विलक्षण जीव : चींटियाँ

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mohini tiwari
Mohini Tiwari

“क्या तुमने चींटी को देखा ?
वह सरल , विरल , काली रेखा
तम के धागे-सी जो हिल-डुल
चलती प्रतिपल लघुपद मिल-जुल”

‘चींटी’ शीर्षक पर सुमित्रानंदन पंत द्वारा विरचित यह पंक्तियाँ चींटियों के व्यक्तित्व की विशालता का प्रतिबिंब है।
चींटी एक विलक्षण जीव है जो पिछले10 करोड़ वर्षों से अस्तित्व में है। वैज्ञानिकों द्वारा अबतक चींटियों की लगभग तीन हजार से अधिक प्रजातियाँ खोजी जा चुकी हैं। चींटियाँ आकार में छोटी-बड़ी और रंग में काली, भूरी या लाल हो सकती हैं। चींटियाँ शाकाहारी या मांसाहारी भी हो सकती हैं। किंतु प्रजाति चाहे जो भी हो, इनकी कर्मठता एवं जिजीविषा काबिल-ए-तारीफ है। चींटियाँ अत्यंत लगनशील व परिश्रमी होती हैं। ये कभी हिम्मत नहीं हारती। ऊँचाई पर चढ़ते समय ये कई बार गिरती है किंतु बार-बार उठकर पुन: चढ़ने का प्रयत्न करती हैं और अंततः अपने लक्ष्य को पाकर ही संतुष्ट होती हैं। सिडनी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार अर्जेंटीना की लाइनपिथेमा हुमाइल नामक प्रजाति की चींटियाँ अपने मार्ग में कोई बाधा आ जाने पर पीछे मुड़ने की बजाय एक नया और सबसे छोटा मार्ग खोजने में जुट जाती हैं। चींटियाँ किसप्रकार सबसे छोटे मार्ग का चयन करती हैं, यह तथ्य कम्प्यूटर नेटवर्क को विकसित करने में मददगार साबित हो सकता है।

चींटियों के व्यवस्थित समाज में हर चींटी अपनी उम्र एवं क्षमतानुसार कार्य चुनकर अपने एवं समूह के लिए भोजन-संग्रह करती है। चीटियों की गतिविधियों का अध्ययन करने के उद्देश्य से स्विस वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक बड़े समूह में रह रही हजारों चीटियों पर बारकोड चिपका दिए। उन्होंने यह पाया कि चीटियाँ तीन समूहों में विभाजित होकर कार्य करती हैं। पहला समूह छोटी चीटियों का था। दूसरा समूह युवा चीटियों का था एवं तीसरा समूह बूढ़ी चींटियों का था। चीटियों को पहचानने के लिए उन पर अलग-अलग रंग से कोट किया गया था। शोधकर्ताओं ने 60 हफ्तों में बारकोडिंग का कार्य पूर्ण किया। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि युवा चीटियाँ सबसे अधिक मेहनती होती हैं। ये निरंतर पत्ती काटने का काम करती हैं और छोटी चीटियों को सिखाती हैं। किंतु जब पत्ती काटते-काटते इनके दाँत घिस जाते हैं तो ये बूढ़ी हो जाती हैं। बूढ़ी चीटियों के लिए पत्ती काटना और उन पर पकड़ बनाए रखना बहुत मुश्किल होता है इसलिए अब ये चीटियाँ अपना कार्य पूरी तरह से बदल देती हैं। बूढ़ी चीटियाँ पत्ती काटने का कार्य युवा चींटियों को सौंप देती हैं और स्वयं पत्तियों को ढ़ोने का कार्य करने लगती हैं। एक चींटी अपने शरीर के भार से लगभग 50 गुना अधिक भार ढ़ोती है। इसप्रकार ये बुढ़ापे में भी अपने जीवन की उपयोगिता बनाए रखती हैं। चीटियों का यह गुण समाज के लिए एक अद्भुत उदाहरण है।

ओरेगॉन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार चीटियों की सूंघन-शक्ति तीव्र होती है। इन्हें भोजन की गंध बहुत दूर से पता चल जाती है। ये बड़ी कुशलता से भोजन तक पहुँचती हैं और उसे ढ़ोकर अपने बिलों तक ले आती हैं। चीटियाँ सदैव कतार में चलती हैं। ये जीवनोपार्जन के लिए भोजन की तलाश करती हैं एवं अपने बिलों की साफ-सफाई करके उनमें भविष्य के लिए भोजन संग्रह करके रखती हैं। वास्तव में चींटी एक सामाजिक प्राणी है जिसके जीवन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। मानो विधाता ने ‘गागर में सागर’ समाहित करके चींटी जैसे परिश्रमी एवं अनुशासनप्रिय जीव की संरचना की हो।

मोहिनी तिवारी

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