टाइगर रेस्क्यू: एक रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव

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सौ हेक्टेयर में फैली बीस वर्ष से बंद फैक्टरी, जो अब एक बियाबान जंगल हो चुकी थी, में बाघ को ढूंढना अत्यंत जोखिम भरा था। हम दो दिन तक बाघ के प्रमाण व पंजे के निशान ढूंढते रहे परन्तु जमीन सख्त होने से कहीं कुछ न मिला। हमारे ऑटोमैटिक कैमरों, जिन्हें कैमरा ट्रैप कहा जाता है, में भी उसका कोई नामोनिशान नहीं था। हालांकि कैमरों को जब प्रतिदिन सुबह चेक किया जाता था तो उसमें सियार, सेही, बिज्जू, यहां तक कि अजगर और हिरनों के झुंड ही दिखाई देते थे पर टाइगर का पता नहीं चल रहा था। एक दिन शाम को कॉम्बिंग के दौरान कारखाने में एक पगडण्डी पर गुजरते समय अचानक एक परिचित गन्ध ने मेरे कदमों को रोक दिया, मैंने अविलम्ब अपनी टीम को पीछे हटाते हुए गाड़ी में बैठने को कहा। जी हाँ, झाड़ियों से टाइगर की विशेष गन्ध आ रही थी ।

उस रात हल्की बारिश ने हमारा काम आसान कर दिया। सुबह उन झाड़ियों के पास गीली जमीन पर टाइगर के पगमार्क थे। पगमार्क लगभग पन्द्रह सेंटीमीटर व चौकोर थे, जिससे स्पष्ट था कि यह एक विशाल नर बाघ था। परंतु पगमार्क कुछ दूर जाकर घनी झाड़ियों में ओझल हो गए थे। इसका अर्थ था कि कल शाम हम टाइगर से मात्र कुछ मीटर ही दूर थे, परन्तु उस विडालवंशी ने  अनावश्यक हम पर आक्रमण नहीं किया। वे मनुष्य पर तब तक आक्रमण नहीं करते हैं जब तक उन्हें खतरा न महसूस हो।
अगले दिन उसके पगमार्क दूसरे स्थान पर मिले। हमने अपने कैमरों को अब इस स्थान पर लगाया तो अगली सुबह उसके फ़ोटो देख अन्दाज़ हुआ कि वह लगभग 200 किलो का टाइगर हो सकता है, इससे हमें उसे दी जाने वाली दवा की मात्रा का अनुमान लगाना आसान हो गया।  टाइगर को लोकेट करने का हमारा प्रथम चरण सफल रहा था। अब द्वितीय चरण में हमें उसकी गतिविधियों को एक ऐसे स्थान पर सीमित करना था जहां टाइगर को आसानी से पिंजरे में लिया जा सके या पिंजरे में न आने पर किसी सुरक्षित ऊंचे स्थान से ट्रांक्विलाईज़ किया जा सके। इस हेतु हमने आधे किलोमीटर के चिन्हित छोटे दायरे में स्वतः बन्द होने वाले तीन पिंजरों में मीट के टुकड़े डालकर रखे। पिंजरों को पत्तियों आदि से इस प्रकार ढंका  गया कि वह आसपास के परिवेश जैसे ही दिखें। टाइगर अत्यंत चालाक होते हैं व जल्दी पिंजरों में नहीं आते।
कई दिन  तक हमारे बीच आंखमिचौली चलती रही। दो दिन तक उसका कुछ पता नहीं चला। आसपास के इलाके में दिन भर कॉम्बिंग करने पर भी उसका निशान नहीं मिला और ना ही उसका किल (शिकार) मिला। यहां तक कि ड्रोन में भी घनी झाड़ियों के कारण वह नज़र नहीं आया। अब हमारे द्वारा चिड़िया घर से मादा बाघिन की यूरीन मंगा कर पिंजरे के आसपास डलवाई जाने लगी। यह तरकीब काम कर गयी। दो दिन के पश्चात पिंजरे के आसपास नर बाघ के पगमार्क मिले। लेकिन चालाक टाइगर ने पिंजरे में कदम नहीं रखा।
हम आश्चर्य चकित थे कि इतने दिनों से यह बाघ क्या खा रहा है। तभी मेरी दृष्टि दिन प्रतिदिन बाघ के डर से बड़े हो रहे नीलगायों के झुंड पर पड़ी इसके अतिरिक्त वे एक दिशा में ही इकट्ठे व अलर्ट दिखती थीं जिससे स्पष्ट था कि बाघ इसकी विपरीत दिशा में था व उसने  ज़रूर किसी नीलगाय को अपना शिकार बनाया था। ढूंढते-ढूंढते हमें एक जगह किसी भारी चीज़ के खींचे जाने के निशान मिले जोकि दूर तक जाकर घनी झाड़ियों में समा गए थे। स्पष्ट था बाघ किसी नीलगाय को घसीट के ले गया था। इसके आगे जाना खतरनाक हो सकता था क्योंकि अपने शिकार के पास बैठा बाघ आक्रामक हो सकता था। लेकिन सौ किलो से अधिक के शिकार को आधे किलोमीटर तक खींच के झाड़ियों में ले जाना एक बड़े बाघ के लिए ही सम्भव था।
हम अपनी योजना के अनुसार आगे बढ़ रहे थे। लेकिन बाघ हमें हर बार चकमा देकर निकल जाता था। अंत में हमने उसे ट्रांक्विलाइज़ करने का निर्णय लिया। हमने  एक लोहे की पुरानी लगभग 18 फ़ीट ऊंची टँकी के पास झाड़ियों में मादा बाघिन की यूरिन डालनी और मीट रखना प्रारंभ किया। दूसरे दिन वहां बाघ के मूवमेंट मिले । हमने  उसी रात टँकी पर चढ़ कर इंतज़ार करने का निर्णय लिया। ऐसे कार्य में अत्यधिक सावधानी व साहस की आवश्यकता होती है, क्योंकि घनी अंधेरी रात में जंगल में बाघ को देखकर किसी के भी पसीने छूट सकते हैं औऱ उसकी कोई भी हरकत आपको भी खतरे में डाल सकती है। अतः मैंने अपने एक्सपर्ट कीपर को ही साथ रखा।
योजना के अनुसार आसपास के पेड़ों की डाली को कटवा दिया गया ताकि वे बाघ के ऊपर तक पहुंचने में सहायक न बनें और डार्ट की राह में बाधा न हो। इन डालियों को टँकी के ऊपर इस प्रकार रखा गया कि हम छुप सकें। टँकी पर चढ़ने के लिए बांस की सीढ़ियों का प्रयोग किया गया। मैंने अपनी गन को दवा से भरी डार्ट से लोड कर लिया। हम रात भर मच्छरों से जूझते कम्बल ओढ़ कर डालियों के पीछे बैठे बाघ का इंतजार करते रहे। मगर बाघ का कहीं नामोनिशान नहीं मिला। सम्भवतः बाघ दिन में कई लोगों के डाल आदि काटने  में लगे होने के कारण वहां फैली मानव गन्ध से टँकी के पास आने में परहेज़ कर रहा था।
अगले दिन वहां किसीको नहीं जाने दिया गया। शाम को केवल हम दोनों ने हिम्मत कर हेलमेट पहन कर और हाथ में आत्मरक्षा हेतु बांका लेकर उस स्थान पर एक बार फिर बाघिन की और अधिक यूरिन का छिड़काव किया साथ में अपने जूतों के ऊपर और नीचे भी टाइगर की यूरिन का छिड़काव कर टँकी पर चढ़ने का निर्णय लिया, जिससे तनिक भी मानव गन्ध उसे न मिले। सूरज ढलते ही हम अपने आवश्यक सामानों  के साथ एक फिर टँकी पर थे।
घनघोर सन्नाटे में रात को उल्लुओं की आवाज़ माहौल को भयावह बना रही थीं, उसपर आसपास उड़ते चमगादड़ और दूर से आती सियारों की आवाज़ एक सिहरन पैदा कर रही थी। घनी काली रात में हम शांत बैठे झींगुरों की आवाज़ के बीच बाघ का इंतज़ार करने लगे। सर्द रात में बैठे बैठे हमारी कमर और पांव दोनों जवाब दे रहे थे। पर आधी रात बीत जाने पर भी बाघ का कोई अता पता नहीं था।
तभी झाड़ियों में हल्की सरसराहट हुई और एक विशाल साया आराम से झूमता हुआ टँकी से थोड़ी दूर पर कुछ सूंघने लगा। बाघ से इतनी बार सामना होने के बावजूद भी हमारे अंदर एक सिहरन दौड़ गयी। हमारे हाथ जैसे एक बार को जड़ हो गए। तभी मेरी तन्द्रा टूटी, मैंने अपने सहयोगी से इशारों में पूछा तो उसने मुझे रोक दिया कि वह अभी पहुंच से दूर है। तभी बाघ टँकी की तरफ रखे मीट के टुकड़े की तरफ बढ़ा लेकिन मेरे निशाने की जद में होने के बावजूद न जाने कहाँ से एक हवा का झोंका आ गया और पास की झाड़ी की एक डाली हिलती हुई बाघ के सामने आ गई। वैसे भी अर्ध चंद्रमा की उस रात के अंधेरे में कुछ ठीक से नहीं दिख रहा था।
तभी एक और भयानक गड़बड़ी हो गई, न जाने कहाँ से एक अजगर टँकी पर चढ़ी लताओं के सहारे टँकी पर गया। मैंने अपने सहायक को तुरंत इशारे से नीचे सरकते हुए अजगर के पास जा कर उसको दूर करने का इशारा किया। लेकिन अजगर की उपस्थिति ने पेड़ों पर बैठे उल्लुओं में हलचल पैदा कर दी। जिनकी आवाज़ से बाघ सजग होकर ऊपर देखने लगा। मैंने तुरन्त अपने आप को नीचे झुका लिया। इस बीच अजगर वापस नीचे जाने लगा। चूंकि बाघ आदतन शंका होने पर थोड़ी देर तक एक ही स्थान को देखते रहते हैं। अतः लगभग दो से तीन मिनट बाद हमने धीरे से नीचे देखा तो बाघ दूसरी तरफ झाड़ियों में मादा की यूरिन को सूंघने की कोशिश कर रहा था।
मैंने उसे अपनी गन की जद में पाकर गन से निशाना लगाना चाहा कि गन की नाल पेड़ की डाल से टकरा गई और उस अंधेरी रात में मेरी और बाघ की आंखें एक दूसरे से मिल गईं। मुझे लगा कि एक बार फिर बाघ चकमा दे देगा। लेकिन इससे पहले कि बाघ वहां से जाता मेरे अनुभवी सहायक ने उसे अपनी तेज सर्च लाइट की दूधिया रोशनी से नहला दिया। इसका ये फायदा हुआ कि बाघ क्षण भर के लिये भृमवश एकटक तेज़ रोशनी की ओर देखने लगा।
इसी बीच मौके का फायदा उठा मैंने अपनी गन का ट्रिगर दबा दिया। गोली की तेजी से पांच एमएल की डार्ट उसकी मज़बूत मांसपेशियों में समा गई। एक दिल को दहला देने वाली गर्जना के साथ उस विशाल विडालवंशी ने लगभग टँकी के बराबर छलांग लगा दी। खून को भी जमा देने वाला वो मंज़र आज भी मुझे एक पल को जड़ कर देता है। ऐसा लगा कि उसकी गर्जना हमारे कानों के चीथड़े उड़ा देगी। और क्षण भर में ही वह पूरब दिशा में ओझल हो गया। हमने तुरन्त वायरलेस से अपनी टीम को सूचना दी। लगभग पांच मिनट बाद टीम की टॉर्च की रोशनी दिखने पर ही हम नीचे उतरने का साहस कर सके।
अब हमें तेज़ी से काम करना था क्योंकि थोड़ी ही देर में बाघ को होश आ सकता था। कुछ ही देर में हमें वह पास की झाड़ियों में लेटा मिल गया। मैंने लम्बे बांस से उसकी बेहोशी को चेक किया और साथियों की मदद से उसे पिंजरे में डाल उसके प्राकृतिक आवास यानी जंगल छोड़ने चल दिये। मुझे खुशी थी मेरा एक और दोस्त दुबारा अपने घर वापस जा रहा था। लेकिन वह विडाल वंशी जंगल छोड़ने को क्यों मजबूर हुआ था इसका उत्तर मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ।
  • डॉ आर के सिंह, वन्य जीव विशेषज्ञ

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