सारिस्का टाइगर रिज़र्व- भारत के सवाना

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1979

उत्तरी अरावली पर्वत माला के गोद में प्रकृति के हर रंग को संजोए सारिस्क टाइगर रिज़र्व अपने आप में एक वन्यजीव संरक्षण का एक अद्वितीय उदाहरण है। जहाँ प्रकृति ने स्वयं को इस कदर गढ़ा है कि बिना किसी प्रयास के यह स्वयम ही एक वन व वन्य प्राणियों का संरक्षित आवास बन गया है। दिल्ली से मात्र लगभग 200 किलोमीटर तथा जयपुर से लगभग 107 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सरिस्का राजस्थान के अलवर जिले में 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

वर्ष 2019 में हमें भी कुछ दिन तक सरिस्का में रहने का अवसर मिला। दिल्ली एयरपोर्ट से एक चार्टर्ड बस से हम और कुछ विदेशी वन्यजीव चिकित्सक सरिस्का पैलेस लगभग 3 घण्टे में पहुंचे। सरिस्का पैलेस जो कभी राजाओं का शिकार गाह हुआ करता था अब एक शानदार होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। यहां रहने का लुत्फ ही अलग है। चारों तरफ अरावली पर्वतमाला से घिरा प्रकृति की गोद में बसा पैलेस अत्यंत खूबसूरत प्रतीत होता है। कोर ज़ोन में होने से अक्सर बाघ व तेंदुए का मूवमेंट इस पैलेस के पास होता रहता है, परन्तु वे कभी मनुष्य पर आक्रमण नहीं करते। पैलेस के अतिरिक्त यहां राजस्थान टूरिस्म का भी होटल है। सरिस्का के शुष्क पर्णपाती वन अफ्रीका के सवाना की याद दिलाते हैं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार गोंडवाना महाद्वीप के अफ्रीका से अलग होकर यूरेशिया से टकराने के पश्चात भारत में यही एक ऐसा स्थान है जो अफ्रीका से अलग होने के तथ्य की पूर्ण पुष्टि करता है। इन वनों में बाघ, तेंदुआ, लकड़बग्घा, भालू, जंगली सुअर, सांबर, चीतल ओर लँगूर आदि बहुतायत में मिलते हैं। पहाड़ियों पर यह जंगल मिश्रीत वन होते हुए अत्यंत घने होते गए हैं। प्रकृति का सौंदर्य एवम पक्षियों की फोटोग्राफी के लिए यह स्थान उपयुक्त है।  सरिस्का प्रवास के दौरान देखने हेतु कई स्थान हैं जिनमे से कुछ को अनुमति लेकर देखा जा सकता है।

*भानगढ़- एक प्रेतबाधित शहर, जहां आधिकारिक रूप से सूर्यास्त के पश्चात प्रवेश वर्जित है।
*कंकवाड़ी दुर्ग- शायद कम ही लोगों को पता होगा कि अरावली की ऊंचाइयों पर अत्यंत दुर्गम स्थान पर एक दुर्ग है जिसमें औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह को कैद रखा था।
*पांडुपोल- हनुमानजी का महाभारत कालीन मन्दिर, जहां महाबली भीम ने गदे से अरावली पर्वतमाला को तोड़ा था।
*विराटनगर- तीसरी शताब्दी के बौद्ध अवशेष
सरिस्का में घूमने के लिए खुली जिप्सी व खुली बसें सदैव बुकिंग के लिए उपलब्ध रहती हैं। एक बार सरिस्का में प्रवेश कर लेने के पश्चात कब शाम हो जाती है पता ही नहीं चलता। ऊँची नीची पर्वतश्रेणी, उसपर झुकता आकाश और सर्पिलाकार रास्ते बरबस अपनी ओर खींचते रहते हैं। विशेषकर पांडुपोल और कांकवाड़ी दुर्ग के रास्ते इस कदर खूबसूरत हैं कि आप ज़िन्दगी भर इसे नहीं भुला सकेंगे। शाम के धुंधलके में अरावली के शिखर पर डूबते सूरज को देखना रोमांचक लगता है। यदि आप प्रकृति की खूबसूरती के साथ प्रकृति के संगीत का आनन्द उठाने चाहते हैं तो सरिस्का आज भी आपका इंतजार कर रहा है।
डॉ राकेश कुमार सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ

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