बाजारवाद और बच्चे

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Dr. Kamal Musaddi

याद है ग्यारह वर्ष की उम्र में भी माँ कभी पांच या दस रुपये का नोट देकर बाजार से ब्रेड, अदरक,धनियां, मिर्च या कोई फुटकर सामान लाने को कहती थी,तो अपने हाथ से नोट हथेली पर रख कर मुट्ठी कस के बंद कर देती थी, और साथ ही कठोर शब्दों में निर्देश देती थी कि मुट्ठी ठीक से बंद रखना, नोट गिरा ना देना। हिसाब से पैसे वापस लेना गिन लेना वगैरह वगैरह। हम बच्चे भी उस दौर में इतने आज्ञाकारी होते थे,कि दौड़ते भागते अगर ठोकर खा कर गिर जाएं, हमारा घुटना, ठुड्डी फूट जाए मगर मजाल है जो मुट्ठी खुल जाए। क्यों कि मुट्ठी में उस दौर की बहुत बड़ी पूंजी होती थी, और बाजार भेजने की जिस योग्यता को समझ कर माँ हमें भेजती थी। उस विश्वास को भी तो कायम रखना था ।क्योंकि खरीददारी छोटी हो या बड़ी उसी से कराई जाती थी जो घर के बड़ो की दृष्टि में समझदार, गम्भीर और ईमानदार होता था।

समय बदला रुपये की कीमत गिरी,वस्तुएं महंगी तो हुई ही साथ ही वस्तुओं के विकल्प से बाजार सजते गए।उत्पादक आपसी प्रतिस्पर्धा में विज्ञापनों की होड़ में लग गए।अर्थशास्त्र के कीमत निर्धारण के तत्वों में वृद्धि औऱ सिद्धान्तों में अपवादकारी परिवर्तन होने लगे। बाजार के प्रकार बदल गए और समय, क्षेत्र प्रतियोगिता और वैधानिक बाजारों के साथ एक और बाजार पैदा हो गया और है ऑनलाइन बाजार।

आजकल बच्चा स्मार्ट फ़ोन के ऑपरेशन के आदी है। बड़ी बड़ी नेशनल और इंटरनेशनल कंपनियां अपने उत्त्पाद इस मीडिया के माध्यम से इंट्रोड्यूज करती हैं और कई बड़ी व्यापारिक एजेंसी इनका माल बेचती है। इन सामानों में रोजमर्रा की जरूरतों के अतिरिक्त आभूषण ,कपड़े व विलासता संबंधी सामान जैसे कार, मोबाइल,फैशन,सब कुछ बिकता है। जीवन का कोई क्षेत्र इन एजेंसी ने नही छोड़ा है। इतना ही नही हर उम्र का उपयोगी सामान इनके पास है।गर्भस्थ शिशु से लेकर तुरंत जन्मे शिशु के साथ-साथ खिलोने, कपडे, स्कूल के सामान ,सब कुछ है।बच्चे देखते है, आकर्षित होते हैं। कीमत जानते हैं और माता पिता से लेने की जिद करते हैं ।

अपने सीमित संसाधनों में माता पिता उनकी किसी मांग को पूरा कर देते हैं कि तुरंत किसी नए मॉडल या दोस्तों के बीच खुद को बराबरी का दिखाने या उनसे सुपर दिखने की होड़ में बच्चे फिर जिद पर अड़ जाते हैं। जिद न पूरी करने पर चिढ़चिड़े असंतुष्ठ और अतृप्त व्यवहार का प्रदर्शन करते है।

जो अमीर है साधन संपन्न है वो तो बच्चों की मांग को सरलता से पूरा कर देतें हैं।किंतु वेतनभोगी माध्यम वर्गीय माता -पिता निरंतर बच्चे की मन: स्थिति से जूझते रहते हैं। इतना ही नही छोटी मोटी चीजों की मांग तो माँ बाप किसी भी तरह पूरी कर देते हैं किंतु जब मंहंगे मोबाइल का ,कार का,बाइक का या फिर घर के ac,tv जैसे नए मॉडल पर बच्चे माता पिता को धिक्कारने लगते हैं,तब ये चिंता और समाज मे उत्पन्न हो रही विसंगतियों का विषय बन जाता है।कई बार बच्चों की मांग को पूरा करते -करते मां बाप अतिरिक्त श्रम करके अपना स्वस्थ खो देते है,या फिर पैसा कमाने के सरल और असंवैधानिक रास्ते अपना लेते है ।

सच कहते थे हमारे बुजुर्ग जिंदगी धीरे -धीरे विकास करे तो संतुलन बना रहता है,किन्तु बच्चे उम्र से पहले बड़े होकर इस विकास को असंतुलित कर देते हैं। इसलिए बाजार जिंदगी चलाने वाली एक संस्था है जिंदगी को बाजार में खड़ा करना जिंदगी से खेलना है।

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