छिं:…,मुंह खोलें मिर्ची झरे….

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pankaj Vajpayee
Dr. Suresh Awasthi

गुरुदेव जब गुरुकुल पहुंचे बहुत गुस्से में थे। किसी ने उन्हें सूचना दी थी कि एक शिष्य ने दूसरे शिष्य के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करके गुरुकुल की आचार संहिता तार तार कर दी है। गुरुदेव को लगा कि जैसे गुरुकुल, गुरुकुल नहीं रहा चुनावी मैदान हो गया है और शिष्य शिष्ट,विशिष्ट विद्यार्थी न होकर अप्रशिक्षित, अंहकारी, संवेदनहीन राजनीति के व्यापारी हो गए हैं। उन्होंने गुरुकुल पहुंचते ही सभी शिष्यों को उसी प्रकार तलब किया जैसे चुनाव के दौरान आचार संहिता का पालन न करने पर चुनाव आयोग किसी अधिकारी अथवा प्रत्याशी को तलब करता है। गुरुदेव थोड़ी देर धीर,गंभीर मुद्रा में बैठे रहे। शिष्य समुदाय बाहर से शांत और अंदर से अशांत था। अचानक गुरुदेव ने मौन तोड़ा, वह महान शिष्य कौन है जो चुनावी सभाओं के कतिपय बेलगाम-बदजुबान नेताओं से अप्रत्यक्ष दीक्षा ले रहा है? गुरुदेव के क्रोध से डरे शिष्यों में एक उठ कर खड़ा हुआ और खड़े होते ही बोला, गुरुदेव क्षमा करें गलती हो गयी। गुरुदेव बोले, चलो अच्छा हुआ कि तूने स्मृति यानी मेमोरी लॉस वाली गलती की परंतु उससे अलग आचरण करते हुये तुरंत स्वीकार कर लिया। तुम्हें माफी मिल सकती है परंतु जिसने तुम्हें अति विशिष्ट असांस्कृतिक अपशब्दों द्वारा सार्वजनिकरूप से असम्मानित किया वह मुगल-ए-आजम कौन है? गुरुदेव के व्यंग्यवाण चलते ही एक अन्य शिष्य उठ खड़ा हुआ। उसने क्षमा याचना करने के बजाय अपनी अपसंस्कृति से मढ़ी, अनाचार से जुड़ी अलगाववादी भाषा के प्रति अफसोस जताने के बजाय उचित ठहराने की कोशिश की तो गुरुदेव भड़क कर बोले, आप अहंकारी समुदाय के ïस्वयंभू अध्यक्ष कब से बन गए? ध्यान रहे जैसे मुंह से उगला थूक वापस मुंह में नहीं आता, वैसे ही मुंह से निकले अपशब्द कभी वापस नहीं आते। जहर उगलोगे जो जहरीली हवा में ही सांस लेनी होगी।

यह गुरुकुल है कोई ऐसा कोई सदन नहीं है जो भाषाई -मिर्च का पाउडर उड़ाने का शर्मनाक आचरण करके भी सम्मान पाते रहो। ये गुरुकुल की कक्षाएं हैं, कोई चुनावी सभाएं नहीं जो मनुष्यता व राष्ट्रीयता के विरुद्ध सभी मर्यादाएं तोड़ कर गुरुकुल को धर्म व जाति की दीवारों से बांटने वाली भाषा के जहरबुझे तीर शान से चलाओ फिर भी माला पहन कर निकल जाओ।

गुरुदेव का गुस्सा आसमान पर था। शिष्य को (सु) बोध हुआ तो उसने पैर पकड़ लिए और वादा किया कि भविष्य में सांस्कारिक भाषा का ही प्रयोग करेगा। गुरुदेव ने उसे क्षमा कर दिया और पूरी कक्षा को दीक्षा दी भाषा सीखना है
तो अच्छी पुस्तकों से सीखो। खबरिया चैनलों पर बोस रहे नेताओं अथवा कतिपय एकंरों से मत सीखिये।

ध्यान रहे :

शब्द जब जब बोलते हैं
भेद मन का खोलते हैं
शब्द हारा, शब्द जीता
शब्द रावण, शब्द सीता
शब्द मरहम, शब्द घाव
शब्द सागर, शब्द नाव
बोलो सदा तमीज की भाषा
बोलिए मत ,खीज की भाषा

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