लोकप्रिय होती रंग चिकित्सा

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Prachi Dwivedi
रंग; चिकित्सा का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन चुके है| रंगों का इस्तेमाल  मानसिक और शारीरिक विकारों जैसे मांसपेशियों की सूजन, स्लिप डिस्क, माइग्रेन,  बांझपन, कैंसर इत्यादि को दूर करने के लिए भी होता है,  रंगों का इतिहास आज का नहीं, बल्कि उतना ही पुराना है जितना कि इंसानी शरीर। हमारा शरीर रंगों के संतुलन से बना है, और आज के व्यस्त दौर में भाग-दौड़ के बीच हमारे शरीर में होने वाले विकार, हमारे शरीर की सम्पूर्ण ऊर्जा के असंतुलन का परिणाम है।
 
रंग चिकित्सक सी. पी. श्रीवास्तव के अनुसार यह चिकित्सा हमारे शरीर के 7 चक्र पर आधारित  हैं। चक्र प्रत्यक्ष रूप से अंतःस्रावी (एन्डोक्राईन) ग्रंथी को जोडकर शरीर की सभी प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं, इस प्रकार यह हमारे शरीर की ऊर्जा प्रवाह को प्रभावित करते हैं तथा वातावरण से प्राथमिक ऊर्जा को अवशोषित करके ऊर्जा वाहिनीयों को भेजते हैं। पृथ्वी पर सभी ऊर्जाओं का जन्मदाता सूर्य है,  सूर्य के प्रकाश में विद्यमान विभिन्न तरंगदैर्घ्य के रंगों में ऐसी अनोखी शक्ति है जो गंभीर शारीरिक और मानसिक विकारों का भी नाश कर सकती है। रंग  हमारी  इसी ऊर्जा को संतुलित करते  है। प्रत्येक रंग में सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा  होती है। इस चिकित्सा में उपचार के रूप में रंग की ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। जैसे कि  सिरदर्द से निजात पाने के लिए  छोटी उंगली के नाखून के निचले हिस्से के पास हरा रंग लगाने पर  लाभ मिलता है।
 
कविता माहेश्वरी ने रंग चिकित्सा के प्रयोग के बारे में बताते हुए कहा कि दाहिनी हथेली में अँगूठे के निचले हिस्से पर हरे रंग को पॉइंट करने से उन्हें आँखों के नीचे काले घेरों से छुटकारा मिला। कविता रंग चिकित्सा से इतनी प्रभावित हैं कि उनके परिवार के सभी लोग अब रंग चिकित्सा से ही अपनी परेशानियों से निजात पा रहे हैं, वह हर किसी को इस चिकित्सा से ही उपचार करने की सलाह देती हैं।  लता माहेश्वरी का कहना है कि कई साल पहले चप्पलों के ब्रोच की वजह से उन्हें दोनों पैरों में इन्फेक्शन हुआ। जब किसी भी तरह के उपचार से उन्हें लाभ नहीं हुआ तब उन्होंने रंग चिकित्सा से उपचार करना शुरू किया और उन्हें इसका पूरा लाभ भी मिला है। रंग हमारे शरीर में जैव रासायनिक क्रियाएँ करके हार्मोन्स को सक्रिय करते हैं, और जब हम विभिन्न रंगों के संयोजन को किसी विशेष ग्रंथि पर पॉइंट करके त्वचा पर लगाते हैं तो सम्बंधित कोशिका में बिना रुकावट के ऊर्जा का प्रवाह होता है।
 
बदलते दौर में भी कुछ चीज़ें कभी नही बदलती, बस उन्हें समझने के तरीकों में बदलाव जरूर आता है। विविधता से पूर्ण भारतीय परिवेश में तो हमे रंगों का एक अनोखा समाजशास्त्र देखने को मिलता है। समाजशास्त्रीय दुर्खीम के शब्दों में कहें तो रंग भी सामाजिक तथ्य हैं, प्रकृति की हर रचना में रंगों का राग है। रंगों की महत्ता को दरकिनार नही किया जा सकता। किसी के लिये पीला रंग शुभ है तो दूसरे के लिए हरा। आपसी वैमनस्य से दूर जब यही रंग मिलते हैं तो एक अनोखी छटा बिखेरते हैं, इस बात से परे कि क्या शुभ है और क्या अशुभ।
 
– प्राची द्विवेदी

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