कहाँ खो गए नारे …

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Dr SP Singh

अब नारे नहीं , झूठे वादे गढ़े जाते हैं

2016 की इस सम्पादित पोस्ट से नेताओं की तरह वादा करता आ रहा हूं कि भारतीय चुनावों के अद्भुत और बहुआयामी नारों की दुनियां में घुसने की कोशिश करूंगा , लेकिन तब से देश की राजनीति को उलट पलट कर देने वाले दो चुनाव निकल गए । आज से फिर एक कोशिश कि चुनावी नारों की दुनिया से रूबरू हुआ जाए ।

बहुत वक़्त नहीं गुजरा जब नारे चुनावों को जश्न बनाते थे , चौपालों की बतकही से नुक्कड़ की चाय पर चर्चा से कुछ ऐसी तुकबंदियों और जुमलों का जन्म होता था जो बड़ों बड़ों का धुआं निकाल देने के लिए काफी था । सृजनात्मकता अपने चरम होती … बिल्ले – झंडे के लिए बच्चों की वो दौड़ाती ‘टेम्पो हाई’ करती फ़ौज , दरी समेटते -पोस्टर चिपकाते -पर्चियां बांटते और फिर थोड़ा ‘महकने’ पर मुंह छिपाते पार्टी कार्यकर्ता , या कैंडीडेट थोड़ा मालदार हुआ तो पर्चा उडाता हेलीकाप्टर …. सब खो गया । लोकलुभावन नारे और उनकी तुकबंदी जो चुनावों की प्राणवायु हुआ करते थे , गुम गए ।

अब ‘ कार्पोरेटाइजेशन ‘ का जमाना है … बड़ी एजेंसियां , बड़े बजट , होटलों में डील , शराब – पैसा की खेप पहुचाते बाहें समेटते ‘ भाई ‘ । जब तक कुछ सोंच सकें , मस्ती और जश्न का सुर्रा अपनी आहट का एहसास भी कराये..
चुनाव धर्म और जाति के मुलम्मे से चढ़ी चिंताएं दर पर छोड़ जाता है , ‘अस्तित्व व अस्मिता ‘ के प्रश्न सोंच को ही लील जाते है । अब ‘ नारे नहीं वादे ‘ गढ़े जाते है , नुक्कड़ और चौपालों में नहीं…
पांच सितारा में , ‘ चियर्स ‘ के दौर के बीच 4 साल की सुप्तावस्था को 5वें में विकास के उगते सूरज में कैसे ‘उम्मीदों के वन लाइनर’ जुमलों में गुमा दिया जाए इसकी जुगत के साथ ।

अब गरीबी हटाओ के छोटे मोटे नारों से काम नहीं चलता … भरमाना या मेट्रो से गरीब आवास तक का सफर में नतीजे लाएगा या नहीं यह परिणाम बतायेगा , लेकिन अब कुछ इंस्टेंट जरुरी है। फ्री..फ्री .. फ्री , अब चावल गेंहू से काम नहीं चलता , चाहिए लैपटॉप , स्मार्ट फ़ोन … फिर भी क्या भरोसा ! बेबी को कैश चाहिए !
बैकअप के लिए ” अस्मिताएं ” तो है ही ।

जब हमारी ‘सोंच’ यहाँ तक कि ‘वज़ूद’ का मैनेजमेंट शुरू हो चुका गया हो तो वे मस्ती भरे नारे कहाँ से और कैसे निकलेंगे ! अब तो आग पैदा होगी , उससे धुआं निकलेगा और उससे कालिख लपेटे कुछ गुमनाम चेहरे जहर उगल कर गायब हो जाएंगे। पीछे छोड़ जाएंगे उन्ही वातानुकूलित कमरों में हमारी सोंच को मैनेज कर तय किया गया नतीजा , जो मीडिया से लेकर उन्ही वन लाइनर्स में रिफ्लेक्ट होगा ।

कठपुतलियां कहीं मस्ती भरा जश्न मनाती या नारे गढ़ती है ! वे तो इशारों पर नाचती है । हम बस कठपुतली है ।

नारों अपना सामाजिक विज्ञान हुआ करता था , वे महज़ किसी राजनैतिक विचारधारा या संदेश के वाहक मात्र नहीं थे ….इसीलिए पार्टी का कार्यकर्ता भूखे प्यासे रहकर , बिना किसी पारिश्रमिक व लालच जनता के बीच व्याप्त भावना को पार्टी एवं विचारधारा के पोषण के लिए इन्हें गढ़ता था और ‘ऊपर’ तक पहुच जाए सुनिश्चित करता था । लेकिन अब पार्टियां ‘इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों ‘ के ‘वार रूम्स’ में बदल चुकी हैं , जिनकी चौखट पर विचारधारा ने दम तोड़ दिया है । अब “खा गई शक्कर पी गई तेल..” का रस नहीं बल्कि “चौकीदार चोर , प्योर , श्योर ..” जैसी नीरसता और घृणा है । जहर उगलते टीवी पैनल , व्हाट्सएप्प और दूसरे सोशल मीडिया है …वोटरों तक पहुचने के लिए मुट्ठी भींच गला फाड़ नारे लगाते कार्यकर्ताओं की जरूरत खत्म हो चुकी है । उनकी जगह सर्वे एजेंसियों ने ले ली है ।

तो क्या नारों का वजूद ही खत्म हो जाएगा …नहीं । जब तक हमारी परिवेश के साथ संलिप्तता और सृजनात्मकता की प्रवित्ति जीवित रहेगी , भावों और अभिव्यक्ति की विविधता का भी अंत नहीं होगा … तंज , हास्य , परिहास हर स्तर और प्लेटफार्म पर मौजूद रहेंगे । जब तक राजनीति है और इसके विचित्र पोषक जीव हैं , उनपर कटाक्ष रूपी नारे भी गढ़े जाते रहेंगे ….मसलन
” जब तक रहेगा समोसे में आलू
तब तक रहेगा बिहार में लालू”.

हफ्ते में एक दिन अब बहुत लजीज़ आसान शब्दों में ‘नारे और उनसे वारे न्यारे …

—- Dr SP Singh

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