साहित्य के फर्जी डॉक्टरों की जय हो !!!

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pankaj Vajpayee
Dr. Suresh Awasthi

गुरुदेव जब दो दिनों तक गुरुकुल नहीं आए तो दो शिष्य उनकी कुटी में पहुंचे। वहां उन्हें जो दिखा व जोर का झटका धीरे से लगाने वाला था। गुरुदेव तख्त पर पालथी मारे ध्यानमुद्रा में बैठे थे। उन्होंने गले में एक तख्ती लटका रखी थी। तख्ती पर मोटे मोटे अक्षरों में ‘पीएचडी बिकती है, खरीदोगे लिखा हुआ था। उनके सामने चौकी पर उनकी पीएचडी की 600 पेज का मोटा सा शोधग्रंथ और उसी के पास में कफन में प्रयोग होने वाले सफेद वस्त्र का एक टुकड़ा रखा था जिस पर कुछ फूल, चंदन की लकड़ी का एक टुकड़ा व रोली चावल पड़े थे। शिष्यगण काफी देर तक हतप्रभ खड़े रहे। अचानक गुरुदेव ने आंखें खोलीं। शिष्यों ने उन्हें तुरंत प्रणाम किया और पूछा, ‘गुरुदेव यह क्या? गुरुदेव ने उन्हें बैठने का संकेत किया।

शिष्यगण वहीं पड़े चौकिया (स्टूल) पर बैठ गए। गुरुदेव बोले, ये मैंं शोध ग्रन्थ का अंतिम संस्कार करने जा रहा हूँ। इसे मैंंनेे पूरे पांच साल की मेहनत के बाद शोध करके तैयार किया। जिस पर एक पांच सदस्यीय विद्वानों की समिति ने तीन घण्टे तक मेरी परीक्षा ली। शोध पर अपनी अटूट मेंहनत की कमाई का हज़ारों रूपया।खर्च किया। तब कहीं जाकर नाम के आगे डॉक्टर लिखने का अधिकार मिला। देख रहा हूँ एक तथाकथित विश्वविद्यालय हर साल हाई स्कूल, इंटर या स्नातक पास दो ढाई सौ लोगों को ‘ विद्या वाचस्पति ‘ डेढ़ हजार में बेंच देता है और वे सब डॉक्टर साहेब हो जाते हैं। मेरे कालेज के एक स्नातक थर्ड डिवीजन पास चपरासी ने जब से ये विद्या वाचस्पति ख़रीदी है, वो भी डॉक्टर साहब हो गया। उसके कुलीग उसे सार्वजनिक रूप से डॉक्टर साहब तो कहते ही हैं, वो भी नाम के आगे डॉक्टर लिखने लगा है। लग रहा है कि शोध की असली विद्या तो बांझ हो गयी है और उसे स्पति अर्थात कुष्ठ रोग हो गया है।ऐसे फर्जी विद्यावचस्पतिओं को भरी महफ़िल में डॉक्टर साहब कह कर संबोधित करने से तो अच्छा है कि इस शोध ग्रन्थ और इससे मिली अपनी पीएचडी की डिग्री की ही अंत्येष्टि कर दूँ।

शिष्यगण महसूस कर रहे थे कि शार्टकट से खुद को विद्वान और हाइली क्वालिफाइड दिखाने की ललक वाले क्षद्मवेशियों की घटिया हरकत से दुखी गुरुदेव खुद पर गुस्सा उतार रहे हैं। एक शिष्य ने साहस करके कहा, पर गुरुदेव वे जो खरीद कर ले रहे हैं वो विद्या वाचस्पति ‘ ‘उपाधि ‘ नही ‘सम्मान’ है, और सम्मान में किसी को नाम के आगे डॉक्टर लिखने की अनुमति नहीं होती। इस सम्मान को खरीदने वालों का ईमान ही मर गया और फर्जी सम्मान पाने के घटियापन पर उतर आए हैं तो आप इन नकली और फसली लोगों के लिए अपनी असली डिग्री क्यों फूंक रहे हैं गुरुदेव?

गुरुदेव ने झल्लाये स्वर में कहा कि लोग समझेंगे कि मैं भी इसी सम्मान को खरीद कर डॉक्टर बना हूं।दूसरे शिष्य ने आग्रहपूर्वक गुरुदेव को इस अपमानजनक स्थिति से बाहर निकलने का उपाय सुझाया तो गुरुदेव का चेहरा चमक उठा। उन्होंने धैर्यपूर्वक वही किया। एक साल की प्रतीक्षा के बाद एक दिन गुरुदेव ने ऐसे सभी ‘बाजारू विद्यावचस्पतिओं’ को घर पर चाय पर आमंत्रित किया। विद्यावचस्पतियों ने उनके घर के मुख्यद्वार एक बोर्ड लगा देखा तो चौंक गए। बोर्ड पर मुख्य गृह सेवकों, भोजन बनाने वाली बाई, झाड़ू पोछा लगाने वाली बाई, ड्राइवर और अनपढ़ सफाई कर्मचारी के नामों की सूची लिखी हुई थी। हर नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लिखा था। किसी ने पूछ दिया, ‘सब के सब डॉक्टर?’ गुरुदेव मुस्कराए , बोले, ‘ जी हां, सभी डॉक्टर हैं क्यों कि मैंने इन सभी को विद्यावचस्पति खरीदवा दी है। इससे मुझे पढ़े लिखे विद्वान लोगों के बीच रहने वाला हैवी क्वालिटी का फीलगुड होता है।’
आमंत्रित विद्यावचस्पतिओं को गुरुदेव की चाय का स्वाद मीठे की बजाय कसैला लग रहा रहा था।

2 COMMENTS

  1. Paramadarniya Awasthi ji apki rachna par wah-wah kahna surya ko diya dikhana hi hai. apki rahchnaeyn chahe we gadya mein ho ya padya mein pathniya hi nahin sangrahniya hoti hain. dhanya hain aap aur hum logon ka saubhagya hai ki aap hamare sahar ke sirmaur hain. naman hai apko

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