ज़िंदगी जीने की कला

0
237
Dr. Kamal Musaddi
गाड़ी ने जैसे ही गेट से भीतर प्रवेश किया, आँखें जहाँ तक देख पा रही थी बस ऐसा लग रहा था कोई तिलस्मी दुनिया में आ गयी हूँ। हरी कोमल घास, फूलों से लदे पौधे, पेड़ और दूर दूर तक पीली सरसों के खेत। गाड़ी से उतर कर के तो जैसे कोई अदृश्य शक्ति पैरों में आ गयी जो बस खींचती जा रही थी। कभी पेड़ों के झुरमुट में कभी बांस की बनी मचान पर, कभी गेरू पुते कुएं की जगत पर।
थोड़ी देर तो बिना ये सोचे कि ‘कोई क्या सोचेगा’,  मैं खेत के बीच खड़े ‘बिजूका’ से बतियाती रही। कभी नीम के पेड़ पर लगे झूले पर बैठी, तो कभी बेंत की कुर्सियों पर । लग रहा था इस सारे मनोरम दृश्य को पी जाऊँ। पानी के रिसाव और बहाव के लिए जो झरना नुमा नल लगाए गए थे उनसे रिसते पानी की आवाज़ मधुर संगीत सी लग रही थी। तीस वर्षों की सेवा के बाद जो वृक्ष अपने पूरे यौवन पर थे उनके तने से निकली शाखाओं ने भी तने के मुकाबले मोटाई लेकर तने को एक समतल आधार दे दिया था, जहाँ आराम से बैठा जा सकता था। अरहर, गेंहू, सरसों, आलू, मूंगफली, प्याज और न जाने क्या क्या। नीम, जामुन, आम, शीशम, सागौन, नींबू, पपीता  इतना सब एक साथ देखकर मन आनंद से भरा था। तिस पर विशुद्ध भारतीय संगीत के गायक,  देशी वाद्यों के साथ। एक बहुत प्राकृतिक और पवित्र वातावरण था वहाँ का।दरअसल शहर के जाने माने परिवार के फार्म हाउस पर था , ‘कुछ विशेष मित्रों का समागम’ । फार्म हाउस पर कुछ कमरे भी थे साथ में जीवन जीने की हर आधुनिक सुविधा। आसपास न कोलाहल न प्रदूषण। बस चिड़ियाँ, तितलियाँ और मोर। फिर शुरू हुआ खाने पीने का सिलसिला ‘केन की बनी कुर्सी मेजों पर’ । खेत की उगी हुई मूंगफली, भुनी हुई शकरकंद, पपीता, केला, शुद्ध ताज़ी चीज़ें खाकर जो आनंद आया , “अभिभूत थी मैं”, “ आनंदित थे सब” वहाँ उपस्थित नब्बे प्रतिशत सीनियर सिटीजन थे। एक शिक्षाविद् परिवार की बेटी के जन्मदिन पर उपस्थित थे। कई तो अस्सी की उम्र पार कर चुके थे। स्वयं मेजबान सत्तर पार कर चुके थे। मगर सबका उत्साह देखते ही बनता था। फार्म हाउस के मालिक पुलिस महकमे में डी जी पी रह चुके थे। बड़ी फुर्ती से चल चलकर सबको कभी पेड़ो की उम्र बताते कभी खेतों की उपज तो कभी मचान का उपयोग। मैंने सब कुछ देखा, खाया, पिया, गाना गाया, झूला झूला और सोच रही थी कि पैसा कमाने की कला तो जीवन यापन के लिए अपने अपने स्तर पर सभी सीख जाते हैं किंतु पैसा खर्च करने की कला वो भी इस तरह, कि जो बहुतों के सुख और आनंद का साधन बने,  विरलों को ही आती है।फार्म हाउस के मालिक ने जब एक छोटे से पौधे को दिखाते हुए कहा कि, “ इसे लगाने में मैं थोड़ा लेट हो गया, ये इमली का पौधा है और ये तीस साल बाद फल देता है” तो मैं उनका चेहरा देख रही थी कि पचहत्तर की उम्र में भी उस पौधे के फल को न खा पा सकने की संभावित निराशा के साथ प्रकृति के सत्य की स्वीकारोक्ति उनके चेहरे पर झलक रही थी।मैंने मन ही मन उन्हें सैल्यूट किया। मेरी साँसों से स्वर फूट रहे थे अहा जीवन, वाह जीवन वास्तव में यही है जीवन जीने की कला। क्यों? “है न ज़िंदगी”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here