फिर भी, मैं रोया नहीं…

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Dr. Suresh Awasthi

उस दिन अचानक
हाथों से
छूट गया कांच का बर्तन
उफ एक झटके में
कितने परिवर्तन
फर्स पर बिखरी कांच को
समेटने में लहूलुहान हो गईं
उंगलियां
फिर भी मैं रोया नहीं
देर तक उंगलियों पर जमे
लहू को भी भी धोया नहीं
और उस दिन
सीख लिया कांच की
चीजों को संभाल कर रखना
और संभालने
में कभी न थकना।

फिर अनुभवों ने बताया
जिंदगी
रिश्ते
दिल
प्यार
अभ्यस्त नहीं हैं
उपेक्षा की आंच के
ये सभी बने हैं कांच के
इनको लेकर इतना रखना ध्यान
थोड़ा सा चूके तो
हो जाओगे लहुलुहान
इसीलिए हमने
इन्हें बेवजह धोया नहीं
उसने
कांच कांच कर दिए रिश्ते
फिर भी मैं रोया नहीं।

उस दिन
मेरे एक खास मित्र
आ धमके मेरी जिंदगी भर की
मेहनत की कमाई को
धूर्त्तता के
हाथियारों के बल पर लूटने
पर मैने खुद को
नहीं दिया टूटने
उस तथाकथित मित्र को
यानी कि
छल, फरेब, झूठ और जहरीले मगर चाकलेटी चरित्र को
विश्वास के
टूटे आईने का एक छोटा सा
टुकड़ा थमाया
उसे उस टुकडे में अपना
असली चेहरा नज़र आया
वो खुद से ही डर गया
रिश्तों की चिता पर
उसका किरदार
अपनी ही आग में जल कर
मर गया।
बाद इसके भी मैं
चैन से सोया नहीं
फिर भी, मैं रोया नहीं।

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