दूसरी बेटी

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Prachi Dwivedi
मिस्टर और मिसेज ओझा पेशे से प्रोफेसर थे, और उनका एकलौता बेटा प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान में लेक्चरर था। बेटे की शादी को पांच साल हो गए थे। चारो तरफ ख़ुशी का माहौल था। बहू की गोदभराई थी। पंद्रह दिन बाद बहू को प्रसव पीड़ा होने पर अस्पताल ले जाया गया। सभी लोग नन्हे मेहमान के आने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे, अहमदाबाद से ओझा जी की बेटी और दामाद भी आ गए थे। थोड़ी ही देर बाद सिस्टर ने आकर कहा, “बधाई हो, बेटी हुई है।“ ओझा जी का चेहरा थोड़ा उतर गया, बोले कुछ नहीं, बस हल्का सा मुस्कुरा दिए। ओझा जी की बेटी ने कहा कि, बेटी तो थी ही, बस बेटा हो जाता तो भैया का परिवार पूरा हो जाता।“ मोहल्ले वालों ने भी सहानुभूति जताते हुए कहा कि दूसरी बार भी लड़की हो गयी, कोई बात नहीं, अगली बार लड़का ही होगा।
पहली बार जब बहू के पांव भारी हुए थे, तब भी सब बहुत खुश थे। पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी थी खुद ओझा जी ने मूंछों पर ताव देते हुए घर जा जाकर सभी को ख़ुशी से बताया गया कि बेटी हुई है, घर में लक्ष्मी आई है। पड़ोस में रहने वाले कुछ अन्य बुद्धजीवीयों से एक बार लिंग भेद पर सर्वप्रचलित बहस में ओझा जी ने गर्व से बताया था कि वे कितने सौभाग्यशाली हैं जो उनके घर पोती हुई है। देशभर में चल रहे बेटी बचाओ आंदोलन से जुड़े सारे पहलू उसदिन ओझा जी ने सबको समझाए थे और खुद भी ‘बेटी- बेटा एक समान’ सिद्धान्त की जोरदार पैरवी की थी।
फिर ‘दूसरी’ बार लड़की होने पर ओझाजी के माथे पर बल क्यों पड़ गए? क्या वास्तव में उन्हें मोहल्ले वालों की सहानुभूति की जरुरत थी? इसीलिए की ‘दूसरी लड़की’ हो गयी। तो क्या पहली लड़की होने पर, सबके सामने जो ख़ुशी जाहिर की गयी, स्वयं को दूसरों के सामने गौरवान्वित महसूस करता हुआ दिखाया गया; वो सब दिखावा और ढकोसलेबाज़ी थी? तो क्या अभी तक ओझा जी जैसे बुद्धजीवी लोग भी ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘नारी शक्ति’, बेटियों से जुड़ी और भी न जाने कितनी योजनाओं को सिर्फ ‘पहली बेटी’ तक ही अपना पाएं हैं? क्या सिर्फ अपने को बड़ा दिखाने के लिए और अपने अंदर के अहम् को संतुष्ट और न्यायायित करने के लिए ऐसे लोग ‘पहली बेटी’ होने पर ढोल नगाड़े लेकर जनवाचन करते फिरते हैं?
ओझा जी सिर्फ अकेले नहीं हैं, समाज के अधिकांशतः लोग आधुनिकता के साथ हुए बदलाव में खुद को इतना ही बदल पाए हैं और अगर किसी ने अपने आपको इस आधुनिकता में अव्वल समझते हुए हुए ‘दूसरी बेटी’ के जन्म पर थोड़ी बहुत ख़ुशी सबको दिखा दी है, तब भी उस बेटी को ‘दूसरी लड़की’ होने का दंश झेलते रहना पड़ता है।अपवादों को छोड़कर परिवारों में पहली बेटी के बाद फिर ‘दूसरी बेटी’ होने का दर्द उतना ही पुराना है जितना भौतिकतावादी सभ्यता का इतिहास। क्योंकि यह सभ्यता मानव मूल्यों पर नही उनके अवमूल्यन पर टिकी है इसलिए एक बेटी होना तो इस सभ्यता में खासियत समझी जा सकती है लेकिन दूसरी बेटी होना खटकता है। बेटी एक होती है तो ख़ुशी होती है लेकिन उतनी नहीं जितने एक बेटे के होने पर होती है, बेटा न होने की कसक मन को मसोसती है, तो ‘अगली बार’ बेटे के जन्म को परिवार की संपूर्णता से जोड़ा जाता है। और ये चाह इतनी गहरी होती है कि ‘अगली बार’ जरूर कहना पड़ता है। इसलिए फिर बेटे की चाह में जितनी भी बेटियाँ बढ़तीं है, परिवार में उतनी ही मायूसी बढ़ती है।
दूसरी और तीसरी बार भी बेटी होने के बाद परिवार का मुखिया फिर ‘डिप्रेशन’ जैसी मानसिक बीमारी से ग्रसित होता देखा जा सकता है। भविष्य को लेकर वह असुरक्षित, अशक्त और असंतुलित महसूस करने लगता है। बेटी की परवरिश, उसका विवाह, उसके पश्चात उसके अपने परिवार के अनेक दायित्वों को निभाने में समय के साथ निष्क्रियता की ओर बढ़ते परिवार के मुखिया को एक बड़ी चुनौती सी लगती है।
“बेटा हो जाता तो बुढ़ापा सुकून से कटता। अब क्या है, कब्र में लटके पैरों तक अपनी रोटी, दाल कमानी होगी, बेटी के रिश्ते निभाने होंगे।“ ये विचार परिवार के मुखिया के जेहन में तैरने लगता है। भले ही ऐसे परिवार के लोग अपने अंतःमन के इस दर्द को अपनी मासूम बेटियों तक शब्दों के माध्यम से न पहुँचने दे किन्तु असहज होते मनोवैज्ञानिक परिवर्तन उनके भीतर की व्यथा, खीझ और हताशा मासूम बेटियों के दिल और दिमाग को अछूता नहीं छोड़ते। ऐसे में माता-पिता के प्रति पूर्ण समर्पित बेटियाँ कभी अपने दुःख दर्द, आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को उनके सम्मुख रखकर उन्हें और मायूस नहीं करना चाहती। वह अपनी जीवन बगिया में प्रातः के सूर्य की उस कोमल किरण की प्रतीक्षा ही करती रह जाती हैं जिसको पाकर कितने ही सुषुप्त पुष्प खिल उठते हैं। फिर भी वो अपनी जीवन बंसी पर नित्य प्रति मधुर लहरी को गुनगुनाती हैं, कोई सुने न सुने, वो सुनती हैं। स्वयं प्रसन्न रहने और परिवार को खुशियां बांटने का प्रयास करती हैं।
ऐसे समय में ‘वो’; जिस पर परिवार अपना सहारा होने का दम्भ भरता है, अपने जीवन संगीत को विवशता की बंसी पर बिखेर दूर हो जाता है, ये बेटियाँ तब भी परिवार को समर्पित रहती हैं, उसका प्रचंड संबल बनती हैं।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कार्यक्रमों में जाना और उनके पक्ष में दो शब्दों को बोलकर स्वयं को बेटियों का हितैषी दिखाना मात्र; दीमक लगे खोखले असबाबों जैसा ही है। पहली बेटी के जन्म में दिखावे की ख़ुशी के बाद आधुनिक और बुद्धजीवी दिखने की होड़ में ही सही हमने ‘बेटी’ के जन्म को तो सहर्ष स्वीकृति दे दी है। लेकिन  बदलाव का ये सफर सिर्फ ‘बेटी’ तक ही क्यों? ‘बेटियों’ तक क्यों नहीं? हम क्यों नहीं स्वीकार कर पा रहे हैं ‘दूसरी बेटी’ या ‘तीसरी बेटी’ के जन्म को उसी सहर्ष भाव से जितनी सहजता के साथ हमने ‘पहली बेटी’ के जन्म को स्वीकृति दे दी है।
बेटियों के प्रति आशा जनित विश्वास की मानसिकता विधि विधानों से नहीं अपितु अंतर्चेतना के मनोवैज्ञानिक परिवर्तन से बढ़ेगी। और इसी की प्रतीक्षा वो सदियों से करती आ रहीं हैं लेकिन उनकी यह प्रतीक्षा कमल की आकर्षक पंखुड़ियों पर पड़ी ओस की नर्म बूंदों की भांति ढरकती रहती हैं। ओस की वो बूँद जो अपना सब कुछ समर्पित करके भी कमल को स्वीकार्य नहीं होती। वो ढरकती ही जाती है।

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