विद्या राजपूत से डॉ. फ़ीरोज़ अहमद की बातचीत – ‘…आखिर मैं भी इक इंसान ही हूँ’

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विद्या राजपूत एक ट्रांसवुमेन हैं। ‘मितवा’ समिति के माध्यम से उन्होंने एलजीबीटी और विशेष रूप से ट्रांसजेंडर्स के लिए अनेक सामाजिक व शैक्षिक कार्य सम्पन्न किए हैं। पुरुष तन में जन्म लेकर एक ट्रांसवुमेन के रूप में समाज के सामने आने तक की अपनी दर्दभरी जीवनयात्रा को वह प्रख्यात् पत्रिका ‘वाङ्मय’ सम्पादक डॉ. फ़ीरोज़ अहमद से साझा कर रही हैं। इसमें उन्होंने अपने जीवन के अनेक अनछुए और अनजाने पहलुओं को सामने रखा है।

मेरा गाँव फरसगाँव, कोडा गाँव बस्तर जोन में आता है। राजधानी रायपुर से 200 किमी दूर है गाँव। बचपन की शिक्षा गाँव में ही हुई। बारहवीं तक गाँव में ही पढ़ाई की। मैं घर में सबसे छोटी हूँ। मेरे तीन बड़े भाई और दो बहने हैं। पिता को नहीं देखा, माँ ही सब कुछ रही। हमारे घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब रही। माँ खेती और मजदूरी करके जीवन चलाती थी। बड़े भाई पुलिस की ट्रेनिंग के लिए निकल गए। दोनों बड़ी बहनों में एक आँगनबाड़ी में थी और दूसरी बहन भाई के पास रहकर पढ़ती थी। घर में माँ का हाथ बँटाना, सुबह उठकर पानी भरना, झाड़ू लगाना मुझे अच्छा लगता था। कक्षा एक–दो में स्कूल जाने पर सब लड़के बाहर मूत्र विसर्जन के लिए जाते थे। मुझे बाहर जाकर उनके साथ सूसू करने में शरम आती थी और स्कूल में केवल लड़कियों के लिए ही टाॅयलेट थे। साथी लड़के मुझसे कहते थे कि क्या तू लड़की है जो शरमाता है। मैं उनसे कहती नहीं, मैं तो लड़का हूँ। मेरा बाॅयलाॅजिकल स्ट्रक्चर भी लड़कों जैसा ही था और मुझे घर में लड़कों की तरह ही रखा जाता और व्यवहार किया जाता था। तब तक मुझे अपनी फीलिंग्स की जानकारी नहीं थी। मुझे जो अच्छा लगता मैं वही करती थी। मैं लड़कियों के साथ ही खेलती थी। मुझे लड़कों के साथ खेलना अच्छा नहीं लगता था। क्रिकेट खेलना, हाॅकी खेलना अच्छा नहीं लगता था। मुझे लड़कियों वाले खेल पसन्द थे। गुड्डे–गुड़िया के साथ खेलना अच्छा लगता था। स्कूल की छुट्टी होने पर मैं लड़कियों के साथ घर आती थी।

जब कक्षा तीन–चार में गयी तो मेरी शरम बढ़ने लगी और मैं अक्सर पेशाब करने जाने को दबाने लगी थी। उसके बाद मेरी हरकतें और बातचीत लड़कियों जैसी होने लगी थीं। घर पर मुझसे पूछा जाता था कि मैं लड़कियों के साथ क्यों रहती हूँ, क्यों खेलती हूँ। जब मेरे भाई मुझे लड़कियों के साथ खेलते देखते तो मुझे बहुत मारते थे। जो भी उनके हाथ में रहता था उसी से मारने लगते थे। मुझे बहुत डर लगता था। जब मैं कोई समान लेने जाती या मटके से पानी लेने जाती तो लोग मुझे बोलते थे कि यह तो ‘बाला’ है। मैं यह सुनकर डर जाती थी और सोचती कि ये लोग ऐसा क्यों बोलते हैं? मैं घर आकर रोती थी तब भी मुझे डांट पड़ती थी कि तू लड़का है तो क्यों रोता है, लड़कियाँ रोती हैं। मैं सुबह–सुबह घर में आँगन में झाड़ू लगाती थी तो कुछ महिलाएँ देखकर मुझे कहती थीं कि मैं ऐसा क्यों करता हूँ। लड़कियों वाले काम करने के कारण सब मुझे बोलते थे कि तू लड़की बनकर पैदा क्यों नहीं हुई। मुझे बहुत खराब लगता था कि लोग मेरे काम को लेकर ऐसा क्यों बोलते हैं। मुझे अन्दर–ही–अन्दर सजना–सँवरना बहुत अच्छा लगता था। लोग जो ब्लेड यूज़ करके फेक देते थे मैं उस ब्लेड से शेविंग बना लेती थी। काजल लगाती थी। भैया–भाभी आते थे तो उनका काजल ले लेती थी। काजल लगाने पर फिर मुझे मार पड़ती थी।

कक्षा छः में मुझे स्कूल में लड़की बनकर डांस करने का मौका मिला। लड़कियों के साथ खेलते समय हम लोग रेडियों पर गाना बजाकर डांस करते थे। मुझे डांस करते देख मेरे भाई मुझे मारने लगते थे। एकबार मेरे एक सीनियर ने मुझे डांस सिखाया और मैंने गणेश पूजा के अवसर पर डांस किया। पहले तो मेरे साथ के लोग ही मुझे जानते थे लेकिन जब मैंने पब्लिकली डांस करना शुरू किया तो बहुत सारे लोग मुझे जानने लगे। मेरे डांस को देखकर लोग मुझे लड़की समझने लगे। घर में चिंटू है बोलते थे। अब वे मेरे साथ ज्यादा छेड़खानी करने लगे। जब मैं माँ के साथ बाज़ार या अस्पताल जाती थी तो लोग छेड़ते थे और बोलते थे कि मैं लड़की बनकर डांस क्यों करता हूँ। कभी–कभी मैं सोचती थी कि लोग मेरे लिए ऐसा क्यों बोलते हैं? क्या लोगों को पसन्द नहीं आ रहा? शायद ये सब लोग सच ही बोल रहे हैं। क्या सच में मेरे साथ कुछ समस्या है? मैं बहुत सोचने लगी। ज्यादा सोचने और मानसिक रूप से परेशान रहने के कारण मैं कक्षा छः में फेल हो गयी। फेल होने पर मैं और डर गई क्योंकि मुझे लगा कि जब घर में पता चलेगा तो मुझे मार पड़ेगी। इसलिए मैं एक पहाड़ पर चढ़ी और वहाँ से कूदने की सोचने लगी लेकिन फिर डर गयी। पहाड़ से मैं नीचे उतर आई और दूसरे गाँव भाग गयी। कुछ पैसे थे मेरे पास। वहाँ से 15 किमी मैं जीप में बैठकर गयी और 15 किमी पैदल चली। मेरी मम्मी ने दूसरे दिन मुझे ढूँढ़ लिया। तब तक थाना–कचहरी भी हो चुका था। मम्मी मुझे यह कहकर घर ले गईं कि चल तुझे कोई नहीं मारेगा लेकिन घर में मेरी खूब मार पड़ी। मैं इतना डर गयी कि किसी को बोलूँगी तो और मार पड़ेगी। फिर मेरा दूसरे स्कूल में एडमिशन हुआ। मुझे समझाया गया कि खूब पढ़ना है। मुझे भी लगा कि मैं पढ़ूँगी। दूसरा स्कूल हाईस्कूल था। हायरसेकेन्ड्री भी था। लेकिन अभी भी मेरी सहेलियाँ लड़कियाँ ही थीं। लड़के मुझे देखकर कहते थे कि देख छक्का आया है। लेकिन मैं पूरा ध्यान पढाई पर देने लगी। वहाँ भी बाथरूम जाने की समस्या आई। रिसेस के समय लड़के खेत की तरफ जाते थे। मैं रिसेस खत्म होने के बाद बाथरूम जाती थी। वापस आती थी तो कई बार टीचर्स की डांट और मार भी पड़ती थी। कई बार दिन दिन भर बाथरूम रोककर रहती थी तो तबीयत भी खराब हो जाती थी। पढ़ाई के साथ मुझे यह भी डर लगता था कि कोई मुझे छक्का या मामू न बोले। मेरे साथ जो नारीत्व था या शारीरिक समस्या थी, उसका कोई नाम नहीं था। जो नाम थे वे अपशब्द थे और मुझे अपशब्दों से डर लगता था। मैंने यह देखा था कि मेरे गाँव में एक फूलबाई नामक किन्नर थी, वह किन्नर बाज़ार उठाती थी। एक दीगा करके था, वह कपड़े का काम करता था। वे लोग कम्युनिटी से थे। उन्हें देखकर डर लगता था। लोग मुझे भी बोलते थे कि ये कभी तुझे ले जाएँगे। मैं बाज़ार में उन्हें देखकर बहुत डरती थी। घर की मार, लोगों के कमेंट से मैं और अधिक अकेली होती चली गयी। यह सब सोचते–सोचते और डरने के कारण मैं डिप्रेशन में चली गयी। मेरा आत्मविश्वास पूरी तरह से खत्म हो गया। मुझे लगता था कि मैं खुद को ही खत्म कर लूँ। मुझे कुछ समझ में ही नहीं आता था। थोड़ा सा भी कान्फिडेंस नहीं था मेरे अन्दर। मैं अपने अन्दर की बातों को भी शेयर नहीं कर पाती थी। बहुत डरती थी। मुझे कोई लड़का मिलता था तो लगता था कि मैं अपने अन्दर की बातें उससे शेयर करूँ लेकिन हिम्मत नहीं पड़ती थी।

…उसके बाद यह रात की क्लास खत्म हुई मैं पास भी हो गयी। फिर मैं जब आगे क्लास में गयी तो मैं बड़ी हो रही थी और लोगों को मैं ज्यादा विजुअल हो रही थी। इसीलिए लोग मुझे ज्यादा टारगेट करते थे। किन्नर, छक्का, मामू और ऐसे ही बहुत सारे शब्द बोलकर मुझे चिढ़ाते थे। मेरी माँ भी मुझे नहलाते समय अक्सर कहती थी कि तू लड़कियों के साथ मत खेलना नहीं तो बाला हो जाएगा। मुझे समझ नहीं आता था कि सब मुझे ऐसा क्यों बोल रहे हैं। यदि मुझे लड़कियों की तरह रहने में, काजल लगाने में, कपड़े पहननने में अच्छा लग रहा है तो लोग मुझे टारगेट क्यों कर रहे हैं। ऐसे ही सोचते–सोचते दिन गुजर जाता और मैं अगले दिन का इन्तजार करती थी। हर दिन मैं यही सोचती थी कि कल सुबह उठकर में आत्महत्या कर लूँगी लेकिन अगले सुबह उठती थी तो माँ घर का काम करने को कहती, पानी भरने को कहती, झाड़ू लगाना कपड़े फैलाना आदि सब काम सामने होते । यह सब करते हुए मेरा मन बदल जाता था। मैं सोचने लगी कि यदि मैं मर जाऊंगी तो माँ का ख्याल कौन रखेगा। इससे तो अच्छा है कि मैं बड़ी होकर नौकरी करके माँ को अच्छे से रखूँगी, उसे कुछ काम नहीं करने दूँगी। मेरे घर की हालत अच्छी नहीं थी। मजदूरी करके, साइकिल किराए पर लेकर, लकड़ियाँ बीनकर हम बेचते थे,तब जाकर हम लोगों का गुजारा होता था। माँ शराब भी बनाती थी। घर में पपीते होते थे उसे हम लोग सड़क पर बेचते थे। खेत बहुत कम था हमारे पास लेकिन खेती भी करते थे। घर में सही से पढ़ने को भी नहीं मिलता था। मेरे भाई लोग बहुत लड़ाई करते थे। इसलिए मैं दूसरे के घर पढ़ने जाती।
एक और चीज़ मेरे जीवन में आने लगी थी कि मैं पुरुषों की ओर आकर्षित हो रही थी। जब मैं लड़कों की तरफ आकर्षित हो रही थी तो वो लोग मुझे कहते थे कि तुम लड़कों की तरह रहो यह सब लड़कियाँ करती हैं। तू खराब हो जाएगा, हिजड़ा बन जाएगा, मामू बन जाएगा। जिन लड़कों से मेरी दोस्ती होती थी उनके परिवार वाले मना कर देते थे कि उसके साथ मत रहो। ऐसे में मैं बहुत अकेली हो जाती थी। बहुत नर्वस फील करती थी, लेकिन मैं बच्ची थी इसलिए कुछ समय बाद मेरा मन डायवर्ट हो जाता था मैं खेलने–कूदने में व्यस्त हो जाती थी। मैं यही सोचती थी और सपना देखती थी कि मैं कब लड़की बनूँगी मुझे लड़की बनने का प्रोसेस नहीं पता था। खेल–खिलौने मेरी पसन्द–नापसन्द लड़कियों की तरह ही थी। मैं यह भी सोचती थी कि यदि मैं लड़की बन गयी तो घर वाले बहुत मारेंगे, नहीं मुझे लड़की नहीं बनना है। अब मैं 9वीं क्लास में पहुँच गयी। मैं लड़कियों के पीछे ही बैठती थी। लड़के–लड़कियाँ मुझे चाक फेंक कर मारते थे। कई बार रिएक्ट भी करती थी। वो गाली–गलौच करते थे, मैं भी गाली–गलौच करती थी। मुझे चैलेंज करते थे कि तू लड़का नहीं लड़की है, तू बाहर मिलना, मैं मिलती थी तो वे मुझे मारते थे। घरवाले पूछते तो मैं कह देती कि मैं गिर गयी, कभी साइकिल से गिर गयी, कभी कुछ बताती थी। उसके बाद क्लास 10, 11, 12 में पहुँची तो फीस वगैरह के पैसे नहीं हो पाते थे तो मेरे टीचर्स मुझे पढ़ाते भी थे और यूनीफार्म की मदद भी करते थे। मेरे नंबर अच्छे आने लगे थे। मैं पढ़ने में ठीक–ठाक होने लगी। मुझे लगता था कि कोई नौकरी आदि करूँ। क्लास 7 में थी तो प्रिंसिपल बनूँ। 10 में थी तो हैडमास्टर बनूँ। फिर मैं 12 में आई तो सोचने लगी कि चपरासी बन जाऊँ वही बहुत है। चीजें कठिन होती गईं। मैं एग्रीकल्चर कालेज में एडमिशन के लिए गयी लेकिन मेरा एडमिशन नहीं हुआ। मैंने सोचा कि मैं बीटीआई में एडमिशन ले लूँ, वह भी नहीं हुआ तो मैं गाँव में ही काम ढूँढ़ने लग गयी।

जब मैं 9 में थी तब एक लड़के से मेरा एट्रेक्शन हुआ। मैं उससे बोल नहीं पाई। वह मेरी एक सहेली को पसन्द करता था। वह विकलांग थी। वे दोनों अच्छे दोस्त बने। मैं उस लड़के से अपने मन की बात नहीं कह पाई क्योंकि मेरे मन में डर था कि मैं लड़का हूँ तो लड़की जैसा क्यों सोच रहा हूँ। मैं यही सोचती थी कि मैं लड़का बनूँ। मुझे स्काउट लेना है, एनसीसी लेना है यह मैं सोचती थी। मुझे ब्वायज ग्रुप में रहना है, लेकिन उसमें मेरा शोषण होता था। अपशब्द, कमेंट्स आदि बहुत होते थे। क्लास 12 के बाद मैंने एक जाॅब की टीचरशिप की, एक साल तक।उससे मुझे बहुत हेल्प मिली। वहाँ मैं लड़कियों के साथ खेलती थी, डांस करती थी। लेकिन बहुत समय तक नहीं कर पाई। घर में मार पड़ती थी। 9-10 के बाद मैंने वह सब बन्द कर दिया। मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं कत्थक डांस सीखूँ, बालीवुड डांस सीखूँ लेकिन घर में इतनी बंदिशें थीं कि नहीं कर पायी। मेरी चार–पाँच सहेलियाँ थीं, वे बहनें थीं। उनके साथ मेरे भाई देख लेते थे तो मुझे कुल्हाड़ी या कुछ भी लेकर मारने दौड़ते थे। एक बार तो मैं पेड़ पर सोई थी। मेरी एक सहेली थी जो ग़ज़ल लिखती थी। मैं उसके साथ ही ज्यादा समय बिताती थी। उसका नाम दर्शन कौर था लेकिन उसे बरखा बोलते थे। वह अभी भी मेरी सहेली है। उसकी शादी हो गयी थी। उसका हसबैंड सीओ है। एक लड़का था, वह मेरा दोस्त बना। वह मुझे छेड़ता नहीं था मैं जैसी हूँ वैसा ही एक्सेप्ट करता था। वह बहुत बड़ा बिजनेसमैन है आज की डेट में। दोनों के दो–दो बच्चे हैं। उसका ससुराल नागपुर में है। वह जब भी आता है मुझसे मिलता है। आज भी हमारी हर दो–चार दिन में बातचीत होती है।

मैं टीचर बनी तो मेरे मन में था कि मेरे बच्चे हर चीज में फर्स्ट आएँ । मैं तैयारी करती थी। गाँव में धान रखने वाला छोटा–सा कमरा कोठार था। मैं वहीं रहती थी। बहुत अच्छा लोकेशन था। चारों तरफ पहाड़ियाँ–झील थीं। वहाँ नक्सलवादी मीटिंग करने आते थे। मैं भी एक बार मीटिंग में गयी। उन्होंने मुझसे कहा कि 14 अगस्त को काला झंडा फहराओ। हमारी एक और टीचर थी उसे कोंडी भाषा आती थी। उसने कहा कि यदि हम काला झंडा फहराएँगे तो हमें नौकरी से निकाल दिया जाएगा। वो लोग कोंडी भाषा में पोयम बना रहे थे। वह जंगल को बचाने की बात कर रह थे, जमीन को बचाने के बारे में बातें कर रहे थे। मीटिंग खत्म हुई। उनके चार आदमी पहाड़ी पर और चार आदमी मैदान में थे। उन्होंने पचास–साठ गाँव वालों को बुलाया। उनसे बातें कीं, खाना खाया और फिर रात में बारह बजे के करीब वो लोग चले गये।

मैं स्कूल के बच्चों और आश्रम के बच्चों को इकट्ठा करके पीटी करवाती, खो–खो, हाई जम्प, लाँग जम्प, कबड्डी वगैरह करवाती थी। इस तरह ब्लाक स्तर का स्पोर्ट्स हुआ तो मेरे स्कूल के बच्चे फर्स्ट आए। कई प्रतियोगिताओं में कई स्तरों पर मेरे बच्चे फर्स्ट आए। क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में भी, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी। मुझे बहुत खुशी हुई कि जो टीचर्स मुझे पढ़ाते थे, मैं उन्हीं के साथ टीचर हूँ। लेकिन मुझे माँ को छोड़कर गाँव आना पड़ता था। मेरे से वह जगह लगभग 40 किमी दूर थी। मैं वहीं रहती थी और गाँव में माँ बहुत रोती थी। घर में मैं मम्मी का सहयोग करती थी। जब मैं गाँव आती थी तो मम्मी मेरे लिए खाने का सामान पैक करके देती थी। कोई मदद नहीं करता था। मेरे भाई लोग कंडक्टरी करते थे। उनकी आदत खराब होने लगी थी, वो लोग पीने भी लगे थे। इसकी वजह से मेरी मम्मी बहुत परेशान हो जाती थी। इस तरह एक साल बीता। मेरे स्कूल के हैडमास्टर मुझसे बहुत खुश थे। इसके बाद मैं वापस गाँव आ गयी। मेरा आई.टी.आई की वेटिंग लिस्ट में नाम आ गया। मैं एक शादी में आई थी भिलाई। मेरी दीदी भिलाई में थी। वह मुझे बोलती थी कि तेरे पास लड़कियों की ही चिट्टी क्यों आती है। तेरी दोस्ती लड़कों से क्यों नहीं है। मुझे लगा कि मेरी दीदी कहीं–न–कहीं मुझे लेकर वह शरम महसूस करती है। मेरे रहने में, मेरे होने में। लेकिन मैं वहीं रहते–रहते आईटीआई कर ली।

आई टी आई में शहर के बदमाश लड़के थे। मैं बाथरूम जाती तो वो बाहर से बन्द कर देते थे। मुझ पर पेशाब कर देते थे। अपने इंटरनलपार्ट को टच करवाते थे। क्लास में कोई भी सामान मार देते थे। टीचर्स भी उनसे ज्यादा नहीं बोलते थे क्योंकि लड़के बदमाश थे। एक दिन टीचर्स पढ़ा रहे थे और लड़के मुझे परेशान कर रहे थे तो मैं चिल्ला दी। उन लड़कों ने मुझे बहुत मारा। जब घर आई तो दीदी ने मुझसे पूछा मैंने कह दिया कि साइकिल ट्रक से टकरा गयी। दीदी बोली कि साइकिल को तो कुछ नहीं हुआ है, लेकिन वह समझ रही थी कि मार–पिटाई हुई है। वह पूछ रही थी कि बताओ क्या हुआ। मैं बताना नहीं चाह रही थी क्योंकि मुझे डर था कि यदि बात बढ़ती है तो मेरी पर्सनैलिटी पर आएगी, मेरे विहेवियर पर आएगी। मैंने रिसेस में भी बाथरूम जाना बन्द कर दिया और मैं क्लास में ही बैठी–बैठी पढ़ती रहती थी। फिर मैं फर्स्ट आई। अर्द्धवार्षिक परीक्षा के बाद बहुत सारे लड़के मेरे दोस्त बन गये। उनमें से एक तो मंत्री के साथ है। कई लड़कों से आज भी मेरा संपर्क है। मैंने आईटीआई की और फिर मैं गाँव आ गयी । गाँव आकर देखा मेरी माँ की हालत ठीक नहीं है। बहुत अधिक फाइनेंशियल प्राब्लम है। मैंने एक न्यूज पेपर में देखा वैकेंसी निकली थी। उसे लेकर नौकरी ढूँढ़ने लगी। मैंने एक रोस्टोरेंट में काम किया, एक दिन टायलेट साफ करने का काम किया, एक दिन पीसीओ में काम किया, फिर मुझे होटल मैनेजर का काम मिल गया। मैंने तीन साल तक होटल मैनेजर की नौकरी की। लेकिन ये तीन साल बिताना आसान नहीं था। मेरे साथ एक और स्टाफ थे जिनकी नाइट ड्यूटी रहती थी। वह कई दिनों तक नहीं आते थे तो मैं डे नाइट–डे नाइट ड्यूटी किया करती थी। मेरी तनख्वाह 1000 रुपये थी, और भी लोग थे स्टाफ में लेकिन मैं किसी से बात नहीं करती थी। मैं बिल्कुल अकेली थी। मुझे लगता ता कि अगर मैं बात करूँगी तो सबको पता चल जाएगा। मेरे बारे में मुझे समझ ही नहीं आता था कि ट्रांसजेंडर क्या होते हैं? हिजड़ा कौन है। बस इतना पता था कि ऐसे सोच–विचार रख रही हँ तो मैं गलत हूँ अपराधी हूँ। यह मेरी अन्तरात्मा की आवाज़ थी, अन्तरात्मा का अहसास था, उसे कैसे छोड़ सकती थी। मैं एक के साथ बात करने लगी थी। होटल का मालिक भी रात को पीकर बार–बार फोन करता था, काटता था। होटल के क्लाइंट से बात करती तो उसके ऊपर भी वह कमेंट करता था। मुझे अच्छा नहीं लगता था। सोचती थी नौकरी छोड़ दूँ। बहुत प्रेशर फील करती थी।

वहाँ भी मुझे होटल लाइन में आकर्षण हुआ था। मैं एक्सप्रेस होना चाहती थी। मेरे अन्दर जो चल रहा था उसे शेयर करना चाह रही थी और मैं वह अटेंशन चाहती थी जो एक लड़का और लड़की में होता है। जो लव, रोमांस, केयर करते हैं वह मैं अनुभव करना चाह रही थी। लेकिन नहीं हो पा रहा था। एक कम्युनिटी के लोग मुझे बोले कि कुछ लोग हैं जो गार्डन में मिलते हैं और आ रही हूँ, जा रही हूँ जैसी बात करते हैं। मुझे आश्चर्य हुआ और एक रात में मैं 10 बजे अपनी ड्यूटी खत्म करके वहाँ गयी। मैंने देखा कि वहाँ मेरे जैसे लोग डांस कर रहे हैं चाँदनी के गानों पर। शुरू में तो मैं अन्दर नहीं गयी क्योंकि मुझे लगा कि यदि मैं उनके पास चली जाऊँगी तो उनके जैसे हो जाऊँगी और फिर कभी वापस नहीं आ पाऊँगी। फिर मेरी मम्मी का क्या होगा उसकी तबीयत खराब हो जाएगी। वह मुझे राजा बेटा समझती है, मेरी शादी कराएगी। फिर तीन–चार दिन के बाद मैं अन्दर चली गयी। वहाँ जाकर पहली बार मुझे रिलीफ महसूस हुआ इतनी बड़ी लाइफ में कि मैं अकेली नहीं हूँ और हम जैसे हैं, वैसे ही एक्सप्रेशंस के साथ इधर–उधर घूमते थे, बात करते थे।

फिर मैंने 2000 में होटल का जाब छोड़ दिया। तभी छत्तीसगढ़ बना था। फिर मैं गाँव वापस आ गयी और वहाँ काम करने की सोचने लगी। फिर वहाँ होटल का काम करने लगी। अब मेरे कई दोस्त थे मेरी कम्युनिटी के। फिर मेरी लाइफ में एक लड़का आया जिसके साथ पहली बार मुझे मेंटली, फाइनेन्शियली और फिजीकली, सब तरह की संतुष्टि मिली। लड़के का नाम मुरली था। काफी समय तक वह मेरे साथ घर में रहा, फिर मैं उसके घर में रही बाद में उसकी शादी हो गयी। दो बच्चियाँ हैं उसकी। उससे अब कोई सम्बंध नहीं है। उस लड़के के साथ मेरे रिलेशन खराब होने लगे क्योंकि मेरे लिए उससे कुछ उम्मीदें ज्यादा थी। मैं उसके जीवन का एक हिस्सा थी जबकि मेरे लिए वह सबकुछ था। हमारे सम्बंध खराब हो गये, उसकी शादी हो गयी। उसकी शादी ने मुझे हिलाकर रख दिया। फिर उसके बाद 2008-09 में मैंने सोचा कि मुझे होटल में जाब नहीं करना है, मुझे कुछ और काम करना चाहिए। उन्हीं दिनों कुछ लोग गार्डन में आए। कोई एम पी से थे वेद शुक्ला करके, वो लोग एचआईवी के बारे में बात करने लगे। संगठन के बारे में बात करने लगे। जो प्रोग्राम है उसमें क्या–क्या सुविधा मिलेंगी उसके बारे में बात करने लगे। यह सुनकर अच्छा लगा कि कोई बाहर की दुनिया से आकर हमारे से बात कर रहा है ।वह भी तब, जब हम अपने जेण्डर के साथ एक्स्प्रेस हो रहे हैं। मैंने होटल की नौकरी छोड़ी और मैं इनके साथ काम करने लगी मेरी तनख्वाह साढ़े पाँच हजार रुपए थी।

एक बार मैं जब होटल में थी तो जब मैं घर आ रही थी तो कुछ लोग मुझे अपशब्द कहने लगे। मैंने पलटकर जबाव दे दिया तो लोग मुझे मारने के लिए आए। छत पर चढ़े और पत्थर मारने लगे। इसमें मेरी मम्मी को भी चोट आई। मेरी मम्मी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। मैं उन्हें लेकर यहाँ आ गयी और उनका ट्रीटमेंट करवाया। बहुत दिनों तक ट्रीटमेंट चला। उनकी सेवा करने के बाद मैं जाब में जाती थी। घर में ताला लगाकर। एक दिन मैं ड्यूटी में थी तो पता लगा कि उन्हें अटैक आया है। बहुत बारिश हो रही थी। मैं मम्मी को लेकर हास्पिटल पहुँची तो पता लगा कि उनकी डेथ हो गयी। लेकिन उनके साथ मेरा आखिरी समय बहुत अच्छा बीता। उन्हें मंदिर लेकर जाना, उन्हें अलग–अलग जगह घुमाना, उन्हें रोटी बनाकर खिलाना। कंघी करना, नहलाना, टायलेट–बाथरूम सब। मुझे ऐसा लगा कि मैं मदरहुड जी रही थी। मम्मी बोली कि मैं मर जाऊँगी तो तू अकेला हो जाएगा। यह सच भी हुआ। मैं अकेली हो गयी। मैं गाँव चली गयी, फिर वापस आई। अन्दर बहुत घुटन थी। मैं अपने जैसे ही लोगों के साथ काम करने लगी। उनके साथ अपनी स्टोरी शेयर करने लगी। फिर धीरे–धीरे बहुत सारा काम हुआ। हम लोगों ने बहुत सारा काम किया। उसके पीछे भावना यही थी कि हम जैसे लोगों को जो अकेलापन सामना करना पड़ता है, जो प्यार नहीं मिल पाता, यह सब नहीं होना चाहिए। एक समान परवरिश हो जैसे एक बच्चे के लिए परिवार करता है, उसके लिए ही हम काम करने लगे।

जब मेरा ब्रेकअप हुआ तो दिमाग में था कि वह कैसे मुझे यूँ ही छोड़ सकता है? कोई जवाबदेही भी नहीं। मैं थाने में जाकर कंप्लेन्ट भी नहीं कर सकती। मैंने यह बात अपनी फैमिली से भी शेयर नहीं की। मेरे मन में इस बात की घुटन थी और कहीं–न–कहीं यह भी था कि घर से बाहर निकल गयी थी तो थोड़ा बहुत कांफिडेंस आ गया था कि मुझे अपनी बात भी रखनी है और कुछ तो करना है। आखिर इतना प्रेशर में मैं कैसे रह सकती हूँ। उसके बाद जिस समय मैं कम्युनिटी के लोगों से मिली, एक एनजीओ वाले भी आए और उन्होंने हम लोगों के अधिकारों के बारे में बताया। पहली बात तो यह कि दूसरी दुनिया से कोई हमारी दुनिया में आया और जैसा हम जीना चाहते हैं या फील करते हैं उसे वो लोग सपोर्ट कर रहे हैं। पहली बार पता चला कि हमारे भी कोई अधिकार हैं। मुझे पता चला कि वहाँ कोई पोस्ट है तो फिर मैं होटल को छोड़कर एनजीओ के साथ काम करने लगी और वह पहली जगह थी जहाँ हम जैसे हैं, वैसे ही हिसाब से लोग हमें रख रहे थे। हम सिंसियर होकर काम कर रहे थे तो मुझे प्रशंसा भी मिली। मैं वहाँ अपने जैसे बहुत सारे लोगों से मिली। उस एनजीओ से कई कम्युनिटी के लोग जुड़े थे तो पहली बार अपने बारे में बात करने का मौका मिला कि हमारे लाइफ में क्या–क्या स्ट्रगल्स हैं। क्या–क्या चीज़ें गलत हैं, क्या–क्या गलत हो रही हैं। क्या–क्या नहीं होनी चाहिए और क्या–क्या होनी चाहिए, सबकुछ जानने–समझने का मौका मिला। कितने सारे लोग हैं जो अलग–अलग समस्याओं से जूझ रहे हैं। अलग–अलग कम्युनिटी के लोग थे तो सबके अनुभव भी जानने का मौका वहाँ मिला। वह समय था 2009-10 का। उसके बाद अच्छा–सा फील आने लगा कि इतने सालों से जो घुटन था उसे रिलीज होने के लिए एक जगह मिली। वहाँ पर सैलेरी कम थी। जॉब की भी कोई गारंटी नहीं थी कि कोई प्रोजेक्ट है जो कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा। हम अपने दर्द को बोलकर कम कर रहे थे। एक तरह से अपने लिए काम कर रहे थे। वहाँ हमें बोलने का मौका मिला। यह अच्छा था। अपनी मन की बातें रखने का मौका मिला। उसी समय बाहर के कुछ लोग आए। वो गुजरात के थे। उन्होंने कहा कि आप एक संगठन के लिए काम कीजिए। उन्होंने हमसे कहा कि आप अपने इश्यूज सबके सामने रख सकते हैं। उन्होंने पूछा कि आप करना क्या चाहते हैं तो कुछ लोगों ने कहा कि हम ओल्ड एज लोगों के लिए काम करना चाहते हैं, तो कुछ ने कहा कि हम विकलांग भाई–बहन के लिए काम करना चाहते हैं। किसी ने कहा कि मैं डाॅक्टर–इंजीनियर बनना चाहता हूँ। इस तरह एक अवसर आया जो सोशल इक्वेलिटी के लिए काम करने का था। उसी में किसी ने बताया कि हम अपने लिए और अपने जैसे लोगों के लिए कितना काम कर रहे हैं? उनकी बात मुझे बहुत अच्छी लगी क्योंकि वहाँ बच्चों की एजूकेशन की बात हो गयी, विकलांग के लिए बात हो गयी, दलित महिलाओं के लिए बात हो गयी। अच्छी बात है कि इन सब मुद्दों पर लोग काम कर रहे हैं लेकिन मुझे लगा कि हमारे मुद्दों पर कौन काम कर रहा है। तो फिर हम लोगों ने एक संगठन बनाया जिसका नाम ‘मितवा’ है और उसे हम लोगों ने रजिस्टर्ड भी कराया। उस समय मुझे इन सबका सिस्टम नहीं पता था। कुछ नहीं पता था कि धारा 27, 28, मिनट, आडिट रिपोर्ट वगैरह क्या होते हैं। इतना जरूर था कि हम लोगों ने संगठन रजिस्टर्ड करवाया और काम करना शुरू किया। वह काम ऐसा था कि सबसे पहले तो मितवा की आई डी देना शुरू किया। ढूँढ़–ढूँढ़ के लोगों को निकालने लगे कि आप एक्चुवली रिलीज होइए, रिलीफ होइए। हमारी कम्युनिटी का कोई व्यक्ति आकर जब बात करता था तो कनेक्शन बनता था कि हाँ, हमारे साथ और भी लोग हैं। जिस गार्डन में मैं जाती थी वहाँ बहुत के कम्युनिटी, नान कम्युनिटी के लोग आते थे। सब खुलकर बात करते थे, डांस करते थे। जो जिस जेंडर में फील करता था वह उसी में बात करता था जैसे मैं जा रही हूँ, आ रही हूँ आदि में बात करती थी। उस समय हमें थर्ड जेंडर का नाम नहीं पता था। कोई कहता था हम समलैंगिक हैं, कोई कहता था नपुंसक हैं, कोई कहता कि नामर्द हैं, कोई किन्नर है….कुछ भी ऐसा नाम जो अच्छा नहीं था। उस समय तो थर्ड जेंडर का कांसेप्ट नहीं था। लेकिन अन्दर–ही–अन्दर कुछ ऐसा था कि इस विषय पर बात होनी चाहिए। जितना ज्यादा हो सके उतना ज्यादा बात होनी चाहिए। जितना ज्यादा बात होगी उतना ही ठीक होगा। हम यही सोचते थे कि कल क्या करें, परसों क्या करें, नरसों क्या करें। लोगों की काउंसलिंग करना, भरोसा दिलाना कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। लोगों के साथ डांस करना, पिकनिक पर जाना। यह था कि अपनी मर्जी से अपनी तरह से अपने शहरों पर चलना। पहले तो मैं अपने गाँव में बस स्टैण्ड के रास्ते में निकलने में घबराती थी, डरती थी क्योंकि लोग चिढ़ाते भी थे। मुझे लगता था कि मैं किसी की नज़रों में न आऊँ लेकिन अब हमारा संगठन था। हम दस–बीस लोग एक साथ थे। तो आराम से चलते थे, घूमते थे। गढ़ी चैक से लेकर मालवी रोड आदि जगहों पर हम चलते थे। लोग छेड़ते भी थे तो एंजाॅए करते थे। हम एक्सप्रेस हो रहे थे। हमें एक्प्रेशन फ्रीडम मिला था। यह कितना सही था कितना गलत था और समाज के लोग कहते थे कि अब इन छक्के लोगों का भी शुरू हो गया लेकिन हमें पता था कि हमारी आजादी का यह प्रथम चरण था। हम बहुत खुश थे। हम घूमते थे। लोग कुछ भी कहें, हमें चिन्ता नहीं थी। वी डोन्ट केयर। हमारे दिमाग में यह था कि हमें काम करना है। हम जो भी हैं, जैसे भी हैं, जो भी हमारी अभिव्यक्ति जैसी भी हो उससे हमारे काम और कैरेक्टर स्तर से कोई लेना–देना नहीं था। हमारा काम और कैरेक्टर ही डिसाइड करेगा कि हम किस कार्य के लिए हैं। ‘व्हाट आई एम’ यह मेरा कर्म डिसाइड करेगा। मेरा कर्म क्या है, कर्म फॉर सोशल इंफ्लूएन्सिंग, कर्म फॉर कम्युनिटी वेलफेयर,कर्म फॉर जेण्डर इक्वालिटी। फिर हमने काम करना शुरू कर दिया। नवरात्रि में नर्सों का सम्मान करना एक ऐसा कान्सेप्ट है क्योंकि ईश्वर को हमने देखा नहीं, माता को हमने देखा नहीं लेकिन माता जब भी कहीं विराजती है तो वह स्त्री के रूप में ही, माता को रूप में ही विराजती है। माता जो है स्त्री स्वरूप है और स्त्री माता का स्वरूप है, माता हर जगह नहीं लेकिन जब भी हम बीमार होकर हास्पिटल में जाते हैं, पहला चादर जो उठाती है या फिर मृत्यु शैया पर होते हैं तो हमें नर्स ही सम्भालती है। इसलिए माता हमारे लिए नर्स हुई। कुछ काॅन्सेप्ट थे उसमें जैसे नर्सों को अगरबत्ती पकड़ाना, चाकलेट देना, सबसे छोटी नर्स की पूजा करना, फ्लावर देना। ऐसा ही हम लोगों ने ट्रैफिक पुलिस वालों के साथ, पुलिस वालों के साथ, टीचर्स के साथ, टायलेट साफ करने वालों के साथ में किया। जो लोग रास्ते चलते हम पर हँसते थे अभी वो लोग हमसे रिस्पेक्ट ले रहे हैं। इन सब चीज़ों से मेरे अन्दर बहुत कान्फिडेंस आया। मेरे अन्दर बहुत सकारात्मक बदलाव आ रहे थे। अब मुझे पीछे पलटकर देखने का समय नहीं था। मैं बता चुकी हूँ कि मेरी मम्मी गुजर गयी थी। मेरे दो भाई थे वो मुझसे बातचीत करते थे, कभी–कभी आते थे, वो लोग ड्रिंक्स बहुत लेते। हम तीन लोग थे जो बहुत क्लोज थे। मैं, मेरे से बड़े वाला रघुराज भैया, उससे बड़े राज भैया और सबसे बड़े वाले भैया जो अभी भी हैं के.एस. राजपूत। उनके दो बच्चे हैं दिव्यम राजपूत जो सेन्ट्रल पुलिस में है और दूसरा भरत राजपूत जो पटवारी है और उसकी वाइफ महारानी है और गुड़िया। अभी भी बातचीत होती है। दो भाइयों से मेरी बातचीत होती थी। लेकिन अब मैं बाल बढ़ाने लग गयी थी। सेविंग भी बनाने लग गयी थी। उस आफिस में काम करने लग गयी थी। मेरे भाई लोग मेरे लिए 200 किमी दूर मेरे गाँव से सामान भी लाते थे। लेकिन मैं भाइयों के सामने सहज नहीं हो पाती थी। अब मैं अलग पर्सनालिटी के साथ जी रही थी। लेकिन मेरे भाइयों के लिए मैं भाई ही थी। तकलीफ होती थी कि अभी भी ऐसा क्यों है और अभी भी मैं लड़की ही बनना चाहती थी। पर मुझे लगता था कि मुझे ट्रांसफार्मेशन के लिए भी जाना है। लेकिन जब मैं खुलकर काम करने लगी तो थोड़ा रिलीफ था लेकिन खुद को बाहर निकालना, खुद को तराशना अभी बाकी था। खुद को बनाने के काम चल रहा था। उसके बाद मैं फिर 2012 में मेरा एक भाई गुजर गया। वह बहुत क्लोज था, मेरे बड़े, मँझले भाई मुझे बहुत मारते थे जब मैं लड़कियों के कपड़े पहनूँ या उनके साथ खेलूँ। मैं जब मार खाकर कमरे में सो जाती थी, तो यही मुझे बाहर निकालता था, खाना खिलाता था, बड़े मँझले भाई पर चिल्लाता था कि तू ऐसा क्यों करता है, उसका गुजर जाना बहुत बड़ा लॉस था। मम्मी के जाने के बाद वह बहुत क्लोज था। फिर उसके बाद जो एक बच गया था वह पागल हो गया। लास्ट स्टेज में बहुत ज्यादा पीने के कारण। मैंने देखा है कि शराब इतना ज्यादा दिमाग पर चढ़ जाता है। उसके बाद मैं बाहर जाने लगी, काम सीखने लगी। दिल्ली हम लोग गए। उसके बाद सबसे पहले 2011 में एक थर्डजेंडर लीडरशिप प्रोग्राम था ओएनजीसी के पास में, वहाँ बाहर से भी हमारी कम्युनिटी के बहुत सारे लोग आए थे। किन्नर अखाड़े के संस्थापक अजय विश्वनाथ आए हुए थे। उनका ही प्लान था कि आप लोग हमारे साथ चलिए, आश्रम देखिए, हमें अखाड़ा बनाना है। हम लोग 2015 में गए थे। तब यासमीन को इंदौर मिला था। हम लोग लिंक भी करा रहे थे। जैसे कोई इलेक्शन के लिए खड़ा हुआ तो उसके लिए कैम्पेनिंग करना है, कहीं कोई अवार्ड दे रहे हैं तो वहाँ पर कम्युनिटी को लिंक करना है। कुछ भी कार्यक्रम चाहे छोटा–सा ही हो, वहाँ पर जाने के मिले और दो मिनट बोलने को मिले, जाने के मिले दो मिनट बोलने को मिले। इस प्रकार कम्युनिटी को तैयार करना, कम्युनिटी के बाहर का एन्वायरमेंट तैयार करना। साथ–ही–साथ सरकार और मीडिया के साथ भी बातचीत हम कर ही रहे थे। वहाँ पर कमिश्नर थे, कलेक्टर, एससपी, मंत्रियों, सांसदों;सबको ज्ञापन देना, मीडिया में आना,अपनी कहानी बताना; यह सब जोर–शोर से चल रहा था। यह सब सन् 2009,10,11 में था। उसके बाद लीडरशिप ट्रेनिंग हुआ। एक आउटर पर था। होटल बहुत बड़ा। काफी लोग कम्युनिटी के एक साथ थे। हमने काफी टाइम एक साथ व्यतीत किया। अब तक जो मैं ज़िन्दगी एक लड़के के रूप में जी रही थी, अब एक थर्ड जेंडर के रूप में मैं डील कर रही थी सोसायटी को और कम्युनिटी को। मुझे अच्छा भी लग रहा था और मैं उसी रंग में रंग भी रही थी। और लेकिन यह तो शुरुआत थी। रेजीडेंशियल ट्रेनिंग कम्प्लीट हुआ। उसके बाद प्लान किया थर्ड जेण्डर स्पोर्ट्स मीट 2012 में। लीडरशिप ट्रेनिंग 30 या 40 डेज का हुआ। जब हम ट्रेनिंग कर रहे थे तो एक मित्रा ट्रस्ट था दिल्ली में, वहाँ गए थे। इसी तरह किन्नर भारती दिल्ली में था, वहाँ भी गए। आगरा गए और भी अलग–अलग जगह पर गए जहाँ पर हमारी कम्युनिटी को काम करते हुए देखे, यूनाइटेड रूप में काम करते हुए देखे। यह बहुत अच्छा रहा हमारे लिए। उस समय मैं, रवि तिवारी, शरण गंगोटे, रोशनी कश्यप, रानी सेठी, आशीष विश्वकर्मा और नन्दिनी नायक, सोनू हम लोगों की एक टीम थी। उसके बाद शरण के साथ काफी लम्बे समय तक काम किया। उसके घर का माहौल उसके लिए उतना पाजिटिव नहीं रहा। वह जनरली कई बार नेगेटिव हो जाता था। उसे हम लोग सही तरह से डील नहीं कर पाए। उसके बाद में, हमारे साथ एक नई साथी जुड़ीं यासमीन लाल। उनके साथ मैंने तीन–चार साल काम किया। उनके साथ एचआईवी का इन्फार्मेशन देना, एचआईवी टेस्टिंग करवाना, कंडोम बँटवाना, उसके बाद उनको अलग–अलग लोकेशन्स पर जहाँ–जहाँ सेमीनार हो वहाँ इन्ट्रोड्यूज करवाना, राशन कार्ड बनवाना, लेबर कार्ड बनवाना। लेबर कार्ड बनाने का हमारा काम 2011 में शुरू हुआ। 2011 में हमने बहुत सारे लोगों का लेबर कार्ड बनवाया, फिर उसी समय हमने बहुत सारे लोगों का एकाउंट खुलवाया। अब हम थोड़ा–थोड़ा सिस्टम को समझने लगे। अब हम डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के अध्यक्ष से मिलने लगे। उनको सेन्सटाइज करने लगे। इसी बीच स्पोर्ट का आयोजन हुआ। हमारे साथ एक टीम काम कर रही थी जिसका नाम है ‘राइट टर्न करके’। यह राइट टर्न गवर्मेंट के साथ मिला और हम लोगों ने आठ स्टेट के साथ मिलकर थर्ड जेण्डर स्पोर्ट्स मीट कराया। उसमें हमारी आइडियल गुरु रहीं सिल्वेस्टर मर्चेंट, जिन्होंने यह बीज लगाया था वह पौधा अब बड़ा हो गया, वो आई थीं। लक्ष्मी जी उसी समय बिग बास से बाहर आई थीं। वह आई थीं। सीता देवी, रुद्राणी ये सारे जो नेशनल एक्टिविस्ट हैं वो सारे लोग आए थे। उन सबके हवाई टिकट, होटल जितना बड़ा अरेंजमेंट था हमारे यहाँ के साँसद भी आए हुए थे, विधायक भी, मेयर भी आए हुए थे। हमने कम्युनिटी के साथ में मार्च पास्ट किया। इसके बाद जब बात लेबर कार्ड पर आई तो यह था कि आप सिलाई मशीन ले सकती हैं या उतना पैसा ले सकती हैं। उन सब लोगों का एकाउंट खुलवाना। बैंक के लोगों को सेन्सटाइज कराना कि कम्युनिटी के पास कुछ भी नहीं है, फिर पता चला कि इनका वोटर आई डी कार्ड भी नहीं है। वोटर आई डी वाले को सेंससाटज करना। फिर उनका वोटर आई डी कार्ड बना, उसके बाद उनका एकाउंट खुला। उसमें हमने मितवा का लेटर चलाया। हमने लिखकर दिया कि हम जानते हैं इन सबको। फिर हमने कहा कि इनके पास हजार–पाँच सौ नहीं हैं तो फिर 100 रुपये में उनका एकाउंट खुला। लेबर कार्ड बने। उनको पैसा मिला किसी को पाँच–पाँच हजार, किसी को दो–दो हजार और तभी से एक सपना था कि लोग बताते थे कि उनके पास घर नहीं है। मकान मालिक मना करते हैं, घर नहीं देते हैं, किराया नहीं दे पाते हैं, कभी गाँव भाग जाते हैं, कभी बीमार हो जाते हैं, कोई काम नहीं है, मैं माँगने जाती हूँ। फिर पता चला कि किसी को एच आई वी के बारे में पता चला और उसने सुसाइड कर लिया, किसी का ब्रेकअप हो गया, उसने सुसाइड कर लिया। इसी प्रकार जब आई डी के लिए कोई चैक करने गया तो उसका सिर कुचल दिया। मोबाइल छीन लिया। पर्स छीन लिया। यह सब इतना था कि मैं सोचती थी कि मुझे रुकना नहीं है, कुछ करना है। फिर मेरे जीवन में भी इतनी कठिनाई रही। अब मेरा एक ही भाई था। वह मुझे मना करता था कि तुम फलाने के साथ मत रहो, ढिकाने के साथ मत रहो, गाँव को लोग सुनाते हैं कि तू फलाने लोगों के लिए काम करता है। हम लोगों से लोग ठीक से बात नहीं करते हैं। हम लोगों को बहुत शरम आती है। एक ही भाई बचा था वह भी ऐसी बातें सुनाता था तो मुझे बहुत बुरा लगता था और उसके बाद मैंने उन्हें एक फोर व्हीलर दिला दिया था किस्तों पर। वो गाड़ी खूब शराब पीकर चलाते थे और एक्सीडेंट कर देते थे। कभी नदी में घुसा दिया कभी पुलिया में। मैं जाती थी उसे निकलवाती थी। दूसरा भाई भी उस समय जीवित था उसका भी डायलिसिस करवाती थी। उसको हास्पिटलाइज्ड करना। वह गाँव में ही था तब खत्म हो गया। मैं शहर में थी उस समय। फिर यह वाला भाई भी ऐसे ही करने लगा उसको भी लाती थी, हास्पिटल में एडमिट करवाती थी। फिर मैं काम भी करती थी। सब ऐसा ही चल रहा था फिर उसके बाद 2014 में मेरी एक सहेली थी सोनू राव, उसको इलेक्शन लड़ने के लिए हमने मोटिवेट किया। इससे पहले हम पूजा का कैम्पेनिंग कर चुके थे। इससे पहले एक संध्या नामक की ट्रांस जेंडर है मध्यप्रदेश में उसका भी कम्पेनिंग कर चुके थे। मैं, बीना, रवीना हम लोग शहडोल गए थे और उसमें पाली गाँव में उसका नगर पालिका अध्यक्ष के लिए कम्पेनिंग किया था। सोनू राव के लिए हम लोग कोरिया सिला गये, अम्बिकापुर की तरफ और उसके लिए कम्पेनिंग किया। पहली बार बीना ने मुझे साड़ी पहनाई। इससे पहले मैं जब स्कूल में थी तो डांस–वगैरह करती थी लेकिन बहुत मार पड़ती थी। लेकिन मन कर रहा था कि पहनूँ न पहनूँ। शरीर पर बहुत बाल थे, सिर पर बाल कम थे। घर वाले क्या बोलेंगे? क्या काम करता है। लेकिन मैंने सारी बातें छोड़कर मैंने साड़ी पहनी और बाहर आकर कम्पेनिंग की तो मेरा कान्फिडेंस बहुत अच्छे से आया क्योंकि मैं अपनी बाडी लैंग्वेज और अपनी आत्मा के कारण साड़ी पहनी थी। मेरे अन्दर एक प्रकार की शक्ति आ गयी। मुझे एक्चुअल में यही लगता था कि यही होना था। उसके बाद हम यहाँ आए रायपुर और मुझे लगा कि रायपुर में भी मैं ऐसी ही रहूँ। कुछ दिन तो मैं मुँह बाँध कर निकलती थी। कुछ दिन के बाद मैं चेहरा खोलकर चलने लगी। जब चेहरा खोलकर चलने लगी तो फिर सब लोग जानते थे कि विद्या ही है जो साड़ी पहनती है, विकास ही है जो साड़ी पहनता है। उसके बाद धीरे–धीरे मैं रवीना से जो मेरे साथ एक–डेढ़ साल तक रही थी वह हमेशा मेकअप करती थी, मेकअप करना सीख गयी। उसके बाद मैं साड़ी बाँधना सीख गयी। फिर मैं चोटी करना सीख गयी। उसके बाद मैं हारमोन्स थेरेपी ली। उसके बाद हमारे यहाँ 2012 में एक हिजड़ा जनसभा की थी, उसमें बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा इन सारे जगहों को ट्रांसजेंडर आए थे और यह आर्टिकल 39 और यूएनबीपी का एक प्रस्ताव था जिसमें बताया गया था कि हमारी कम्युनिटी के क्या इश्यू हैं, क्या डिमांड हैं, इसकी पेटिशन दायर करने को लीड किया। उसे लीड करने के बाद 2014 में एक वर्कशाप हुआ था। 377 का जजमेंट जिन्होंने दिया था वो जज आए थे गेस्ट बनकर। उस कार्यक्रम में रवीना की स्पीच बहुत सक्सेस फुल हुई। उसके बाद हम लोग अच्छे स्पीकर और अच्छे काम करने वाले लोगों के रूप में बाहर निकले और पहली बार हमें हवाई जहाज में बैठने का मौका मिला था। इतना सारा काम करने का और इतना देखने–समझने का मौका मिला। उससे पहले हमने कुछ देखा नहीं था। बड़े–बड़े होटल, विदेशी लोग जो लोग हमारे पड़ोसी थे, सब नया–नया था, यह सब देखा। यह सब जीवन में नया–नया था। हमें लगा कि हम अच्छा काम कर रहे हैं तो अच्छा उड़ान भी भर रहे हैं। हमारी लाइफ में बहुत उतार–चढ़ाव हैं। हम कभी क्लब में रहेंगे तो कभी हमें कई–कई किलोमीटर पैदल भी जाना होगा। यही लाइफ है। वैसे यह लाइफ बहुत इन्ट्रस्टिंग है। इन सारी चीज़ें करने के बाद एवरीडे जो पेमेंट होता था वह था सेल्फ सेटिस्फेक्शन। यह इतना अच्छा रहता था कि इससे बड़ी खुशी कोई नहीं हो सकती। हमें किसी ने नहीं समझा। ज्यादातर लोग यही कहते थे कि तुम नकारा हो, तुम किसी काम के नहीं हो। हमें अपशब्द कहते थे हमारे जेंडर को लेकर छींटाकशी आदि सारी चीज़ें किया करते थे। लेकिन जब हम कुछ कर पा रहे हैं और हम बहुत कुछ कर पा रहे हैं और हमारे प्लान हैं इससे हमें बहुत सेटिस्फेक्शन मिल रहा था। फिर उसके बाद 2014 में मुम्बई में किन्नरों का एक कल्चरल प्रोग्राम होना था, हम लोग टीम लेकर गये थे। वहाँ से आ ही रहे थे तो हमने नालसा जजमेंट के बारे में सुना तो हम बहुत खुश हो गये। हम सरकार से बात कर ही रहे थे। हम लोग जिस आईएएस से मिलने गये बिफोर नालसा जजमेंट तो पहले जब हम जाते थे जिस आईएएस से मिलने तो हम लोगों के जेंडर को लेकर बहुत कुछ कहा क्योंकि हम लोग साड़ी पहनकर जाते थे। उन्होंने हम लोगों को इतनी बातें सुनाई पूरा पोस्टमार्टम कर दिया हमारा, तो हम लोग कमरे से बाहर निकल आए। फिर हमने एक कालेज केटीओ में एक वर्कशाप कराया जिसमें उसी को गेस्ट के रूप में बुलाया। जो मुझ पर हँसा था उसके बराबर में बैठी मैं। इस तरह का परिवर्तन जीवन में आया। सरकार के साथ काम करना इतना आसान नहीं था क्योंकि मंत्रालय चेंज हो गये थे। किससे क्या बात करनी है, इतने सारे लोग कौन सेक्रेटरी, कौन ज्वाइंट सेक्रेटरी, कौन डायरेक्टर आदि कुछ भी नहीं पता था लेकिन अच्छी बात थी कि रवीना साथ में थी वह काम करती थी। उसे सारा नालेज था। वह सहायक संपादक थी हरिभूमि की तो उसे बहुत सारा नालेज था। अच्छा लगा कि किसी को लेटर लिखना है, एप्लीकेशन लिखना है, लोगों को सेंसिटाइज करना है, एवरीडे यह काम करना होता। कोई पेमेंट नहीं, कोई पैसा नहीं, उस काम को काम भी नहीं कहना क्योंकि वह हमारी ज़िन्दगी जीने का एक मकसद बन गया था। फिर हमारे यहाँ बोर्ड बना, वेलफेयर बोर्ड। हमसे कहा गया कि हम इस बोर्ड के अध्यक्ष आप लोगों को नहीं बना पाएँगे, आप केवल सदस्य ही रहेंगे। हमने कहा कि हमें तो बोर्ड से मतलब है, हम सदस्य रहें न रहें कोई फर्क नहीं पड़ता। अध्यक्ष बनाने के लिए नान कम्युनिटी के लोगों को बुलाया गया। बोर्ड बना, उसे डिपार्टमेंट से जोड़ा गया, हमारे पास डिपार्टमेंट से लैटर आने लगा, बोर्ड ने काम करना शुरू कर दिया। बोर्ड के पास पचास से साठ लाख का बजट है। बोर्ड वेलफेयर के लिए काम करता है, लोगों को जागरूक करने का काम करता है, कहानी किताबें, अन्तर्विभागीय समन्वय का काम करता है। बोर्ड में नौ आईएएस हैं। बोर्ड की मेम्बर समाज कल्याण विभाग और महिला बाल विभाग की मंत्राी हैं। मीटिंग होने लगी, प्रेजेंटेशन होने लगा डिपार्टमेंट हमारा डाटा लेने लगा। डिपार्टमेंट में भी हमारी चर्चा होने लगी। बोर्ड के बाद हमारा कास्ट कोच बना फिर हर जिले में समिति बनाई गयी। जिसमें कम्युनिटी को भी जोड़ा गया। फिर हमारा कार्ड बना जिसकी हमें परेशानी थी। उससे हमारा बर्थ सार्टिफिकेट बनता है, उससे निवास बनता है, उससे आधार में भी जेंडर चेंज हो जाता है फिर उत्तराधिकार भी बन जाता है।उसके बाद हमारा राशन कार्ड, लेबर कार्ड सब कुछ बनना आसान हो गया। इसके साथ हम लोगों ने नागरिक प्रशासन में दो से तीन साल काम किया। घरों और दुकानों में जाकर काम किया। फिर इसमें दो प्रतिशत रिजर्वेशन लाया गया। साथ ही साथ पर्यावरण विभाग, विकास प्राधिकरण में रिजर्वेशन लाया गया और इसके साथ लोगों को घर दिलाने लगे। आज की डेट में डेढ़ सौ से दो सौ लोगों को घर मिला हुआ है। उनके खुद के घर है। दुकान भी है जो कम्युनिटी को मिला हुआ है। दूसरा बड़ा काम हम पुलिस विभाग के साथ करने लगे। जिन लोगों का कोरोना पाजिटिव आया है वही हमें सबसे ज्यादा सपोर्ट किये हैं एडीजी हैं…. स्टेट लेवल का वर्कशाप उन्होंने करवाया। वह बहुत सेंसिटिव आईपीएस अधिकारी हैं, मैं प्रार्थना करती हूँ कि वे शीघ्र स्वस्थ हो जाएँ। वो नेशनल लेवल का वर्कशाप किया। थर्ड जेंडर कानून तो 2016 में आया लेकिन हमारे छत्तीसगढ़ में पहले ही कानून आ गया था। पुलिस विभाग में फिर पुलिस डिपार्टमेंट की ओर से हर जिले में एक वर्कशाप होने लगी। लोगों को सेन्सिटाइज करने लगे। उन्होंने अपना एक सिलेबस भी बनाया। लेकिन लोगों ने उसके विरोध में बात करनी शुरू कर दी, हमें सिलेबस नहीं चाहिए, लेकिन हम लोग भी छोड़ने वाले कहाँ थे। हम लोग लेखन विभाग में गए और वहाँ हमने कहा कि हर क्लास में जब तक टी फार ट्रांसजेंडर बच्चों को नहीं पता चलेगा तब तक जागरूकता नहीं आएगी। पेरेंट्स को चाहिए कि वे टी फार ट्रांसजेंडर बच्चों को बताएँ। इसमें हम कामयाब हुए। क्लास छठवीं से क्लास दसवीं में यह जुड़ भी गया। लेकिन आज के यूथ को यह पढ़ाना जरूरी है इसलिए एसएससी, बीएससी में ट्रांसजेंडर से रिलेटेड सवाल देने जरूरी हैं। हर साल स्पोर्ट्स से रिलेटिड, राजनीति से रिलेटेड प्रश्न पूछे जाते हैं और लोग इस विषय में पढ़ते हैं। ऐसे ही जब ट्रांस जेंडर्स के बारे में पढ़ेंगे, तो हमें खुद ब खुद सम्मान देंगे। जब किताब में और सिलेबस में आ जाएगा तो लोगों को पता चलेगा कि क्या पढ़ा है और क्या पढ़कर क्वालीफाई किया है। इससे इन्सान को उस विषय में उस जेंडर के लिए खुद ही रिस्पेक्ट आ जाता है। हम चाहें कितनी भी सत्यकथा लिखें लेकिन जो चीज़ सिलेबस में है, उसे पढ़कर इनसान ऑटोमैटिक पाॅजीटिव हो जाता है। उसके बाद जितने कालेज हैं उनमें हम लोग सेन्सेटाइजेशन वर्क करने लगे। इसकी शुरुआत हम लोगों ने महात्मा गाँधी विश्वविद्यालय वर्धा के जितेन्द्र सर के साथ की थी। उसके बाद पं. रविशंकर यूनिवर्सिटी और सभी कालेजों में कराने लगी। इसके लिए उच्च शिक्षा विभाग से सर्कुलर भी निकाला और स्कूली शिक्षा के लिए भी सर्कुलर निकाले गये। सीडीओ के साथ, डीओ के साथ मिलना, सारे प्रिसिंपल्स के साथ मिलना, सारे टीचर्स के साथ करना, कान्वेंट के साथ, प्राइवेट के साथ यह सारी चीज़ें मुझे समझ में आ रही थीं। मुझे पता था कि यदि टेक्निकल एजूकेशन से निकालना है तो सारे आईटीआई कवर होंगे, सारे पालीटेकनिक कवर होंगे। फिर आईटीआई, पालीटेक्निकल कालेज पहले रजिस्टर करना उनके साथ कोआर्डिनेट करना। अब हम लोग रुकेंगे नहीं, हमारे पास समय नहीं था। हम लगातार अपना काम कर रहे थे। हमें लगा कि अब हमें अपने काम को मिनिटाइज करके शासन को भेजना है। प्रोपोजल के रूप में फिर वहाँ से स्टेट डायरेक्टर को भेजना है। जो चीजें संभव हैं, जो चीजें बदलना जरूरी हैं चाहे एजूकेशन का हो, एडमिशन का हो, जाॅब का हो, वो चीजें हमें तोड़ना है, उन्हें बदलना है।

फाइनली हमने सारे डिपार्टमेंट्स के साथ में एक सेन्सेटाइजेशन वर्क किया। इससे हमारे अन्दर बहुत पाॅजिटिविटी आने लगी थी। मैं बचपन से ही ईश्वर को बहुत मानने लगी थी, मंदिरों पर जाना, अगरबत्ती दिखाना, फूल और थाली लेकर जाना इस पर घर में मार भी पड़ती थी कि तुम लड़कियों की तरह थाल लेकर क्यों जाते हो? कहते हैं हिन्दुओं में तैतीस करोड़ देवी–देवता हैं लेकिन मैं इतने सारे लाखों देवी–देवताओं से मिली जिसकी कोई हद नहीं और उन सारे लोगों ने मुझे आशीर्वाद दिया और हमारे समाज को कुछ–न–कुछ तोहफे दिए। लोकनिर्माण विभाग ने एक हफ्ते में थर्ड जेंडर टायलेट का शुभारंभ किया। रायपुर नगर निगम में भी निर्णय हुआ कि जितने भी पब्लिक टायलेट हों उसमें ट्रांसजेंडर के लिए भी एक टायलेट हो। कमिश्नर सर ने उस को फालोअप भी किया।ये वही थे जिन्होंने सीएम से मिलकर कहा था कि इन 17 लोगों को मकान और दिलाओ। उसके बाद सारे पार्षदों के साथ मीटिंग हुई उन्हें सेन्सेटाइज किया क्योंकि ग्राउंड लेवल पर जो लोग थे उनके लिए हमारा पार्षदों के साथ संपर्क करना अनिवार्य था। उन्हें कहा गया कि आप जाइए, उनके वोटर आई डी कार्ड बनाइए, राशन कार्ड बनाइए। इस तरह से हम काम करने लगे। इसके साथ इन सब कामों एससीआईटी में गये, वहाँ हमने अव्वल सचिव को बुलाया और दिन भर का वर्कशाप किया कि क्लास दस में सोशल साइंस में ट्रांसजेंडर हिस्ट्री, उनका मध्यकाल, आधुनिक काल सब पढ़ाया जाए। जब मैं प्रश्नपत्र देखती थी तो बहुत आश्चर्य होता था कि जिस पहचान के लिए मैं ज़िन्दगी भर तरसती रही तो जब कक्षा आठ में एक्जाम हुआ और उसमें प्रश्न था कि आप किन्हीं चार ऐसे व्यक्तियों के नाम बताइए जिन्होंने इस दिशा में काम किया है तो मेरी बहन मुझे सुबह आठ बजे फोन करके बताती थी कि मैंने तेरा नाम लिखाया है। यह मुझे वह तोहफा मिला कि जो मुझे पहले कहती थी कि तू ऐसा क्यों है, तू लड़कियों जैसा क्यों है, क्यों तेरी सहेलियाँ हैं, क्यों तू लड़कियों जैसा बोलता है, चलता है, कपड़े पहनता है, ठीक से बैठो, लड़कों जैसे रहो, वही आज मुझे फोन करके बता रही थी कि मैंने तेरा नाम लिखाया है। आप जैसा मेहनत करोगे वैसा आपको फल मिलेगा, आपके प्रयासों से ही चेंज आयेगा और कोई भी प्रयास कभी जाया नहीं जाता, एक–न–एक दिन सुखद परिणाम आता ही है। फिर पुलिस भर्ती का टाइम आया, तो मेरे दिमाग में आया कि मैं पुलिस बनूँगी तो कैसा लगेगा? वर्दी में दिखूँगी तो कैसा दिखूँगी? गाँव में जब पुलिस आती थी तो लोग साइलेंट हो जाते थे। जब मुझे लगा कि मैं पुलिस बनकर गाँव में जाऊँगी। मुझे लगा कि थर्ड जेण्डर कम्युनिटी में भी पुलिस का होना जरूरी है।काश हम पुलिस में भी थर्ड जेण्डर का काॅलम ले आएँ लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था और हर जिले में इस बात के लिए सेन्सेटाइजेशन किया। फिर पुलिस की भर्ती निकली जो लोग एससी लोग थे उनको ट्रेनिंग देते थे, एजूकेशन देते थे, कोचिंग देते थे। उसका अलग माहौल था। जहाँ ट्रांसजेंडर दौड़ने वाले थे वहाँ पर एससी लोगों ने दौड़कर बताया कि ऐसे दौड़ना। यह हिम्मत देखने के बाद उन लोगों की मेहनत भी बहुत थी। अप्रैल–मई के महीने में बच्चे सनडे को दोपहर 2 बजे दौड़ते थे। दिन में क्योंकि दौड़ कभी भी हो सकती थी। उन्हें रोकिए मत क्योंकि एक बार मौका मिला है तो इन सारी चीज़ों को न्यूयाॅर्क टाइम्स, डेली न्यूज आदि में भी स्थान मिला। रवीना का शुरू से यही रहता था कि हमें कुछ बड़ा करना है। पुस्तक का भी निर्माण हुआ। पुलिस की भर्ती हुई। लेकिन उसका परिणाम नहीं आया यह अलग बात है। लेकिन मैं आज भी प्रयास कर रही हूँ कि थर्डजेंडर को रिजर्वेशन मिले। उसके बाद तो बीएड कालेज के साथ हमारा घर जैसा रिलेशन बन गया। कोई कार्यक्रम कराना है बीएड कालेज, कोई वर्कशाप कराना है बीएड कालेज, मंत्राी को बुलाना है बीएड कालेज, बीएड कालेज में अलग से कार्यक्रम लिखा भी गया, जोड़ा भी गया, हर तरह के कार्यक्रम में वहाँ से कई स्टूडेंट्स केस स्टडी भी कर रहे हैं इस विषय में। जिन–जिन कालेजों में हमने वर्कशाप किया उनके कई सारे स्टूडेंट्स इस विषय पर स्टडी कर रहे हैं। जब हम प्रिंसिपल्स के साथ मिलकर बात करते तो वो प्रिंसिपल्स टीचर्स और बच्चों के साथ आईडेंटिफाई करने लगे, वो हमसे कहने लगे कि आप आइए और बच्चों के साथ मिलकर उन्हें चाइल्ड फ्रेंडली बनाइए। यदि किसी बच्चे की पसन्द उसके अपने जेंडर से डिफरेन्ट है तो उसके साथ डिसक्रिमिनेशन नहीं होना चाहिए। यह चीज़ हमने स्कूलों में भी शुरू किया। फिर हास्पिटल वाला मामला शुरू हुआ। गर्वेन्मेंट हास्पिटल में एक वार्ड शुरू किया। हम सब मंत्रालयों और विभागों के साथ में काम करने लग गये थे। हमें कई–कई लोगों से बात करके उन्हें सेन्सेटाइज करना पड़ता था। उसमें बजट नहीं था क्योंकि एक व्यक्ति पर लगभग दो–सवा–दो लाख रुपये का खर्च आना था और पूरी की पूरी कम्युनिटी थी। उसके लिए हैल्थ मिनिस्टर के पास जाना, आर्डर करवाना, फिर उसे इम्प्लीमेंट करवाना; यह सब बहुत बड़ा काम था। यह ऐसा था कि हम बिना हथियार के लड़ रहे हैं। हमारे पास यदि कोई हथियार था तो हमारा दुख, हमारा नाॅलेज। नाॅलेज का पावर हम लोगों के पास था और कभी न रुकने वाला जीवन। उसके बाद मिस इंडिया का कान्टेस्ट हुआ तो उसमें मैं सबसे सुन्दर हूँ यह दिखाना भी तो है। मैं नेशनल तक पहुँची, बहुत अच्छी बात रही लेकिन मैं अपना पूजा–पाठ करने जाना आगे काॅन्टीन्यू नहीं कर पाई क्योंकि मैं थी एक ट्रांसवूमेन और मैं एक रिलेशनशिप में आ गयी और फिर हमने लक्ष्मी जी को इन्वाल्व किया। इस तरह से किन्नर अखाड़ा का जन्म हुआ। लोग भारतवर्ष में किन्नर अखाड़ा को देखने और समझने के लिए आते हें। एक तरह से धर्म के क्षेत्र में काम करने के लिए और आस्था को बनाने के लिए किन्नर अखाड़ा बहुत जरूरी है। जैसे नालसा का जजमेंट जरूरी था, जैसे थर्ड जेंडर कानून जरूरी था और बाकी की सारी चीज़ें जरूरी थीं, ठीक उसी प्रकार यह भी बहुत जरूरी था। बहुत सारे काम हैं जो मैं बता नहीं पाई। हर डिपार्टमेंट से कुछ न कुछ मिला ही है। उन्होंने हमें कभी खाली नहीं भेजा और हमें पता है कि यदि कोई एससी–एसटी का डिपार्टमेंट है तो उधर भी एक टायलेट होना है तो उसके लिए भी हमने वहाँ इन्वायरमेंट तैयार किया क्योंकि पहले एक इन्वायरमेंट तैयार करना चाहिए कि लोग फ्रेंडली हो जाएँ। जरूरतमंदों को लोन प्रोवाइड करवाया। टीम देखकर ही लोगों ने महिलाओं के साथ ट्रांसजेंडर को जोड़ा। एक लाख रुपये तक का लोन देने लग गए। उसके बाद हमें लगा कि अब शादी भी तो करनी है कि दिल्ली तक को पता चले तो हमने पन्द्रह जोड़ी लोगों को ढूँढ़ा और एक प्रोड्यूसर थे जिन्हें अपनी फिल्म का प्रमोशन करना था, उनका प्रोजेक्ट भी ट्रांसजेंडर ही था। फिर उन पन्द्रह लोगों की शादी हुई। उस शादी में हमारे सीएम, हमारे गृहमंत्री, गणमान्य लोग वर्धा- महाराष्ट्र तक से यहाँ घराती–बराती बनकर आए थे। देखने लायक था दुनिया की वह पहली ऐसी शादी थी जहाँ पन्द्रह लड़के पन्द्रह राजकुमारियों के लिए घोड़े पर चढ़कर आए थे। यह मेरा बचपन का सपना था, जो सपना मैंने अपने लिए देखा था। मुझे पता था कि कई चीज़ों में मैं नहीं जा पाऊँगी। मैं नहीं कर पाऊँगी शादी तो क्या हुआ मैंने पन्द्रह दुल्हन तो तैयार की। यह ऐसा था कि मैं नहीं कर पाई कई लोगों ने चलते। वक्त मुझे कहा भी था लेकिन मैं उनको दिखा दूँगी कि थर्ड जेंडर स्पोर्ट्स मीट भी होता है। यही सारी चीज़ें जो हमने छत्तीसगढ़ में कीं, पुलिस के साथ मिलकर कीं, उन्हें मैंने गृहमंत्रालय में भी एप्लाई किया। गृह मंत्रालय ने लिखित में दे दिया कि यह स्टेट पुलिस का मामला है इसे स्टेट पुलिस अधिनियम में देखिएगा। फिर मैंने प्राइममिनिस्टर आफिस में लैटर लिखा। प्राइम मिनिस्टर आफिस ने सोशल डिस्ट्रिक को लिखा, सोशल डिस्ट्रिक ने एनआईएसडी को, एनआईएसडी ने होम मिनिस्ट्री को लैटर लिखा। इस तरह से वापस होम मिनिस्ट्री को होम मिनिस्ट्री ने अपने सेंट्रल फोर्सेस को लिखा कि थर्ड जेंडर के लिए हम पुलिस फोर्स में ले सकते हैं। इसके बाद एजूकेशन और स्कूली शिक्षा के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय में भी बातचीत की। शिक्षा भवन जब मैं पहले वहाँ गयी थी तो मुझे तीन घंटे तक कहा गया कि आपको जिससे मिलना है उससे फोन पर बात कीजिए। मैं तीन घंटे तक सारे लोगों को फोन घुमाती रही लेकिन किसी ने नहीं बोला कि आप ऊपर आ जाओ। वहाँ रिसेप्शन पर जो लोग थे उन्होंने कहा कि हम अपनी गारंटी पर आपको अन्दर भेज देते हैं। अन्दर मैं गयी तो शाम को सात बजे शास्त्री भवन से वापस आई। सुबह दस बजे घर से निकली थी और साढ़े आठ नौ बजे वापस आ रही थी मैट्रो से। मैट्रो का भी मेरा नया एक्सपीरिएंस था मुझे पता नहीं था कि कहाँ उतरते हैं, कहाँ बैठते हैं, किधर जाते हैं, कहाँ चढ़ना है, कहाँ उतरना है। रायपुर से बिल्कुल अलग है दिल्ली लेकिन मुझे पता था कि भगवान मिलेंगे यहीं, वह इसी दुनिया में हैं और मैं भगवानों से मिलने चली गयी लेकिन भगवान का दर्शन इतना आसान नहीं होता। शास्त्री भवन के गेट पर ही तीन घंटा रुक गयी। फाइनली कुछ लोगों की वजह से मैं भगवानों से मिली और जब मैं सात बजे लौटी तो 12 कमीशन बनाकर आई थी। दुबारा कभी मुझे शास्त्री भवन में नहीं रुकना पड़ा, वहाँ मानव संसाधन विकास, डब्ल्यू सी डी, स्पोर्ट्स मिनिट्री सारे लोग थे। सारे लोगों से मिलने जाती थी। कभी मंत्री नहीं मिले राज्य मंत्री मिले, कहीं राज्यमंत्री नहीं मिले तो पीए मिले, पीए नहीं मिले सचिव मिले, कहीं सचिव नहीं मिले तो ज्वाइंट सेक्रेटरी मिले इस तरह कभी लेटर लिखकर गयी। फिर मैं पीएम के हाउस तक गयी वह नहीं मिले तो पीएमओ आफिस गयी तो वहाँ भी लैटर इसके बाद प्रेसीडेंट सेक्रेटरी तक गयी क्योंकि मेरे अन्दर वह ज़िद वह जुनून था कि हम लोगों ने छत्तीसगढ़ में जो कुछ काम किया था उसके बारे में जानकारी दें। मैं जो कुछ भी लैटर लिखती थी वह रवीना के पास जाती थी। रवीना एनआईएसडी में कमेटी मेम्बर है। वह क्लचर हेड के पास ही जाता है फिर कल्चर हेड उसे डायरेक्टर को लिखते हैं। डायरेक्टर से सेक्रेटरी से होकर फिर वह प्राइम मिनिस्टर के पास जाता है। इस कोरोना में हमने लोगों को राशन दिया। लोग यह कहते थे कि तूने इतने सालों में क्या किया तेरे पास अपना घर भी नहीं है, 1500 रु. में रहती है। एक दस साल पुराना तख्त है उसी पर सोती है, लेकिन कोविड-19 में सारे लोग अपने घर में लाॅक डाउन थे तो मैंने कुछ लोगों को मेल लिखा तो पूरे छत्तीसगढ़ के लोगों को हजार–हजार पैकेट दिया होगा। जिनके लिए मैंने दो–चार मीटिंग अटेंड किया था उन लोगों ने भी मदद किया। फिर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में एक वर्कशाप किया था, उन लोगों ने फाइनेन्सियल सपोर्ट भी किया और राशन भी दिया। मैं आज भी मानव विकास संसाधन, स्पोर्ट्स मीट के लिए साईं के डायरेक्टर, जिन्होंने खेलो इंडिया के डिप्टी डायरेक्टर को लिखा; उन सभी को फालोअप करती हूँ। इन सबके बीच 2015 में मैं रिलेशनशिप में थी तो एक लड़के से मेरा बहुत अटेचमैंट था वह बहुत अच्छे थे। बहुत अच्छे से बातचीत करते थे। उसी समय में मेरा सेक्सुअल आपरेशन हुआ था। उसमें सरकार ने बहुत सपोर्ट किया। वह चैरिटेबल हास्टिपटल था उसमें हमने आपरेशन करवाया और उसके बाद हमें बहुत अच्छा लगा। अभी भी कुछ–कुछ आपरेशन बाकी है। मैं अपना वाइप थेरेपी, वाइप आपरेशन करना चाहती हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि ज़िन्दगी मुझे कल ही मिली है। जैसे कि मेरा पुनर्जन्म हुआ वह 2009-10 में हुआ। मुझे लगता है कि मैं अभी बहुत छोटी हूँ क्योंकि मुझे बहुत सारे काम करने हैं शायद यह जन्म कम पड़ जाएगा। ज़िन्दगी जीने में और काम करने में। काम इन अर्थों में कि बहुत कुछ इम्प्रूवमेंट करना बाकी है, बहुत कुछ इक्वालिटी बाकी है क्योंकि जब तक रिजर्वेशन लेकर नहीं आएँगे तब तक कम्युनिटी को हैंड होल्डिंग सपोर्ट नहीं मिलेगा। वो मेरा ड्रीम है। मुझे मेरी कम्युनिटी के लिए रिजर्वेशन चाहिए। जब तक कम्युनिटी का बंदा या बंदी कालेज में नहीं पढे़गा या नहीं पढ़ाएगी, किसी भी आफिस में काम करेगी, उसका जो ड्रीम होगा उसे पूरा नहीं कर पाएगा, जब तक पाजिटिव विजुएलाइजेशन नहीं होगा, मैं लोगों को कितना भी सेन्सेटाइज करूँ लेकिन मैं जब उनके साथ आठ घंटा काम करूँगी तभी उनके मन में मेरे प्रति आटोमेटिक रेस्पेक्ट बनेगा। अभी कुछ सालों के बाद वह ब्रेकअप इसलिए क्योंकि उनका रिलेशन किसी और के साथ जुड़ गया था। मैंने उनसे कहा कि मैं समाज के सामने आपके साथ नहीं आ सकती आपके लिए। लेकिन मैं दिल में हूँ यह पता चलना चाहिए। तीन साल साथ में जीने के बाद आप किसी और के साथ जिएँ और फिर किसी और के साथ रहें, इस बात से हम दोनों का ब्रेकअप हुआ लेकिन वह अब भी मुझसे बात करते हैं उनके भाई के साथ भी मैं बातचीत करती हूँ। उसने शादी भी कर लिया था। जिस लड़की से उसका अफेयर था उसे और उसके मम्मी–पापा से मैं आज भी मिलती हूँ लेकिन पहले जैसा नहीं है सबकुछ। आगे भी मैं चाहती हूँ कि मैं शादी करूँ और पिछले एक–दो हफ्ते पहले भी मैंने अपने ग्रुप में मैसेज किया कि मैं एक ट्रांसजेंडर साथी के साथ अपनी ज़िन्दगी बिताना चाहती हूँ, लोगों के फोन भी आए हैं और ईमेल भी आए हैं। मैं यह प्रयास कर रही हूँ कि हमारे विचार मैच करते हैं या हमारी अच्छी बनती है तो आगे जाकर मैं शादी कर लूँगी।
जनरली सेक्स से सम्बंधी, लोग यही समझते हैं कि हमारा इन्टरनल पार्ट और वह सही है जो इनटरनल पार्ट जैसा महिलाओं में रहता है और पुरुषों में रहता है परंतु यह तीसरा कैटेगरी होता है इन्टरसेक्स। जिसका इंटरनल पार्ट स्पष्ट नहीं होता या फिर उनका विकास नहीं होता। उसको इन्टरसेक्स पर्सन कहा जाता है। इन्टरसेक्स पर्सन को कई लोग किन्नर कहकर ही ट्रीट करते हैं कि किन्नर है ये। तो उसके बाद यह होता है कि इन्टरसेक्स को ही लोग किन्नर समझते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कोई बच्ची है जिसका वेजाइना समझ में आ रहा है लेकिन पता चल रहा है वह तो क्लास 9-10 में गई तो उसके धीरे–धीरे दाढ़ी आने लगी, वेजाइना डेवलेप नहीं हुआ वहाँ से पेनिस डेवेलप हो रहा है तो ऐसा भी इन्टरसेक्स पर्सन है। अब उसके घर वालों को कुछ और समझ में आता है कि यह हो क्या रहा है। एक्चुअल में उनमें एक प्रकार का हार्मोनल इम्बैलैंस है, उसमें और किन्नरता का, ट्रांसजेंडर का कोई सम्बन्ध नहीं है। उसमें कुछ भी चीजें हो सकती हैं, इंटरनल पार्ट कुछ भी हो सकता है, उस सिचुएशन पर कुछ भी अवस्था हो सकती है। ये तीनों चीजें हो स्पष्ट गईं, मेल–फीमेल और इन्टरसेक्स। अब यह तो आपको पता ही है कि सेक्स से सम्बन्ध क्या है यह सिर्फ प्लेजर का माध्यम है। लोग सिर्फ एन्ज्वाय करते हैं। या प्रजनन करते हैं, वंश बढ़ाते हैं। अब हम बात करते हैं होमोसेक्सुअल, बाई सेक्सुअल और असेक्सुअल, मैं समझाने की कोशिश कर रही हूँ कि कोई महिला का किसी महिला के साथ भावनात्मक तथा यौनिक सम्बन्ध भी हो तो वह एफ टू एफ हो गया लेस्बियन, वह समलैंगिक है, अब मेल टू मेल हो गया वह भी दोनों समलैंगिक कहलाए, अब ट्रांसजेंडर टू ट्रांसजेंडर भी हो गया। ग्राउंड पर यह विचारधारा है कि जो फेमिनाइन मेल होते हैं वो लोग ही ‘गे’ होते हैं लेकिन ये सिर्फ वे लोग हैं जो विजुअलाइज हैं, लेकिन हमारी दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो सेम सेक्स होने के बाद सेम सेक्स की तरफ एट्रेक्ट हैं। उनका यौन रुझान है, तो यह चीज़ है कि 377 हो गया तो ‘गे’ लोग को फायदा हो गया केवल।नहीं, 377 से उन सारे लोगों को रिलीफ मिला जहाँ महिला, पुरुष, ट्रांसजेंडर इस श्रेणी में आते हैं। जिनकी पसन्द समलैंगिकता की ओर थी। इसके साथ–साथ कुछ ऐसे भी लोग भी होते हैं जो तीनों के साथ में सेक्सुअल रिलेशन डवलप करते हैं, एमएफएंडटी। इसको ट्राइसेक्सुअल बोलते हैं। उसका हिन्दी नाम मुझे नहीं पता। फिर एक ऐसा भी परसन होता है जिसे इन तीनों के साथ इंट्रेस्ट नहीं होता, उसको असेक्सुअल बोलते हैं, उसके बाद एक ऐसा भी इनसान होता है जिसका इन्ट्रेस्ट विपरीत लिंग की तरफ होता है ऐसे लोगों को हेट्रो बोलते हैं, विषम लैंगिक।
सेक्स और जेंडर में मैं यह बताना चाहती हूँ कि ट्रांस जेंडर से हमारा आशय साइकोलाजिकल जेंडर से है न कि हमारा सेक्सुअल जेंडर से। जेंडर में मतलब जो एक सोशल आइडेंटिटी है, सामाजिक रूप से जो हम स्वयं को अभिव्यक्त कर रहे हैं वह हमारा जेंडर है। सोशल एक्प्रेशन ही हमारा जेंडर कहलाता है। हम लोग जेंडर में बात करें तो जैसे कि मेल–फीमेल और ट्रांसजेंडर। अभी सेक्स में तीन हैं एम एफ और इन्टरसेक्स यानी की मेल, फीमेल और ट्रांस जेंडर, भारतीय समाज के अनुसार। हमारे यहाँ क्या हुआ यह जो थर्ड जेंडर है, पहले तो दोनों मेल और फीमेल हैं वह दो जेंडर हो गये यानी कि उनके जेंडर रोल हैं। जेंडर रोल यानी कि किसी पुरुष के बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक की उस संस्कृति और उस कल्चर में और उस क्षेत्र का, उस परिवार का, उस खानदान का यह सारा कुछ तय रहता है। जैसे कि क्या पहनना है, किसकी उपासना करनी है, जैसे कि हम बात करें किसी भी धर्म की, हिन्दुओं की ही बात करें तो किसी घर में कोई खत्म होता है तो जेन्ट्स ही केवल श्मशान घाट तक जाते हैं कछ होगा तो जेंट्स ही केवल बाल देंगे।कबड्डी–फुटबाल–क्रिकेट खेलना है तो लड़के ही खेलेंगे। पैंट–शर्ट पहनेंगे तो लड़के ही पहनेंगे। लड़िकयों के लिए चीजें उनके खेल–खिलौने कई ऐसे काम हैं कि मेंहदी लगाने का ही काम है। कोई महिला यदि महीने में एक–दो बार मेंहदी लगाती है तो कोई आब्जेक्शन नहीं करेंगे लेकिन कोई पुरुष यदि मेंहदी लगा ले तो या कोई जेंट्स मेंहदी लगाकर आफिस चला जाएगा, नेल्स बढ़ा ले तो हर कोई उस पर आब्जेक्शन करेंगे। तो यह जो खेल–खिलौने, कपड़े रीति–रिवाज सोसायटी ने तय किया हुआ है। यही जेंडर है, जेंडर एक्प्रेशन है, उनका जेंडर रोल है।
अब आते हैं ट्रांस जेंडर पर, ट्रांस जेंडर वह पर्सन है जिसका जेंडर एक्प्रेशन उसका बायलाजिकल जेंडर से अलग है। जैसे कि बाइ बर्थ व्यक्ति मेल हो और जेंडर एक्प्रेशन, रहन–सहन, पसंद–नापसंद, ज़िन्दगी जीने का तरीका फीमेल की तरह हो और यदि फीमेल है व उसकी अभिव्यक्ति मेल के समान हो तो वह भी ट्रांसजेंडर होगी। अब इसमें कुछ ट्रांसजेंडर होते हैं जो बायलाजिकली फीमेल हैं, वह ट्रांसमेन कहलाएँगे, फिर हम लोग ट्रांसवुमेन हैं। फिर यदि हम गुरु–चेला परम्परा में चले जाएँ, गुरु बना लें तो वह हिजड़ा कल्चर कहलाता है। उसमें घराना चलता है। घराना यानी शुरुआत में एक दल तैयार होता है, एक समूह तैयार होता है, समूह में रहने के क्या नियम होंगे, समूह में सदस्य कैसे बनाएँगे। उनका व्यवसाय क्या होगा। यह सब गुरु–चेला परम्परा में आया करता है। शुरुआत में क्या हुआ कि कुछ लोग नागपुर में रह गये तो झारीबरार घराना बोलते हैं, पठारी भाग के जितने भी घराने हैं उन्हें झारीबरार घराना बोला जाता है। उड़ीसा से लेकर जमशेदपुर, छत्तीसगढ़ से लेकर यह जो क्षेत्र है उसे झारीबरार घराना बोलते हैं। मुंबई की तरफ रहने वाले हैं उनको लस्टर बोलते हैं। पहला नाम यह हुआ यानी एक समूह बना, समूह का नाम हुआ फिर चाहे उसे किन्नर के नाम से जाने या किसी और के नाम से जाने शुरुआत के तौर पर, फिर वहाँ इसमें से आठ–दस लोग अलग–अलग चले गए उसमें से किसी एक का नाम मान लीजिए लस्टर था तो उससे पूछा कहाँ के हो तो लस्टर से आई हैं। इसी प्रकार दूसरा बोले कि झारीबरार से तो झारीबरार नाम का कोई हिजड़ा जो पूरा एरिया देखता था उसके नाम से वह घराना चला। अब इस घराने के हम नीचे आते हैं तो वह दहियार बनता है। अब छोटा–छोटा ग्रुप बन गया। एक–एक शहर में अलग–अलग दहियार बन गया। उस दहियार में एक चेला बनता है। अब इसमें यह होता है बड़े घर वाले कौन हैं, हमारे यहाँ बताते हैं कि इसमें दो छोटे और बड़े होते हैं। बड़े घर वाले और छोटे घर वाले इन्हें भी दहियार ही बोलते हैं। हमारे यहाँ रायपुर में छत्तीसगढ़ में हिजड़ों की जो नायक हैं बुल्लो नायक, पहले मुन्नी हाजी थीं और यह बुल्लो और कली नायक मुन्नी हाजी के चेला थे, फिर इन्होंने अपना वंश बढ़ाया। लेकिन यह आते झारीबरार घराने से ही हैं जो उनके पूर्वज हैं। ट्रांसवुमेन एक नार्मल वुमेन की तरह है, उनका पेशा भी नार्मल वुमेन की तरह हैं क्योंकि लाइवलीहुड का इश्यू है और फैमिली एक्सेप्टेंस नहीं है तो ट्रांसवुमेन है तो प्रोस्टीट्यूट की तरफ भी चले जाते हैं और बहुत सारे लोग पार्लर वगैरह में भी जाॅब कर लेते हैं या खुद का बिजनेस भी खोल लेते हैं। चूँकि अभी सोशल सेक्टर में ज्यादा चांस हैं तो एनजीओ वगैरह की तरफ भी ज्यादा इंट्रेस्ट लेते हैं। अभी हिजड़ा घराने में बहुत से रूल्स हैं जैसे यदि मैं जाकर कहीं चेला हो गयी तो चेला होकर मैं वहाँ से अपनी मर्ज़ी से निकल नहीं सकती। मतलब मैं बोलूँगी कि मैं जा रही हूँ पढ़ाई करने तो मना कर देंगे। मैं बोलूँगी कि जा रही हूँ शादी करने मेरा पति है, मना कर देंगे। मैं बोलूँगी कि मुझे चुनाव लड़ना है तो वह लोग मना कर देंगे। वो लोग पहले बोलेंगे कि हिजड़ापन में यह सब नहीं होता है, वह लोग विरोध करेंगे और विरोध करने के बाद आप करोगे तो आपके ऊपर दंड लगा देंगे और आप दुबारा हिजड़ों में आओगे तो दो लाख, दस लाख, पचास हजार, ग्यारह हजार का दंड लगेगा। तब हमको दुबारा शामिल किया जाएगा और वह काम भी हमको छोड़ना पड़ेगा। अभी जैसे कई लोग चुनाव लड़े, जैसे जबलपुर वाली लड़ी, सागर वाली लड़ी, अम्बिकापुर वाली लड़ी, तो यह जो सब लोग थे तो इन लोगों को दंड भी भरना पड़ा। इन हिजड़ों में एक चीज़ और भी है कि इनके हिजड़ापन में इनके रूल्स पर नंगाई चलती है, नंगाई इन द सेन्स जिसके पास जितना गाली, जिसके पास जितना गुंडा, जिसके पास जितना पावर, जिसके पास जितना पैसा वही नियम क्रेक कर लेता है, ऐसा है। अभी मैं रायपुर की बात करूँ तो एक किन्नर थी उसने बाहर ही बाहर एक ग्रुप बनाया ट्रेन में माँगने वालों का चालीस–पचास लोगों को इकट्ठा कर लिया। प्रोग्राम कर–करके पूरा छत्तीसगढ़ के दो–ढाई सौ लोगों को प्रोग्राम में बुलाती थी, फिर जब ट्रेन बंद होने लगा तो वह चालीस–पचास लोगों को लेकर घराने में दहियार में चली गयी। और वहाँ जाकर एक तो पहले लड़ाई–झगड़ा हुआ क्योंकि दोनों लोग बस्ती माँगने लग गये उसके बाद यह चालीस–पचास लोगों को लेकर गयी और उनसे ज्यादा चिल्लाई और यह लोग समझ गये कि इनके पास बहुत पावर है फिर वह लोग बोले कि कौन–कौन चेला होना चाहता है, हमारे यहाँ हो सकता है लेकिन यहीं रहना पड़ेगा। आठ–दस लोग चेला हो गये। लेकिन उसके पास पावर है तो वह ट्रेन में भी माँगती है, बस्ती में भी माँगती है, एनजीओ का काम भी करती है और फिर वह दान माँगने भी चली जाती है घराने वालों के साथ में।
उसके बाद एक चीज़ और आती है खैरगल्ला, इसमें सेल्फ आइडेंटिफाई हिजड़े रहते हैं जो ट्रेडिशनल हिजड़ा कम्युनिटी से निकाले हुए होते हैं या चेला–नाती नहीं भी रहते हैं, इन लोग का काम रहता है ट्रेन माँगना, बस्ती माँगना इसको खैर गल्ला हिजड़ा बोला जाता है और फिर मैंने बताया था कि धार्मिक ग्रुप के लोग रहते हैं, शिवशक्ति हो गया, शिव की आराधना करते हैं, जोगप्पा हो गया, साउथ में अरावली बोलते हैं, मध्यभारत, उत्तर भारत में मंगलामुखी बोला जाता है। सखी समुदाय भी बोलते हैं जो कृष्ण की उपासना करते हैं। बहुचरा माता का मंदिर गुजरात में है। लेकिन मुझे उसके बारे में ज्यादा नहीं पता। जिसकी पहली प्राथमिकता जो हो, उस आधार पर बहुचरा माता के रूप में मानते हैं।
साउथ में सारे हिजड़े इकट्ठा होते हैं फिर एक दिन की शादी करते हैं जैसा महाभारत में है, उसी को साउथ में मानते हैं। साउथ वाला अलग है, मुर्गा वाला अलग है। रात में शादी करते हैं अगले दिन विधवा होते हैं। सात दिन का मेला लगता है वहाँ खूब प्रास्टीट्यूशन होता है।
जो लोग हाजी नमाजी लोग हैं, जो लोग ग्यारवीं शरीफ करते हैं यहाँ पर ऐसा नहीं होता लेकिन यह लोग बाहर करते होंगे लेकिन वहाँ नहीं करते हैं। कोई आदमी उसमें जा नहीं सकता, आ नहीं सकता। बहुत स्ट्रिक्ट रहते हैं। एक तो वह लोग दिखते ही इतने डेंजर हैं। इतने मोटे हट्टे–कट्टे हैं कि उन्हें देखकर आधे लोग तो डर जाते हैं। मैं खुद डरती थी, अभी भी डरती हूँ अब मेरे यहाँ तो मैंने काम किया है तो एक अच्छा रिलेशन है, जाओ तो सबलोग ऐसे ही पूछते हैं किसकी चेला है, कहाँ की चेला है। मैं बोल दूँगी कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति का नाम उसी समुदाय की हूँ, तो बोलते हैं ठीक है। जैसे मैं बोल दूँगी कि मैं नगीना हाजी की बेटी हूँ, गुल्लो हाजी की बेटी हूँ तो बोलेंगे आओ, लेकिन मैं बोलूँगी कि मैं किसी की चेला–नाती नहीं हूँ, तो फिर बोलेंगे जाओ रे भैया तुम नकली लोग से हम बात नहीं करेंगे।

=>Dr. Firoz

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