे। रात भर हमारी टीम आगे की रणनीति बनाने में लगी रही। इस बीच उस अभागे व्यक्ति की फ़ोटो देखने पर उसके जबड़ों व गले पर बिल्कुल वही दांतों से दबाए जाने के पैटर्न मिले जो उस बाघिन के शिकार पर मिला करते थे। अपुष्ट श्रोतों से पता चला कि कुछ व्यक्ति अंधेरे में सड़क के किनारे बैठे हुए थे। बैठे होने के कारण बाघिन ने निश्चित रूप से उन्हें कोई चौपाया समझ कर ही आक्रमण किया था। और बाद में अपना प्राकृतिक शिकार न होने से थोड़ी ही दूरी पर लेजाकर छोड़ भी दिया था। सुबह समाचार मिला कि हमारे वहाँ से निकल जाने की सूचना मिल जाने पर वह भीड़ लौट पड़ी और क्षेत्रीय कार्यालय में जाकर जमकर उत्पात मचाया। यहां तक कि कर्मचारियों के वाहन व घर गृहस्थी तक को जला दिया। लेकिन स्थानीय प्रशासन की ततपरता से रात में ही स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया।

अगले दिन बाघिन उसी ताल में बैठी मिली। चूंकि वह हमारी उपस्थिति से विचलित नहीं होती थी इसका फायदा उठाते हुए हमारी टीम ने उसे आसानी से ट्रांक्विलाइज़ कर लिया। वापसी में एक और निर्दोष को गिरफ्तार कर लौटते समय मेरे सामने हमेशा की तरह यक्ष प्रश्न था कि ‘बेशक कल रात एक घर का चिराग बुझा था। मानव जीवन की हानि एक अपूर्णीय क्षति है। और हम इंसानी ज़रूरतों और विकास को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते। लेकिन क्या इंसानों के साथ ही साथ वन्यजीवों को भी स्वतंत्र जीने का पूरा हक़ नहीं है? वह वन्यजीव जिनके न होने से इंसानी अस्तित्व और विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

-डॉ आरके सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ एवम साहित्यकार

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